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मोदी की चुप्पी, वांगचुक की जंग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए युवाओं का मुद्दा कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा उनके पिछले दौरे से लगाया जा सकता है। जब देश की राजधानी में एक महान विचारक सूखती जिंदगी से जूझ रहा था, तब प्रधानमंत्री चार-पांच देशों की यात्रा करके कुछ औपचारिक पुरस्कार लेकर लौटे।

जंतर-मंतर से देशभर तक: अब युवाओं की बारी है

HIGHLIGHTS

  • हिमालय का सुपुत्र और दिल्ली का सन्नाटा
  • वांगचुक का उपवास, शिक्षा का अपमान
  • NEET की लूट और एक नाकाम मंत्री
  • धर्मेंद्र प्रधान को हटाओ, युवाओं को बचाओ
  • शिक्षा मंत्रालय या घोटालों का अड्डा?

Wangchuk’s 15day hunger strike in Delhi: दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर मैदान में इन दिनों एक ऐसा सन्नाटा है, जो लोकतंत्र की गूंज को कंपित करने के लिए काफी है। यहां हिमालय के सुपुत्र, पर्यावरणविद् और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक पिछले पंद्रह दिनों से अन्न-जल त्याग कर सूखती जिंदगी से जूझ रहे हैं। उनका वजन दस किलो तक कम हो चुका है, उनकी आवाज धीमी पड़ गई है और उनका शरीर कमजोर होता जा रहा है। लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों के कान इस कमजोर पड़ती आवाज को सुनने से बंद हैं। वांगचुक का यह उपवास किसी व्यक्तिगत स्वार्थ, राजनीतिक उम्मीदवारी या सत्ता के लालच के लिए नहीं है। यह अनशन उस युवा पीढ़ी के भविष्य के लिए है, जिसे आज परीक्षाओं के नाम पर ठगा जा रहा है और जिसके हाथों से न्याय की आखिरी उम्मीद छिनी जा रही है।

वांगचुक की प्रमुख मांग है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। एक संवेदनशील व्यक्ति को यह पूछने का पूरा हक है कि आखिर एक मंत्री का इस्तीफा क्यों जरूरी हो गया है? इसका जवाब उस घिनौने ‘नीट’ (NEET) पेपर लीक घोटाले में छुपा है। चिकित्सा क्षेत्र में दाखिले के लिए आयोजित इस राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा को किस तरह से एक ‘सिंडिकेट’ ने अपना खिलौना बना लिया, यह देश के करोड़ों नागरिकों के सामने उजागर हो चुका है। प्रश्नपत्र लीक होने की घटना ने सरकार की कार्यशैली की कलई खोलकर रख दी। लगातार हो रहे घोटालों ने जनता के विश्वास को ठेस पहुंचाई और आखिरकार सरकार को यह परीक्षा रद्द करने पर मजबूर होना पड़ा।

सबसे शर्मनाक पहलू

इस मामले में सबसे शर्मनाक पहलू यह रहा कि जब गिरफ्तार किए गए आरोपियों की परतें खुलीं, तो सामने आया कि ये लोग सत्ताधारी दल के परिवारों और संगठन से गहराई से जुड़े हुए हैं। इसके बाद सरकार ने जो ‘समाधान’ निकाला, वह अपनी बेरुखी और अक्षमता का जीता-जागता प्रमाण है। सरकार ने घोषणा की कि अब परीक्षा के नए प्रश्नपत्रों को सेना और वायु सेना की सख्त निगरानी में रखा जाएगा।

एक तरफ सेना को सीमा पर दुश्मनों से लोहा लेना है, दूसरी तरफ उसे नागरिक प्रशासन की विफलताओं को छिपाने के लिए प्रश्नपत्रों की रखवाली करनी पड़े, यह स्वयं में एक तरह की राष्ट्रीय शर्म की बात है। इस डरावने खेल में लाखों मेहनती छात्रों का भविष्य अंधेरे में धकेल दिया गया। कई जिंदगियां इस सिस्टम की क्रूरता का शिकार होकर आत्महत्या जैसे कदम उठाने पर मजबूर हो गईं। जब तक शिक्षा विभाग का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति नैतिक जिम्मेदारी महसूस कर इस्तीफा नहीं देते, तब तक इस व्यवस्था में कोई सुधार संभव नहीं है।

सोनम वांगचुक कोई आम आंदोलनकारी नहीं हैं। हिमालय की गोद में बैठकर उन्होंने पर्यावरण और शिक्षा का ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसे दुनिया भर में सराहा गया है। बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता आमिर खान उन्हीं की जिंदगी से प्रेरित होकर एक सुपरहिट फिल्म बनाते हैं। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में वांगचुक के अभिनव कामों की जमकर तारीफ कर चुके हैं। उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में शामिल ‘पद्मश्री’ से भी नवाजा गया।

लेकिन तारीफ तब तक अच्छी लगती है, जबतक कोई सत्ता की गलतियों पर उंगली न उठाए। जैसे ही वांगचुक ने लेह-लद्दाख की जनता के अधिकारों की बात कही और चीन की घुसपैठ का मुद्दा उठाया, तो उन्हें देशद्रोही घोषित करके जेल में डाल दिया गया। जो सरकार एक नवाचारी को चीन की घुसपैठ की आवाज उठाने पर देशद्रोही कह सकती है, उसकी नीयत पर सवाल उठना लाजमी है। संविधान की मूल भावनाओं को ताक पर रखकर जो तानाशाही रवैया अपनाया गया, वह लोकतांत्रिक भारत के लिए घातक साबित हो रहा है।

प्रधान के कार्यकाल में राजनीतिक प्रभाव

हम वर्तमान शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल का मूल्यांकन करें, तो यह भयावह तस्वीर सामने आती है। शिक्षा जगत को नई दिशा देने वाले महान शिक्षाविदों और राजनेताओं—जैसे डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, मौलाना अबुल कलाम आजाद, पी. वी. नरसिम्हा राव और अर्जुन सिंह—के आदर्शों से इस व्यवस्था का कोई वास्ता नहीं रह गया है।

प्रधान के कार्यकाल में शैक्षणिक संस्थानों को राजनीतिक प्रभाव का गुलाम बना दिया गया। कई विश्वविद्यालयों में ऐसी कुलपतियों की नियुक्तियां हुईं, जिनकी योग्यता नहीं, बल्कि राजनीतिक नजदीकी ही उनकी पूंजी थी। इन भ्रष्ट तंत्रों ने शिक्षा के मंदिरों को बर्बादी के कगार पर खड़ा कर दिया। राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं का आयोजन आज उस ‘घोड़े-बाजार’ से भी बदतर हो गया है, जहां लाखों की रिश्वत देकर भविष्य खरीदा जा सकता है। जब इस बेहयाई पर सवाल उठे, तो मंत्री महोदय ने आलोचकों को खरी-खोटी सुनाना उचित समझा।

लोकतंत्र में जब जनता की आवाज सुनने वाला कोई नहीं बचता, तो अनशन जैसी अहिंसक विधि का सहारा लिया जाता है। इतिहास गवाह है कि आजादी से पहले जब महात्मा गांधी अनशन पर बैठते थे, तो सबसे क्रूर ब्रिटिश सरकार भी उनकी जान को खतरे में देखकर दौड़-धूप करती थी। समाधान और मध्यस्थता के जरिए गांधी जी की जान बचाई जाती थी। लेकिन आज की सत्ता में इतनी भी शराफत और लोकतांत्रिक संवेदनशीलता नहीं बची है कि वह एक बीमार और कमजोर होते वांगचुक से बात तक करने को तैयार हो।

2011 की याद

हमें वर्ष 2011 की याद करनी चाहिए, जब देश में कांग्रेस की सरकार थी और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। जनलोकपाल विधेयक की मांग को लेकर अन्ना हजारे ने रामलीला मैदान में 11 दिन का अनशन किया था। तब की सरकार ने हजारे की जान बचाने के लिए कई दौर की बातचीत की थी। केंद्रीय मंत्रियों के प्रतिनिधिमंडलों को रामलीला मैदान भेजा गया, समाधान के रास्ते ढूंढे गए और संवाद की कोशिश की गई। तब विपक्ष में बैठी भाजपा ने अन्ना के आंदोलन को ‘जन आक्रोश’ करार देते हुए खुलकर उनका समर्थन किया था। लेकिन सत्ता का नशा कितना अंधा कर देता है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज वही भाजपा वांगचुक के निस्वार्थ आंदोलन को ‘राजनीतिक साजिश’ का नाम देकर नकार रही है। यह दोहरा चरित्र और सरासर ढोंग है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए युवाओं का मुद्दा कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा उनके पिछले दौरे से लगाया जा सकता है। जब देश की राजधानी में एक महान विचारक सूखती जिंदगी से जूझ रहा था, तब प्रधानमंत्री चार-पांच देशों की यात्रा करके कुछ औपचारिक पुरस्कार लेकर लौटे। इस दौरान अयोध्या के राम मंदिर से जुड़ी चोरी की खबरें भी सुर्खियों में थीं। लेकिन इन सबसे परे, जंतर-मंतर पर बैठे वांगचुक का अनशन देश के लिए सबसे बड़ा और गंभीर संकट था, जिसे सरकार ने नजरअंदाज किया।

बारह साल पहले, जब मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया था, तब युवाओं की एकजुटता ही वह ताकत थी, जिसने उन्हें सत्ता की सीढ़ियों तक पहुंचाया था। मोदी ने अपने प्रचार की शुरुआत पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज के छात्रों को संबोधित करके की थी। उन्होंने ‘परीक्षा पे चर्चा’ जैसे कार्यक्रमों के जरिए खुद को छात्रों का दोस्त बताया। लेकिन आज जब उन्हीं परीक्षाओं की नींव हिल गई है और परीक्षा का बाजार सरेआम बिक रहा है, तो ‘चर्चा’ करने वाला चुप बैठा है। वे एक नाकाम और कामचोर शिक्षा मंत्री को गोद में लेकर बैठे हैं, जबकि देश का एक सच्चा सपूत उनके घर के सामने सांसों की जंग लड़ रहा है।

सोनम वांगचुक की जान

सोनम वांगचुक की जान बचाना केवल एक इंसान को बचाने की बात नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र और शिक्षा व्यवस्था की आत्मा को बचाने का सवाल है। इसके लिए तीखी और ठोस कदम उठाने का समय आ गया है। सबसे पहले, अगर अन्ना हजारे की आत्मा में अभी भी वो आग बची है, जो 2011 में थी, तो उन्हें तुरंत दिल्ली पहुंचना चाहिए। उन्हें वांगचुक का सिर अपनी गोद में लेना चाहिए और खुद इस लड़ाई में कूदकर अनशन का हथियार फिर से उठाना चाहिए। देश के सभी विपक्षी दलों को अपनी राजनीतिक दलगत लड़ाइयां भुलाकर जंतर-मंतर पर डेरा डाल देना चाहिए। सरकार को घेरना होगा और संसद की गलियों से लेकर सड़कों तक इस मुद्दे को गूंजाना होगा।

सबसे अहम सवाल यह है कि जिस युवा पीढ़ी के लिए वांगचुक ने अपनी जान दांव पर लगा दी है, वह युवा पीढ़ी आज किस बिल में छिपी हुई है? क्या वह सोशल मीडिया की दुनिया में ही सीमित रह गई है? युवाओं को अब अपने स्मार्टफोन से निकलकर सड़कों पर आना होगा। उन्हें ‘जय हिंद’ के नारे लगाते हुए, शांतिपूर्ण तरीके से, लेकिन एकजुट होकर ऐसा दबाव बनाना होगा कि सरकार को घुटने टेकने पड़ें।

सोनम वांगचुक की यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति या क्षेत्र की नहीं है; यह उस भारत की लड़ाई है, जहां मेहनत को उसका सम्मान मिले, जहां शिक्षा मंत्री जवाबदेह हों, और जहां सत्ता जनता के गुस्से से डरे। यह अनशन जंतर-मंतर तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे पूरे देश की एक व्यापक जन आंदोलन की शक्ल लेनी चाहिए। अगर आज वांगचुक की आवाज दब गई, तो कल किसी भी निर्दोष को अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने से पहले सौ बार सोचना होगा। लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए वांगचुक को जीवित रखना जरूरी है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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