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भ्रष्टाचार के बचाव में धमकियां, यही है नया महाराष्ट्र?

शब्दों की गिरावट नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित मानसिकता का परिचायक है—जिसका उद्देश्य बहस को भटकाना और संस्थाओं को गुंडागर्दी के स्तर पर खींचना है। जब जनप्रतिनिधि 'हम तुम्हें देख लेंगे' जैसी धमकियां देते हैं, तो यह स्पष्ट संकेत है कि सत्ता में बैठे लोग संवैधानिक जवाबदेही से भाग रहे हैं।

विधानसभा में गुंडगर्दी, लोकतंत्र में 'भाड़े' की राजनीति (फाइल फोटो)

HIGHLIGHTS

  • ५४० करोड़ का किलोमीटर, बहता ईमान
  • 'देख लूंगा' से चलेगी महाराष्ट्र की सरकार?
  • २५०० करोड़ की लूट और चुप्पी का राज
  • ५०-५० करोड़ में बिकी जनता की आवाज़
  • यशवंतराव और फडणवीस: विरासत और विघटन

Dignity and politics of Maharashtra: महाराष्ट्र भारत का वो प्रदेश है, जिसने सामाजिक सुधार आंदोलनों से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक में अद्वितीय योगदान दिया है। इस भूमि ने राजनीतिक संस्कारों, साहित्य, कला और प्रगतिशील चिंतन को जन्म दिया है। परंतु आज यही महाराष्ट्र एक गंभीर संकट से गुजर रहा है। यह संकट कोई बाहरी आक्रमण नहीं है, बल्कि यह सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के संस्कारहीनता, असीम भ्रष्टाचार और लोकतांत्रिक मूल्यों के विघटन का संकट है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के हालिया शब्दचयन और उनकी सरकार के कार्यप्रणाली ने यह साबित कर दिया है कि महाराष्ट्र की गरिमा और उनकी राजनीतिक सोच के बीच एक गहरा ‘मिसिंग लिंक’ (लुप्त कड़ी) उभर चुका है।

विधानसभा जनता की इच्छा का पर्वत समझा जाता है, जहां विचारों की टक्कर होती है, न कि गली-मोहल्ले की अश्लीलता का प्रदर्शन। लेकिन मुख्यमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा विपक्षियों को ‘भाड़े के’ या ‘कुत्ते’ जैसी संज्ञाओं से संबोधित करना, महाराष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत पर थूकने जैसा है। यह केवल शब्दों की गिरावट नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित मानसिकता का परिचायक है—जिसका उद्देश्य बहस को भटकाना और संस्थाओं को गुंडागर्दी के स्तर पर खींचना है। जब जनप्रतिनिधि ‘हम तुम्हें देख लेंगे’ जैसी धमकियां देते हैं, तो यह स्पष्ट संकेत है कि सत्ता में बैठे लोग संवैधानिक जवाबदेही से भाग रहे हैं और अपनी कमजोरियों को धमकी के बूटे से छुपाने का प्रयास कर रहे हैं।

भाषा के पीछे कारण

इस धमकी की भाषा के पीछे का असली कारण सामने आता है जब हम मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के ‘मिसिंग लिंक’ प्रोजेक्ट की बात करते हैं। यदि कभी भ्रष्टाचार के अंधेरे में एक वैश्विक उदाहरण खोजना हो, तो यह प्रोजेक्ट उसके लिए एक आदर्श मॉडल साबित होगा। तथ्यों पर गौर कीजिए—इस प्रोजेक्ट की जो मूल लागत तय की गई थी, वह लगभग ४,७९७.५५ करोड़ रुपये थी। इस लागत में दो सुरंगें, आठ लेन की सड़क और दो पुलों सहित करीब १३ किलोमीटर का विस्तार शामिल था। सरकारी नियमों, मानकों और तमाम तरह के ओवरहेड चार्जेज को जोड़ लें, तो भी यह लागत साढ़े पांच हजार करोड़ के पार जाना नामुमकिन था। लेकिन अंततः इसका खर्च ७,१८० करोड़ रुपये दिखाकर लगभग २,५०० करोड़ रुपये की बेहिसाब लूट का विश्व रिकॉर्ड कायम किया गया।

एक किलोमीटर सड़क बनाने की लागत ५४० करोड़ रुपये आना, किसी इंजीनियरिंग चमत्कार नहीं, बल्कि खुलेआम लूट का गणित है। और इस लूट का नतीजा क्या निकला? पहली ही बारिश में यह आधुनिक सुरंगें और सड़कें छलनी हो गईं। पानी रिसने लगा। यह भौतिक संरचना की विफलता नहीं है, यह नैतिक संरचना के पूरी तरह ध्वस्त होने का प्रमाण है। जब इस २,५०० करोड़ रुपये के घोटाले पर सवाल उठाए जाते हैं, तो मुख्यमंत्री को जवाब देने के बजाय यह कहना पड़ता है कि ‘भ्रष्टाचार पर सवाल उठाना महाराष्ट्र की बदनामी है’। यह तर्क कितना विडंबनापूर्ण और निर्लज्ज है! सच तो यह है कि भ्रष्टाचार करना बदनामी है, भ्रष्टाचारियों को बचाना बदनामी है, और उस भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वालों को धमकाना महाराष्ट्र की संस्कृति का अपमान है।

गुंडराज का वातावरण

यह लूट का धन कहां जा रहा है? इसका जवाब सीधे तौर पर राज्य में बढ़ती हुई ‘झुंडशाही’ और गुंडों के हौसले बुलंद होने में छुपा है। जब तक सत्ता में बैठे लोगों को अवैध धन से खर्च करने की आज़ादी होगी, तब तक राज्य में गुंडराज का वातावरण बना रहेगा। इसी भ्रष्ट पैसे का इस्तेमाल लोकतंत्र को खरीदने में किया जा रहा है। आज महाराष्ट्र में ५०-५० करोड़ रुपये के दम पर विधायकों और सांसदों की खरीद-फरोख्त एक खुला राज बन चुका है। जनादेश को तोड़कर सरकार बनाने की इस कार्रवाई पर अगर मुख्यमंत्री कोई उंगली नहीं उठाते, तो इसे उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि उनकी संलिप्तता माना जाएगा। जिस लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि सौदेबाजी की वस्तु बन जाएं, उसका मखौल बनना तय है।

महाराष्ट्र को शासन करने का जो इतिहास रहा है, वह संयम, कूटनीति और बौद्धिक प्रतिभा से समृद्ध रहा है। यशवंतराव चव्हाण जैसे विराट व्यक्तित्व ने जो राजनीतिक संस्कारों की नींव रखी थी, वह महाराष्ट्र की धरोहर है। प्रज्ञा, विवेक, सहिष्णुता और मर्दानगी जैसे गुण उनके व्यक्तित्व का हिस्सा थे। उसके बाद चाहे मारोतराव कन्नमवार हों, वसंतराव नाईक हों, शंकरराव चव्हाण हों, वसंतदादा पाटील हों, शरद पवार हों, विलासराव देशमुख हों, मनोहर जोशी हों या उद्धव ठाकरे—इन सभी ने विधानसभा और संवैधानिक पदों की गरिमा को हमेशा बनाए रखा। इन नेताओं ने मराठी भाषा की ताकत और सौंदर्य को समझा और उसका इस्तेमाल विरोधियों को कुचलने के लिए नहीं, बल्कि विचारों की नई दिशा देने के लिए किया।

भावनात्मक या सांस्कृतिक नाता

देवेंद्र फडणवीस ने स्वयं एक बार कहा था कि ‘शरद पवार और उद्धव ठाकरे का मतलब महाराष्ट्र नहीं है’। लेकिन तथ्यों के आईने में यह सच उजागर होता है कि महाराष्ट्र को तोड़ने, बांटने और सत्ता हथियाने की राजनीति करने वालों का महाराष्ट्र राज्य से कोई भावनात्मक या सांस्कृतिक नाता नहीं हो सकता। जिस व्यक्ति का कभी किसी सामाजिक आंदोलन या स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष से कोई सरोकार नहीं रहा, उसके भीतर यशवंतराव चव्हाण जैसा एक भी गुण कैसे हो सकता है? भारतीय जनता पार्टी और उनके सहयोगी गुट को यदि लगता है कि वे अपूर्व और सर्वशक्तिमान हैं, तो यह उनकी राजनीतिक अज्ञता है। सार्वजनिक जीवन में नैतिक चरित्र, क्षमता, अध्ययनशीलता और जनसंपर्क की न्यूनतम पूंजी के बिना कोई भी राज्य का उत्थान नहीं कर सकता।

आज जो शासन चल रहा है, वह वास्तव में शासन नहीं है। यह ‘चंपत राय’ की शैली पर आधारित एक लूट-प्लंडर का खेल है। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी प्रदेश पर ऐसे शासकों का राज रहा है, जिनका उद्देश्य केवल संसाधनों का शोषण रहा, तब उन्हें मुगलों और अंग्रेजों की तरह ‘लूटो और निकलो’ की नीति अपनानी पड़ी है। फडणवीस और उनके चाटुकारों (उपटरावों) की कार्यप्रणाली भी इसी नीति से प्रेरित प्रतीत होती है। उन्हें सरकार के भ्रष्टाचार पर बोलना इतना नागवार गुजरता है कि वे पूरी तरह से प्रतिशोध की आग में जलने लगते हैं।

चुप नहीं बैठी

लेकिन मुख्यमंत्री को यह याद रखना चाहिए कि उन्हें ‘देख लेने’ की धमकी देने से पहले जनता का गुस्सा ‘देख’ लेना चाहिए। जनता अब चुप नहीं बैठी है। मिसिंग लिंक से लेकर विधायकों की खरीद-फरोख्त तक का हिसाब मांग रही है। अगर फडणवीस सोचते हैं कि धमकी देने से जुबान बंद हो जाएगी, तो वे भूल रहे हैं। इतिहास साक्षी है कि भ्रष्चार के खिलाफ उठने वाली आवाजें कभी शांत नहीं होतीं। क्या वे भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने वालों की जुबान काट देंगे? क्या उन्हें कारसेवकों की तरह गोलियों से भून देंगे? लोकतंत्र में ऐसी सोच रखने वालों का अंतिम परिणाम हमेशा करारी हार होता है।

महाराष्ट्र को अपने संस्कारों और संस्कृति का वह ‘मिसिंग लिंक’ वापस खोजना होगा, जिसे वर्तमान सत्ता ने तोड़ दिया है। जनता को यह तय करना है कि क्या वह ‘चंपत राय’ शैली के शासन को सहन करेगी, जहां एक किलोमीटर सड़क ५४० करोड़ में बनती है और पहली बारिश में ही बह जाती है, या फिर वह उस लोकतांत्रिक जागरण का सूर्योदय करेगी, जो इन भ्रष्टाचारियों और गुंडों की राजनीति को इतिहास के कूड़ेदान में फेंकने के लिए तैयार है। राज किसका है, यह महत्वपूर्ण नहीं है; राज कैसे चल रहा है, यही आज महाराष्ट्र का सबसे बड़ा सवाल है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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