राजधानी दिल्ली की नौकरशाही और राजनीतिक नेतृत्व के बीच एक अजीब पैटर्न देखने को मिलता है। एक तरफ कागजों और विज्ञापनों पर ‘स्वच्छ दिल्ली’, ‘विश्व-class बुनियादी ढांचा’ और ‘जनसुविधाओं का विस्तार’ जैसे भव्य दावे गूंजते रहते हैं, जबकि दूसरी तरफ इन्हीं दावों की कलई खोलती जमीनी हकीकत कहीं ठोस रूप ले चुकी है। पश्चिम दिल्ली का मोहन गार्डन इलाका आज इसी विडंबना का जीता-जागता उदाहरण बनता जा रहा है। यहां की गलियां आज किसी आबादी इलाके से कम और किसी बदबूदार नाले से ज्यादा नजर नहीं आती है। दिल्ली जल बोर्ड (DJB) की घोर लापरवाही और अकड़ के चलते यहां के हजारों निवासियों का जीना महान संघर्ष बन चुका है।
मानसून का खौफ और डूबती गलियां
दिल्ली में मानसून की बारिश आमतौर पर लोगों को तपती गर्मी से राहत देती है, लेकिन मोहन गार्डन, उत्तम नगर, बुद्ध बाजार, राजापुर खुर्द और गांधी चौक जैसे इलाकों के लिए यह राहत एक कल्पना मात्र है। यहां थोड़ी सी भी बारिश होते ही त्रासदी का दरवाजा खुल जाता है। सड़कें और गलियां सीवर के उफनते पानी से तरबतर हो जाती हैं। विशेष रूप से राजापुर खुर्द, राहुल प्रॉपर्टी के पास गली नंबर 1 और आसपास के क्षेत्रों में तो हालत सबसे खराब है। जिन घरों के सामने सीवर के डक्कन (कवर) लगे हैं, वहां गंदा पानी और कीचड़ मुख्य द्वार तक पहुंच जाता है। लोगों को घर से निकलने के लिए मजबूरन मुंह पर कपड़ा बांधना पड़ता है और गलियों में फिसलने का भय हमेशा सिर पर मंडराता रहता है।

स्वास्थ्य पर गंभीर आघात, बीमारियों का अड्डा बनता इलाका
सीवर जाम केवल एक नागरिक असुविधा नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर जनस्वास्थ्य संकट का रूप ले चुका है। लंबे समय तक गंदे पानी का भराव रहने से मच्छरों के प्रजनन के लिए अनुकूल वातावरण बन गया है। डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया जैसी जानलेवा बीमारियों का प्रकोप इस क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहा है। साथ ही, लगातार दुर्गंध और संक्रमित वातावरण के संपर्क में रहने से त्वचा संबंधी रोग और पेट के इंफेक्शन के मामले भी बढ़े हैं।
सबसे अधिक असमानता तब दिखती है जब इस विकराल स्थिति का भार उन कमजोर कमरों पर पड़ता है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है—बच्चे और बुजुर्ग। बच्चे बार-बार बीमार पड़ रहे हैं और इलाके में सुरक्षित खेलने की कोई जगह नहीं बची है। बुजुर्गों को सुबह-शाम की सैर या आवश्यक कामों के लिए घर से निकलने का डर सताता है। इसका प्रत्यक्ष आर्थिक प्रभाव भी दिख रहा है। लोगों को सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है और प्राइवेट इलाज का खर्च सीमित आय वाले परिवारों पर भारी पड़ रहा है। यह सिर्फ शारीरिक बीमारी नहीं है, बल्कि लोगों पर लगातार मंडरा रहा मानसिक तनाव भी है।
जल बोर्ड की उदासीनता और बदलते राजनीतिक हालात
इस पूरे मामले का सबसे दुखद और निंदनीय पहलू दिल्ली जल बोर्ड के अधिकारियों का रवैया है। स्थानीय लोगों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। जनप्रतिनिधियों से लेकर जल बोर्ड के उच्चाधिकारियों तक, और ऑनलाइन शिकायत पोर्टल्स से लेकर फोन पर गुहार लगाने तक का हर संभव प्रयास किया गया। लेकिन नतीजा सिफर रहा। अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है। शिकायतें फाइलों में दफन होकर रह गई हैं।

दिलचस्प बात यह है कि इस संकट ने एक राजनीतिक बहस को भी जन्म दिया है। मोहन गार्डन के निवासियों के बीच एक बात साफ तौर पर सुनने को मिल रही है कि जब पिछली सरकार (आम आदमी पार्टी) का कार्यकाल था, तब भले ही समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं होती थी, लेकिन शिकायतों पर कुछ हद तक सुनवाई और ढोल-पीट कर भी सफाई हो जाया करती थी। लेकिन जब से नई सरकार (भाजपा) का कार्यभार संभाला गया है, तब से तस्वीर बिल्कुल बदल गई है।
लोगों का मानना है कि जल बोर्ड और नगर निगम के अधिकारी जान-बूझकर नई सरकार को बेइज्जत करने और उसके कामकाज को विफल दिखाने की रणनीति अपने हाथ में लिए हुए हैं। अगर यह धारणा सही भी है, तो यह लोकतंत्र और नौकरशाही के लिए बेहद शर्मनाक है। अपनी नौकरी बचाने या किसी राजनीतिक दल के प्रति अपनी नफरत या वफादारी को व्यक्त करने के लिए आम आदमी की जान और सेहत से खिलवाड़ करना कतई माफ नहीं किया जा सकता। नौकरशाही को राजनीतिक दलों के रंग में नहीं रंगना चाहिए, उसका काम जनता की सेवा करना है।
बुनियादी ढांचे की विफलता और दीर्घकालिक समाधान का अभाव
मोहन गार्डन जैसे क्षेत्रों में सीवर जाम की समस्या नई नहीं है। यह दशकों पुरानी योजनाओं और बदलती जनसंख्या के बीच उपजे विसंगतियों का नतीजा है। इन इलाकों में अवैध या अनधिकृत बस्तियों का विस्तार हुआ, लेकिन उसके अनुरूप सीवर लाइनों के नेटवर्क को अपग्रेड नहीं किया गया। पुरानी, संकरी पाइपलाइनें आज के भारी भरकम जल निकासी के लिए नाकाफी साबित हो रही हैं।
जब तक सरकार और जल बोर्ड ‘झाड़ू-पोंछा’ सुधार की नीति छोड़कर बुनियादी ढांचे को बदलने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाएगा, तब तक यह समस्या हर साल बारिश के मौसम में प्रकोप लेगी। इसके लिए जरूरी है कि भूमिगत ड्रेनेज सिस्टम का वैज्ञानिक मैपिंग किया जाए और नई, चौड़ी सीवर लाइनें बिछाई जाएं। साथ ही, जल बोर्ड को रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम लगाना चाहिए ताकि जाम लगने से पहले ही उसे खुलवाया जा सके।






















