महाराष्ट्र की राजनीतिक पारा एक बार फिर सातवें आसमान पर पहुंच चुका है। राज्य में सत्तारूढ़ महायुति (BJP-शिंदे-NCP अजित पवार गुट) और विपक्षी महाविकास अघाड़ी (MVA) के बीच चल रही रस्साकशी ने एक नया मोड़ ले लिया है। केंद्रीय मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) के अध्यक्ष रामदास आठवले के एक बयान ने ऐसी हलचल पैदा कर दी है, जिसके चलते उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) को एक बार फिर अपने अस्तित्व की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
आठवले के दावों और राजनीतिक सूत्रों से निकलकर सामने आ रही खबरों की मानें तो ठाकरे गुट के लगभग 14 से 15 विधायक सांसदों का साथ छोड़कर महायुति में शामिल होने का मन बना चुके हैं। यदि यह बड़ा दलबदल साकार होता है, तो यह पिछले कुछ महीनों में शिवसेना (यूबीटी) का तीसरा बड़ा झटका होगा। इससे पहले पार्टी के कई सांसदों और महाराष्ट्र विधान परिषद के नेता दल ने पार्टी को अलविदा कह दिया था।
दल-बदल विरोधी कानून की बाधा और ’15’ का गणित
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर इस बात पर टिकी है कि शिंदे गुट आखिर इस बड़े पैमाने पर टूट को कैसे अंजाम देगा। दरअसल, संविधान के दसवें अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत कोई भी विधायक अगर पार्टी छोड़ता है, तो उसकी सदस्यता रद्द हो सकती है। हालांकि, इसमें एक बचाव का रास्ता है— यदि किसी विधायक दल के दो-तिहाई (2/3) सदस्य एक साथ पार्टी विरोधी गतिविधि में शामिल हों, तो उन्हें अयोग्य ठहराए जाने से छूट मिल सकती है।
वर्तमान में उद्धव ठाकरे के साथ विधानसभा में लगभग 20 विधायकों का कमजोर समूह है। शिंदे गुट की रणनीति साफ है कि वह 14 से 15 विधायकों को एक साथ अपने पाले में करके दो-तिहाई के आंकड़े को पूरा करना चाहती है। ऐसा करने से न केवल विधायकों की सदस्यता सुरक्षित रहेगी, बल्कि कानूनी तौर पर भी यह टूट वैध मानी जाएगी। सूत्रों की मानें तो अभी तक शिंदे गुट के नेताओं ने ठाकरे गुट के 10 विधायकों को अपने पक्ष में करने का काम पूरा कर लिया है और 5 और विधायकों को राजी करने के लिए गुप्त बातचीत चल रही है।
उद्धव ठाकरे का मोर्चा संभालने का खेल
इधर, सत्ता पक्ष की इन रणनीतियों से अनजान उद्धव ठाकरे बिल्कुल नहीं हैं। जैसे-जैसे बड़े दलबदल की खबरें हवा में उड़ने लगी हैं, ठाकरे ने भी अपनी कमर कस ली है। हाल ही में जब नासिक नगर निगम (Nashik Municipal Corporation) के करीब 12 पार्षदों के शिंदे गुट से संपर्क में होने की खबरें सामने आईं, तो उद्धव ठाकरे ने तुरंत अपने ‘संकटमोचक’ माने जाने वाले नेता रवींद्र मिर्लेकर को नासिक रवाना किया।

मिर्लेकर का काम सिर्फ नासिक के पार्षदों को संभालना नहीं है, बल्कि उन्हें यह सुनिश्चित करना है कि स्थानीय स्तर पर पार्टी का आधार कमजोर न हो। शनिवार को मिर्लेकर ने नासिक के सभी पार्षदों और संगठन के पदाधिकारियों की एक आपातकालीन बैठक बुलाई, जिसमें वर्तमान सियासी हालात पर चर्चा कर रणनीति तैयार की गई। नासिक शिवसेना का गढ़ माना जाता है, ऐसे में यहां से टूटना उद्धव गुट के लिए काफी नुकसानदेह साबित हो सकता था।
लोकसभा सांसद और NCP नेता भी निशाने पर
महायुति की नजरें अभी सिर्फ शिवसेना (यूबीटी) के विधायकों पर ही टिकी हुई नहीं हैं। एजेंसियों से जुड़े सूत्रों का दावा है कि उद्धव ठाकरे गुट के एक लोकसभा सांसद को भी शिंदे गुट में लाने की कवायद तेज हो गई है। लोकसभा चुनाव से पहले ऐसा कदम उठाना महायुति के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से बहुत बड़ी जीत साबित हो सकता है।
इसके अलावा, सबसे बड़ी खबर यह है कि शिंदे गुट का दायरा अब शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) तक भी बढ़ चुका है। सूत्रों के अनुसार, शरद पवार गुट के कुछ बड़े विधायक और एक लोकसभा सांसद भी गुप्त रूप से शिंदे गुट के संपर्क में हैं। शुरुआती बातचीत काफी सकारात्मक रही है, जिससे MVA के भीतर एक गहरा विश्वासघात की आशंका बढ़ गई है।























