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सुंदरकांड नहीं, सियासी ड्रामा

The buzz in Delhi's politics: दिल्ली की सियासत में हाल ही में श्री सुंदरकांड पाठ के एक आयोजन को लेकर जो घमासान मचा है, वह इसी कथन की ताजा और सबसे चौंकाने वाली मिसाल है।

केजरीवाल के 'हिंदू अवतार' को अपनों ने नकारा

HIGHLIGHTS

  • अवसरवादी भक्ति का पर्दाफाश
  • आप का मौन विद्रोह
  • पाखंडी भक्ति पर जनता की मुहर
  • सॉफ्ट हिंदुत्व की बेड़ियाँ टूटीं
  • 2024 के वादे का कब्रखाना

The buzz in Delhi’s politics: राजनीति और धर्म का रिश्ता हमेशा से भारतीय लोकतंत्र का एक अनिवार्य और सबसे जटिल पहलू रहा है। हालांकि, जब इस रिश्ते को सिर्फ चुनावी बहुमत के लिए एक ‘स्ट्रैटेजिक टूल’ के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, तो वह आस्था से अपमान की कगार तक पहुंच जाता है। दिल्ली की सियासत में हाल ही में श्री सुंदरकांड पाठ के एक आयोजन को लेकर जो घमासान मचा है, वह इसी कथन की ताजा और सबसे चौंकाने वाली मिसाल है। पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम को लेकर भाजपा ने जिस तरह से आप पार्टी आप को घेरा है, उसने सिर्फ एक पार्टी को नहीं, बल्कि ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की पूरी राजनीतिक विचारधारा को एक करारा झटका दिया है।

भाजपा के प्रवक्ता प्रवीण शंकर कपूर और दिल्ली भाजपा अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा द्वारा लगाए गए आरोपों का केंद्र बिंदु सिर्फ कम भीड़ नहीं है, बल्कि उस खालीपन के पीछे की ‘मानसिकता’ है। रोहिणी में आयोजित इस पाठ में कथित तौर पर महज पांच से छह सौ लोगों का जमावड़ा एक राजनीतिक संकट का प्रतीक बन गया है। यह खालीपन इसलिए भयावह है क्योंकि यह अकेले जनता का बहिष्कार नहीं है, बल्कि केजरीवाल की अपनी पार्टी, उनके अपने विधायकों और वरिष्ठ नेताओं का एक ‘मौन विद्रोह’ है।

राजनेता की ‘अवसरवादी भक्ति’

जब किसी धार्मिक आयोजन के लिए बसों की व्यवस्था करने पर भी लोग सड़कों पर नहीं उतरते, तो संदेश साफ होता है—जनता किसी राजनेता की ‘अवसरवादी भक्ति’ को अपना नहीं मान रही। पूर्व मंत्री गोपाल राय और पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी जैसे चेहरों की इस आयोजन से गैरमौजूदगी एक बड़ी कहानी कहती है। यह कहीं से भी संयोग नहीं है कि वे नेता, जो कभी केजरीवाल के सबसे करीबी माने जाते थे, उनके इस नए ‘हिंदू अवतार’ से खुद को दूर रख रहे हैं। शायद उन्हें भी यह अहसास हो गया है कि जिस पार्टी ने अपनी राजनीतिक नींव ‘सत्याग्रह’ और ‘राजनीति के अपराधीकरण’ जैसे मुद्दों पर रखी थी, उसका अचानक से ‘सुंदरकांड’ की राजनीति में डूब जाना उसकी मूल पहचान के साथ विश्वासघात है।

भाजपा द्वारा उठाया गया वह सवाल, जिसमें 2024 में शुरू किए गए सुंदरकांड अभियान को अचानक बंद कर दिए जाने का मुद्दा है, वास्तव में आप की रणनीति की कलई खोलता है। जब अयोध्या में श्रीराम मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा समारोह संपन्न हुआ, तो देश भर में एक आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार हुआ। उस समय आप नेतृत्व ने यह महसूस किया कि इस लहर को अनदेखा करना राजनीतिक रूप से घातक साबित हो सकता है। इसलिए एक अचानक से दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों पर साप्ताहिक सुंदरकांड पाठ कराने की घोषणा कर दी गई। मार्च 2024 में 2,600 स्थानों पर एक साथ पाठ कराने की बड़ी-बड़ी घोषणाएं की गईं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही थी। 26 स्थानों पर भी यह आयोजन पूरा नहीं हो सका।

यह घटनाक्रम साबित करता है कि आप के लिए सुंदरकांड कोई आस्था का मामला नहीं था, बल्कि एक ‘प्रोजेक्ट’ था। जब प्रोजेक्ट में ROI (रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट)—यानी राजनीतिक लाभ—नजर नहीं आया, तो प्रोजेक्ट को बंद कर दिया गया। क्या कोई सच्चा भक्त या धार्मिक आयोजक कभी भगवान की भक्ति को बजट शीट के आधार पर शुरू या बंद करता है? यही कारण है कि भाजपा इसे ‘पाखंडी भक्ति’ कह रही है, और इस शब्द को इस्तेमाल करने में कोई अतिशयोक्ति नहीं लगती।

केजरीवाल को ‘सेक्युलर’ ब्रिगेड

हर्ष मल्होत्रा द्वारा केजरीवाल के उस पुराने बयान को याद कराना भी इस संदर्भ में बेहद प्रासंगिक है, जिसमें उन्होंने अपनी नानी का हवाला देते हुए कहा था कि वह ऐसे मंदिर में नहीं जाएंगे जो किसी मस्जिद को तोड़कर बना हो। इस एक बयान ने कभी केजरीवाल को ‘सेक्युलर’ ब्रिगेड का नायक बना दिया था। लेकिन आज वही केजरीवाल सुंदरकांड पाठ करवाकर और हनुमान चालीसा के पोस्टर लगाकर ‘हिंदुत्व’ की दुहाई दे रहे हैं। यह चरम विरोधाभास नहीं, बल्कि चरम राजनीतिक चाणक्यता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या जनता इस चाणक्यता को नम्रता स्वीकार करेगी? रोहिणी के खाली पंडाल ने इस सवाल का जवाब ‘नहीं’ में दे दिया है।

दरअसल, आम आदमी पार्टी की यह दुविधा ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की राजनीति करने वाले लगभग हर गैर-भाजपा दल की दुविधा है। कांग्रेस ने भी इसी रास्ते पर चलकर ‘शिवराज’ की राजनीति की, लेकिन सफलता नहीं मिली। कारण साफ है—भाजपा ने हिंदुत्व के मुद्दे पर दशकों तक संघर्ष किया है, उसके कार्यकर्ताओं ने इसके लिए खून-पसीना एक किया है, और इसलिए उनकी पकड़ जमीनी स्तर पर बेहद मजबूत मानी जाती है। वहीं, जब कोई ऐसा दल, जिसकी विचारधारा में हिंदुत्व का कोई स्थान नहीं था, चुनाव के ठीक पहले अचानक से जय श्री राम और हनुमान चालीसा के बोल बोलने लगता है, तो उसे जनता ‘ठगा’ हुआ महसूस करती है।

धर्म की राजनीति और धार्मिक आस्था की राजनीतिकी में फर्क होता है। जनता यह फर्क समझ चुकी है। एक आम हिंदू परिवार के लिए सुंदरकांड का पाठ भगवान हनुमान की असीम शक्ति, समर्पण और भक्ति का प्रतीक है। जब कोई राजनीतिक दल इस पवित्र ग्रंथ को वोट जुटाने के लिए एक ‘इवेंट मैनेजमेंट’ की तरह इस्तेमाल करता है, तो वह उस परिवार की भावनाओं का अपमान करता है। बसों की व्यवस्था करके भीड़ जुटाने की कोशिश इसी ‘इवेंट मैनेजमेंट’ का हिस्सा थी, जो फ्लॉप हो गई।

विचारधारा का लंबा इतिहास

आप पार्टी को एक गंभीर सबक लेने की जरूरत है। अगर केजरीवाल को लगता है कि भाजपा को चुनौती देने के लिए उन्हें हिंदुत्व का रास्ता अपनाना होगा, तो वे गलत फीसद में हैं। भाजपा की ताकत सिर्फ हिंदुत्व के नारे नहीं है, बल्कि उसकी संगठात्मक ढांचा, उसके कार्यकर्ताओं का समर्पण और उसकी विचारधारा का एक लंबा इतिहास है। आप के पास इनमें से कुछ भी नहीं है। ऐसे में हिंदुत्व की नकल करना उन्हें भाजपा का ‘पूर्ण बहुमत’ वाला विकल्प नहीं बना सकता, बल्कि उन्हें एक ‘कमजोर कॉपी’ के रूप में ही पेश करेगा।

दूसरी ओर, भाजपा के लिए भी यह मुद्दा एक तलवार की धार पर चलने जैसा है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि वे केजरीवाल की ‘पाखंडी भक्ति’ को घेरने के चक्कर में खुद भी धर्म के मुद्दे को इतना अधिक राजनीतिक बना दें, कि उसकी पवित्रता पर ही सवाल उठने लगें। हालांकि, अभी तक के प्रचार अभियान में भाजपा ने एक संयमित रणनीति अपनाई है। उसने सीधे तौर पर सुंदरकांड या हनुमान जी पर हमला नहीं किया है, बल्कि हमला केजरीवाल के ‘इरादों’ पर किया है। ‘अवसरवादी भक्ति’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके भाजपा ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह धर्म की रक्षा कर रही है, न कि धर्म की राजनीति कर रही है।

Sandhya Samay News

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