Delhi bogged down in paperwork: भारत की राजधानी दिल्ली को लेकर देश और दुनिया में जो तस्वीर पेश की जाती है, वह आधुनिकता, बुनियादी ढांचे की चमक और एक सुचारू शासन व्यवस्था की प्रतीक है। लाल किले से लेकर संसद भवन तक और विस्तृत मेट्रो नेटवर्क से लेकर उड़ने पुलों तक, यह शहर विकास के एक अनूठे मॉडल के रूप में सामने आता है। लेकिन इस चमकदार बाहरी कवच के नीचे जो हकीकत छिपी है, वह तब सामने आती है जब आसमान से पहली बारिश की बूंदें टपकती हैं। बीते गुरुवार को मानसून की पहली तेज बारिश ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि दिल्ली की व्यवस्था कितनी कोमल और नाजुक है। कुछ ही घंटों की बारिश ने इस महानगर को एक बड़े जलग्रहण क्षेत्र (Waterlogged Zone) में बदल दिया। सड़कें तालाब बन गईं, प्रमुख अंडरपास बंद हो गए, यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई और लाखों लोगों को घंटों भयंकर जाम और गंदगी का सामना करना पड़ा।
कागजी तैयारियां और आंकड़े धुंधले
यह कोई नया दृश्य नहीं है। हर साल मानसून से पहले दिल्ली नगर निगम, जल बोर्ड, लोक निर्माण विभाग (PWD) और अन्य संबंधित एजेंसियां भारी भरकम दावे करते हुए मीडिया में अपनी तैयारियों का बखान करती हैं। प्रेस विज्ञप्तियों के जरिए यह बताया जाता है कि कितने नालों की सफाई की गई है, कितने ड्रेनेज पंप लगाए गए हैं और कितने गीले अवशेष (Silt) को निकाला गया है। लेकिन जैसे ही बादल गरजते हैं, ये कागजी तैयारियां और आंकड़े धुंधले होने लगते हैं। सवाल यह है कि जो काम फाइलों और प्रेस रिलीज में हो चुका बताया जाता है, वह जमीन पर क्यों दिखता नहीं? क्या इन महकमों में इतनी भी क्षमता नहीं बची है कि वे एक सामान्य बारिश से निपट सकें?

इस समस्या के कई परतदार कारण हैं, जिन्हें समझने के लिए सिर्फ नालों की सफाई तक सीमित रहना उचित नहीं होगा। सबसे पहला और सबसे बड़ा कारण है दिल्ली का बदलता हुआ पारिस्थितिक तंत्र (Ecology)। दिल्ली एक ऐसा शहर है जहां अंधाधुंद बेतहाशा कंक्रीटीकरण (Concretization) हुआ है। कभी जो जगहें खुली होती थीं और जहां पानी धरती के अंदर समा जाता था, वहां आज विशाल इमारतें, मॉल और चौड़ी सड़कें बन गई हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और जल निकासी के प्राकृतिक रास्तों को बंद कर देने से पानी के निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा है। जब पानी कहीं जाने का रास्ता नहीं ढूंढ पाता, तो वह सड़कों पर ही फैलकर तालाब बन जाता है।
इंजीनियरिंग की विफलता
दूसरा बड़ा कारण है अपूर्ण और पुराने ड्रेनेज सिस्टम पर निर्भरता। दिल्ली का अधिकांश नाला नेटवर्क ब्रिटिश काल या उसके बाद के दशकों में बनाया गया था, जो उस समय की आबादी और बारिश के आंकड़ों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था। आज दिल्ली की आबादी करोड़ों में पहुंच चुकी है और जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश के पैटर्न भी बदल गए हैं। अब घंटों में बरसने वाली बारिश का आंकड़ा काफी बढ़ गया है, लेकिन नालों की चौड़ाई और क्षमता वही पुरानी है। सिस्टम को अपग्रेड न कर पाना इंजीनियरिंग की विफलता है।
तीसरा और सबसे गंभीर कारण है प्रशासनिक अराजकता और जिम्मेदारी के खेल। दिल्ली एक अनूठा शहर है, जहां शासन और प्रशासन की जिम्मेदारी कई हाथों में बंटी हुई है। दिल्ली सरकार, एनडीएमसी, एसडीएमसी, पीडब्ल्यूडी, डीडीए, दिल्ली जल बोर्ड और केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालय—सबके अपने-अपने अधिकार क्षेत्र हैं। जब कोई अंडरपास या सड़क डूबती है, तो तुरंत एजेंसियों के बीच गुग्गी बंट जाती है। पीडब्ल्यूडी कहेगा कि निगम ने नाला साफ नहीं किया, निगम कहेगा कि जल बोर्ड के पंप खराब थे, और जल बोर्ड कहेगा कि डीडीए ने अवैध निर्माण करवा दिए जिससे नाला बंद हो गया। इस ‘टस से मस’ की राजनीति का शिकार आम दिल्लीवाला बनता है। जब तक ये एजेंसियां तय करें कि किसकी जिम्मेदारी है, तब तक पानी सूख जाता है, लेकिन परेशानी का दंश झेलना पड़ता है।
सरकार की तैयारियां फेल
इस साल भी जब दिल्ली डूबी, तो सियासत भी तेज हो गई। सत्ता पक्ष ने अपनी पीठ थपथपाते हुए दावा किया कि पिछले वर्षों की तुलना में इस बार जलभराव कम हुआ है और कुछ ही स्थानों पर पानी भरा है। वहीं, विपक्ष ने सरकार को घेरते हुए कहा कि पूरी दिल्ली जलमग्न हो गई और सरकार की तैयारियां फेल हो गईं। यह राजनीतिक बहस निंदनीय है। जलभराव की समस्या का समाधान ‘तुलनात्मक अध्ययन’ से नहीं निकलता। यह बात आम आदमी को समझने दें कि पिछले साल पांच फीसदी कम पानी भरा था या इस साल; उसे तो यह समझना है कि जब तक कोई इलाका पूरी तरह से पानी से मुक्त न हो जाए, तब तक सुधार अधूरा है। तुलनात्मक आंकड़े पेश करके सरकारें अपनी नाकामयाबी को ढकने का प्रयास करती हैं, जो ठीक नहीं है।
नालों की सफाई का जो नाटक हर साल खेला जाता है, उसकी पोल खुलकर सामने आती है। अक्सर देखा गया है कि ठेकेदारों द्वारा नालों से निकाला गया गीला अवशेष (मलबा) सीधे नाले के किनारे ही फेंक दिया जाता है। जैसे ही पहली बारिश होती है, यह मलबा फिर से नाले में बह जाता है और नाला चोक हो जाता है। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का एक प्रत्यक्ष प्रमाण है। जहां तक अधिकारियों की बात है, उन्हें इस बात का कोई डर नहीं होता कि उनकी लापरवाही के कारण किसी को नुकसान हो सकता है। क्योंकि जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया इतनी धीमी और जटिल है कि मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।
अगर दिल्ली को इस वार्षिक पीड़ा से मुक्त करना है, तो सोच में मौलिक बदलाव की जरूरत है। पहला कदम जवाबदेही तय करना होगा। यह स्पष्ट रूप से तय होना चाहिए कि किस सड़क और अंडरपास की जल निकासी की जिम्मेदारी किस विभाग या अधिकारी की है। अगर बारिश में वहां पानी भरता है, तो उस अधिकारी और ठेकेदार के खिलाफ स्वयं वहीं पर जुर्माना और कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए। दूसरा, नालों की सफाई का काम पारदर्शी तरीके से होना चाहिए। इसके लिए तीसरे पक्ष (Third Party) की निगरानी अनिवार्य करनी होगी और सफाई से पहले और बाद की तस्वीरों के आधार पर ही भुगतान किया जाना चाहिए।

प्रशासनिक विफलता
तकनीक का उपयोग भी इस समस्या को हल करने में अहम भूमिका निभा सकता है। आज के दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आईओटी (IoT) आधारित सेंसर्स का इस्तेमाल करके नालों और ड्रेनेज सिस्टम की रियल-टाइम मॉनिटरिंग की जा सकती है। इससे पहले ही पता लगाया जा सकता है कि कहां ब्लॉकेज हो रहा है और बारिश से पहले ही उसे दूर किया जा सकता है। साथ ही, दिल्ली को ‘स्पंज सिटी’ (Sponge City) के मॉडल पर विकसित करने की जरूरत है। इसके तहत सड़कों और पार्किंग लॉट्स में ऐसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाए जो पानी को सोख ले, जिससे ड्रेनेज सिस्टम पर बोझ कम हो। रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य बनाकर इमारतों से निकलने वाले पानी को सीवर लाइन में जाने से रोका जा सकता है।
दिल्ली सिर्फ कुछ नेताओं और अधिकारियों का शहर नहीं है, यहां करोड़ों आम लोग रहते हैं जो रोजाना कमाने खाने वाले मजदूर, कर्मचारी, व्यापारी और छात्र हैं। जाम में फंसकर घंटों बर्बाद करना उनकी आर्थिकी पर सीधा प्रहार है। एक अनुमान के अनुसार, जलभराव और यातायात जाम के कारण दिल्ली में हर साल हजारों करोड़ रुपये की समय और ईंधन की बर्बादी होती है। यह सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संपत्ति का नुकसान है।






















