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राम मंदिर न्यास, आस्था पर डाका, न्यास पर संशय

जब कोई व्यक्ति भगवान के दरबार में अपनी आमदनी का कुछ हिस्सा चढ़ाता है, तो उसके मन में यह विश्वास होता है कि उसका एक-एक पैसा 'मर्यादा पुरुषोत्तम' के कार्य में लगेगा। लेकिन जब उसी पैसे को लेकर चोरी और गबन की बातें सामने आती हैं, तो यह सिर्फ धन की हानि नहीं होती, बल्कि......

राम मंदिर न्यास की बेपर्द कहानी

HIGHLIGHTS

  • राम मंदिर न्यास में गबन
  • जनता का भरोसा ताक पर
  • राम मंदिर की भव्यता अधूरी
  • राम मंदिर न्यास का घोटाला
  • सच्चाई का दरबार खोलो

The grand temple of Lord Shri Ram in Ayodhya: अयोध्या में भगवान श्री राम के भव्य मंदिर के निर्माण और उसके संचालन को लेकर बनाए गए ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र न्यास’ में कथित धन गबन का मामला सामने आना किसी आम वित्तीय अनियमितता से कहीं अधिक गंभीर और दुखद है। यह मामला सिर्फ कुछ लाख या करोड़ रुपयों के हेरफेर तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने एक ऐसी बहस को जन्म दिया है जो करोड़ों भक्तों की आस्था, भावनाओं और उनके गहरे भरोसे से जुड़ा हुआ है। जब कोई व्यक्ति या संस्था धार्मिक आस्था के नाम पर चंदा एकत्र करता है, तो उसके प्रति जवाबदेही का स्तर भी सर्वोच्च होना चाहिए। ऐसे में न्यास के कोष में गड़बड़ी के आरोपों ने न सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था पर, बल्कि संघ-परिवार और उससे जुड़ी विचारधारा की साख पर भी गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

मामला सार्वजनिक

इस पूरे प्रकरण की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब से यह मामला सार्वजनिक हुआ है, तब से जिम्मेदारी तय करने के बजाय आरोपों को भटकाने और दिशाहीन करने का प्रयास किया गया। शुरुआत में तो यह कोशिश दिखी कि मामले को रफा-दफा कर दिया जाए या उसे बौना बताकर खारिज किया जाए, लेकिन जब दबाव बढ़ा तो सोमवार को न्यास की एक अहम बैठक में महासचिव चंपत राय और न्यासी अनिल मिश्रा के इस्तीफे स्वीकार कर लिए गए। अंतरिम व्यवस्था के तौर पर न्यास के एक अन्य सदस्य कृष्ण मोहन को महासचिव की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई।

अस्पष्टता और रहस्यमयी स्थिति

सतह पर देखें तो इस्तीफा देना और नई व्यवस्था लाना एक उचित कदम लगता है, लेकिन गहराई में उतरकर जब इसे परखा जाता है, तो यह सिर्फ जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का एक पुराना और घिसा-पिटा तरीका है। जब तक विशेष जांच दल (SIT) की अंतिम रिपोर्ट नहीं आ जाती, तब तक एक तरह की अस्पष्टता और रहस्यमयी स्थिति कायम रहेगी। सवाल यह है कि क्या किसी पद से इस्तीफा देने भर से भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से मुक्ति मिल जाती है? कानूनी दृष्टि से भ्रष्टाचार एक परिभाषित और संज्ञेय अपराध है, और ऐसे अपराध के लिए कठोर से कठोर सजा का प्रावधान है। अगर गबन हुआ है, तो उसकी भरपाई भी होनी चाहिए और दोषियों को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाना चाहिए। सिर्फ इस्तीफा इस मामले का हल नहीं हो सकता।

कई सवाल खड़े

इस मामले ने कई ऐसे सवाल खड़े किए हैं जिनका जवाब देना न्यास के लिए अनिवार्य हो गया है। न्यास के जिन गणमान्य लोगों पर इसके वित्त की निगरानी, पारदर्शिता सुनिश्चित करने और संपत्तियों की रक्षा का भारी दायित्व था, या तो उनके लिए ये तकाजे गैर-महत्वपूर्ण थे या फिर वे खुद ही कठघरे में खड़े नजर आ रहे हैं। इतने लंबे समय तक यह धंधा किसकी नजरों के बचकर, किसके संरक्षण में चलता रहा? जब तक यह मामला मीडिया में नहीं आया, तब तक न्यास के ऑडिटर, अधिकारी और शीर्ष पदाधिकारी क्या कर रहे थे? यदि कोई आम नागरिक सरकारी खजाने में थोड़ी सी भी अनियमितता करता है, तो कानून उसे तुरंत अपने शिकंजे में ले लेता है, तो फिर भगवान के घर के चंदे के साथ इस तरह का व्यवहार कैसे स्वीकार्य हो सकता है?

सबसे बड़ा शिकार ‘भरोसा’

सच्चाई यह है कि इस कथित गबन का सबसे बड़ा शिकार ‘भरोसा’ है। राम मंदिर का निर्माण कोई सरकारी या कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट नहीं है। इसकी नींव करोड़ों लोगों की आस्था, उनके स्नेह, उनकी कठिनाइयों में कमाए हुए पैसे और उनकी भक्ति पर टिकी हुई है। देश के कोने-कोने से गरीब से लेकर अमीर तक, हर उस व्यक्ति ने इस मंदिर में चढ़ावा दिया है, जिसे भगवान राम से अपना अटूट रिश्ता मानता है। किसी मां-बाप की गाढ़ी गर्मी में मेहनत का पैसा है, तो किसी किसान की फसल की कमाई। जब कोई व्यक्ति भगवान के दरबार में अपनी आमदनी का कुछ हिस्सा चढ़ाता है, तो उसके मन में यह विश्वास होता है कि उसका एक-एक पैसा ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ के कार्य में लगेगा। लेकिन जब उसी पैसे को लेकर चोरी और गबन की बातें सामने आती हैं, तो यह सिर्फ धन की हानि नहीं होती, बल्कि उस भक्त की आस्था पर कुल्हाड़ी मारी जाती है। यह किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं है।

न्यास के नए अंतरिम महासचिव कृष्ण मोहन का कहना है कि चंदा चोरी के मामले में जो भी दोषी पाया जाएगा, उसे सजा दिलाना उनकी प्राथमिकता होगी। यह कथन आशा जगाता जरूर है, लेकिन पिछले दशकों के अनुभव यह कहते हैं कि ऐसे मामलों में सजा तक पहुंचना बहुत मुश्किल हो जाता है। अक्सर निचले स्तर के कर्मचारियों या ठेकेदारों को बलि का बकरा बना दिया जाता है, जबकि असली सूत्रधार सुरक्षित घरों में बैठे निर्दोष बनकर साबित हो जाते हैं। इसलिए जांच एजेंसियों और प्रशासन के लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी बड़ा या रसूखदार व्यक्ति इस जांच से बच न सके। सत्ता और संगठन के दबाव में इस मामले को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।

सबसे बड़ी चुनौती

इस लुटिया खेल के बाद अब जो सबसे बड़ी चुनौती सामने है, वह है न्यास की कार्यप्रणाली में मूलभूत सुधार। यह सिर्फ कुछ लोगों को बदलने या इस्तीफा लेने से हल नहीं होने वाला। देश भर की जनता और भक्त अब यह देखना चाहते हैं कि मंदिर में आने वाले चढ़ावे, उसका खर्च, बैंक खातों की निगरानी और संपत्तियों के प्रबंधन के लिए ऐसी कौन सी अटूट और पारदर्शी व्यवस्था बनाई जा रही है, जिसमें भविष्य में कोई भी अनियमितता संभव ही न हो।

आज के डिजिटल युग में पारदर्शिता सुनिश्चित करना कोई मुश्किल काम नहीं है। न्यास को चाहिए कि वह एक ‘रियल-टाइम डैशबोर्ड’ का निर्माण कराए, जिस पर कोई भी आम नागरिक इंटरनेट के माध्यम से देख सके कि किस दिन, कितना चंदा आया, कहां जमा हुआ, कितनी राशि किस मद में खर्च हुई और बैलेंस कितना बचा है। इसके अलावा, न्यास के ऑडिट को किसी निजी चुनिंदा फर्म के बजाय भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) या उसके स्तर की किसी स्वतंत्र संस्था को सौंपा जाना चाहिए। तीर्थक्षेत्रों के प्रबंधन में लोकतांत्रिक जवाबदेही को शामिल किया जाना अब समय की मांग है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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