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मंत्रों में देवी, बिरयानी में सौदा

इंटरनेट पर तेजी से वायरल हुए उस वीडियो की बात करें तो, गुरुग्राम के एक कॉर्पोरेट पेशेवर को एक स्टैंड-अप कॉमेडी शो के दौरान माइक संभाले देखा गया। उसने बेहद आत्मविश्वास से अपनी किसी ‘डेट’ के किस्से को सुनाया।

370 रुपये का 'सौदा' और समाज का नंगा नाच (फाइल फोटो)

HIGHLIGHTS

  • करोड़ों की सैलरी, 370 की सोच
  • 'सभ्य' समाज का असभ्य ठहाका
  • रिश्ते बने 'रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट'
  • बिरयानी के बदले इज्जत?
  • मजाक की आड़ में नंगी मर्दानगी

A Bitter Truth A Story: भारतीय संस्कृति और उसके विरासती संस्कारों की बड़ी-बड़ी बातें तो हम सुनते आए हैं। पुस्तकों की पन्नियों पर, चमकीले मंचों पर और लंबे-चौड़े भाषणों में नारी को देवी का दर्जा दिया जाता है। श्लोकों का पाठ होता है कि ‘जहां नारियों की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं।’ लेकिन इस आदर्शवादी कवच के नीचे छिपी असलियत अक्सर बेहद कड़वी होती है। हाल ही में सामने आया वह मामला, जिसमें चंद सौ रुपये की एक बिरयानी ने किसी महिला की अस्मिता और ‘कीमत’ तय कर दी, इसी कटु सच का जीवंत प्रमाण है। यहां सबसे डरावनी बात यह नहीं थी कि किसी युवक ने ऐसी बात कही, बल्कि यह थी कि एक ऐसे वातावरण में उसे तालियां मिलीं, जो खुद को आधुनिक और पढ़ा-लिखा मानता है।

इंटरनेट पर तेजी से वायरल हुए उस वीडियो की बात करें तो, गुरुग्राम के एक कॉर्पोरेट पेशेवर को एक स्टैंड-अप कॉमेडी शो के दौरान माइक संभाले देखा गया। उसने बेहद आत्मविश्वास से अपनी किसी ‘डेट’ के किस्से को सुनाया, जिसमें उसने महज 370 रुपये का खाना खिलाकर लड़की से अपने उस ‘इन्वेस्टमेंट’ का फायदा उठाने के बारे में बताया। यह कोई आवेग में निकली हुई भड़की हुई बात नहीं थी। यह एक पूरी तरह से तैयार किया गया नैरेटिव था, जिसे उसने पंचलाइन की तरह परोसा। और सबसे शर्मनाक बात यह रही कि उस ऑडिटोरियम में बैठे लोगों ने उसकी इस घृणित ‘मर्दानगी’ पर खुलेआम ठहाके लगाए। यह हंसी किसी व्यंग्य की प्रशंसा नहीं थी, बल्कि एक सामूहिक मानसिकता का प्रदर्शन थी, जो औरतों को खर्च और रिटर्न के समीकरण में तौलने में कोई बुराई नहीं मानती।

कैबिनेट में फुसफुसाई जाने वाली घटिया

इस पूरे प्रकरण का सबसे गहरा पहलू यह है कि उस युवक के अंदर यह साहस और बेपरवाही आखिर आई कहां से? यह उसकी व्यक्तिगत प्रतिभा नहीं है, बल्कि हमारे समाज की दी गई धरोहर है। एक ऐसी धरोहर जहां बचपन से ही महिलाओं को लेकर अपमानजनक जोक्स, उनके शरीर को लेकर फब्तियां और मां-बहन को गाली के तौर पर इस्तेमाल करना एक ‘नॉर्मल’ सी बात मानी जाती है। जब कोई बीच-बचाव करता है, तो उसे ‘बोरिंग’ या ‘ओवर-रिएक्टिंग’ करार दे दिया जाता है। ऑफिस के कॉरिडोर से लेकर वॉट्सऐप के ग्रुप्स तक, इस तरह की बातों पर चुप्पी रखना वास्तव में एक तरह से नामंजूरी देने जैसा होता है। इसी चुप्पी ने एक दिन उस युवक को इतना हौसला दिया कि वह कैबिनेट में फुसफुसाई जाने वाली घटिया बातों को ओपन माइक पर ‘कंटेंट’ के रूप में प्रस्तुत कर बैठा।

इस घटना के बाद जो बहस छिड़ी, वह भी हमारे दोहरे मानदंडों को उजागर करती है। कुछ लोगों को यह बात सुकून देती है कि कंपनी ने उसे नौकरी से निकाल दिया, पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और महिला आयोग ने संज्ञान लिया। लेकिन सोशल मीडिया के एक बड़े वर्ग का रुख अभी भी कुछ और ही है। वे लगातार यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर ऐसा क्या हो गया? बस मजाक ही तो कर रहा था, नौकरी तक क्यों गई? यह सोच ही असली खतरा है। किसी व्यक्ति का चरित्र अब ऑफिस की दीवारों तक सीमित नहीं रहता। जो व्यक्ति सार्वजनिक मंच पर महिलाओं को वस्तु की तरह पेश करता हो, वह कॉर्पोरेट जगत में भी एक विषैला तत्व है। करोड़ों रुपये के पैकेज वाले इस ‘अल्ट्रा-मॉडर्न’ शहर की सोच अगर 370 रुपये में सिमट कर रह गई है, तो यह आर्थिक प्रगति की विफलता है।

सौदेबाजी की भाषा

यह घटना भारत केंद्रित होने के बावजूद एक वैश्विक संकट का हिस्सा है। पश्चिमी दुनिया में भी स्थितियां कुछ अलग नहीं हैं। ब्रिटेन में हाल ही में एक युवक ने डेट पर जाने के बाद लड़की को बिल भेज दिया, क्योंकि उसने अगली मुलाकात से इनकार कर दिया था। अमेरिका के कुछ चर्चित पॉडकास्टर्स खुलेआम लड़कियों से पूछते हैं कि डिनर के बदले में वे क्या दे सकती हैं? भाषा और तरीके बदल गए हैं, सौदेबाजी की भाषा अब थोड़ी और अंग्रेजी में पॉलिश्ड हो गई है, लेकिन मन का भेद समान रहा है।

इस विषय पर चर्चा करते हुए एक और अत्यंत दुखद पहलू सामने आता है—स्त्री-द्वेष का आंतरिकीकरण। इस मामले के बाद एक और वीडियो सामने आया, जिसमें उसी शो में डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही एक युवती समान ही आपत्तिजनक और घृणित भाषा का प्रयोग करती नजर आई। जब तक समाज लगातार महिलाओं को यह सिखाता रहेगा कि उनका अपमान कोई बड़ी बात नहीं है, तब तक महिलाएं भी खुद को उस हंसी का हिस्सा बनाते हुए अनजाने में उसी पितृसत्तात्मक सोच को मजबूत करेंगी।

मानसिकता में बदलाव

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) और वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट्स हमेशा से यह बताती रही हैं कि आर्थिक विकास के साथ-साथ मानसिकता में बदलाव आना जरूरी नहीं है। भारत जब तक जेंडर गैप की इस खाई को पाट नहीं लेता, तब तक 370 रुपये की बिरयानी जैसी घटनाएं सिर्फ एक व्यक्ति की करतूत नहीं, बल्कि सामूहिक नैतिक ह्रास का प्रतीक बनकर रहेंगी।

सौभाग्य से, आज का दौर सोशल मीडिया का दौर है। अब बंद कमरों की बातें और कॉर्पोरेट गलियारों के फुसफुसाहट सार्वजनिक हो रहे हैं। कुछ सेकंड का वीडियो आज किसी की भी कायरता और बदनीयती का सच सामने ला सकता है। लेकिन सिर्फ नौकरी छीन लेना या सोशल मीडिया पर भला-बुरा लिखना काफी नहीं है।

हमें यह समझना होगा कि समस्या उस युवक की अकेली नहीं है, समस्या उस माहौल की है जिसने उसे पलाया। यह बदलाव घरों से शुरू होगा, जहां बच्चों को पहली बार किसी अनुचित जोक पर टोका जाएगा। जहां यह समझाया जाएगा कि दूसरे की इज्जत पर खड़े होकर हंसना हास्य नहीं, अपराध है। जब तक हम रिश्तों को ‘रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट’ के फॉर्मूले से नहीं निकालेंगे और कंसेंट (सहमति) को बिल भरने की शर्त नहीं मान लेंगे, तब तक यह सांस्कृतिक विडंबना बनी रहेगी। शायद अब समय आ गया है कि हमें अपने उन प्राचीन मंत्रों में एक नई पंक्ति जोड़नी चाहिए—‘जहां नारी को एक इंसान के रूप में सम्मान और समानता मिले, वहीं सच्चे अर्थों में सभ्यता का वास होता है।’

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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