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बांकीपुर में ‘सियासी स्ट्रैटेजिस्ट’ की पहली असली परीक्षा

इस चुनाव को सबसे ज्यादा रोचक और चुनौतीपूर्ण बनाया है प्रशांत किशोर (PK) का प्रवेश। एक ऐसा शख्स, जिसने देश के तमाम बड़े नेताओं की जीत की रणनीति तैयार की, अब खुद मैदान में कूद पड़ा है। 'जन सुराज' पार्टी के बैनर तले प्रशांत किशोर ने बांकीपुर को अपनी राजनीतिक विरासत का पहला पन्ना चुना है।

बांकीपुर रणनीतिकार की राजनीतिक परीक्षा का गहरा संघर्ष (फाइल फोटो)

HIGHLIGHTS

  • संगठन की ताकत या रणनीतिकार का जादू?
  • बंटी की जमीनी पकड़ या PK का ब्रांड वैल्यू
  • बांकीपुर उपचुनाव में किसकी साधेगी बाजी?
  • नितिन नबीन की विरासत संभालेंगे अभिषेक 'बंटी'
  • भाजपा ने बांकीपुर में खेला 'स्थानीयता' कार्ड

बिहार की राजनीति में उपचुनाव को अक्सर ‘मिनी-चुनाव’ या आगामी बड़ी राजनीतिक लड़ाइयों के ‘सेमीफाइनल’ के रूप में देखा जाता है। इसी कड़ी में पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर 30 जुलाई को होने वाला मतदान और 3 अगस्त को आने वाले नतीजे, सिर्फ एक खाली सीट की पूर्ति से कहीं अधिक मायने रखते हैं।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के नेतृत्व में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनकर नितिन नबीन के राज्यसभा पहुंचने के बाद खाली हुई इस सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला काफी दिलचस्प हो चला है। एक ओर जहां भाजपा ने अपने संगठनात्मक ढांचे पर भरोसा करते हुए अभिषेक कुमार सिन्हा ‘बंटी’ को टिकट दिया है, वहीं दूसरी ओर चुनावी रणनीतिकार से नेता बदले प्रशांत किशोर की एंट्री ने इस उपचुनाव को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है।

‘स्टार प्रजेंस’ से ‘ग्राउंड रियलिटी’ की ओर

बांकीपुर जैसी शहरी और प्रभावशाली सीट से भाजपा द्वारा अभिषेक कुमार सिन्हा बंटी को चुनाव मैदान में उतारने का निर्णय गहरी राजनीतिक समझ को दर्शाता है। आमतौर पर उपचुनावों में पार्टियां किसी मंत्री या बड़े चेहरे को उतारकर जीत सुनिश्चित करने की कोशिश करती हैं, लेकिन भाजपा ने इस परंपरा को तोड़ा। अभिषेक कुमार एक आम कार्यकर्ता की छवि से बड़े नेता तक का सफर तय करने वाले युवा चेहरे हैं। नितिन नबीन के सबसे करीबी लोगों में शुमार किए जाने वाले अभिषेक का चयन इसलिए भी समझदारी भरा है क्योंकि वे न सिर्फ बांकीपुर के स्थानीय हैं, बल्कि भाजयुमो (BJYM) के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में पटना महानगर की राजनीति में जमीनी स्तर पर खूब पसीना बहा चुके हैं।

जातिगत समीकरण को देखें तो अभिषेक कुमार कायस्थ समुदाय से आते हैं। बांकीपुर में कायस्थ वोटरों की तादाद लगभग 14 से 15 प्रतिशत है, जो नतीजे को पलटने की क्षमता रखती है। नितिन नबीन कायस्थ नेता थे और उनके उत्तराधिकारी के तौर पर अभिषेक को मैदान में उतारकर भाजपा ने इस वोट बैंक को एकजुट रखने की कोशिश की है। अभिषेक कुमार का बयान—”काम बोलता है”—उनकी रणनीति का आधार है। वे प्रशांत किशोर की ‘स्टारडम’ को अपने संगठन के ‘पैरवार’ और विकास के कामों से भिड़ाने की तैयारी में हैं। पिछले तीन दशकों से बांकीपुर भाजपा का गढ़ रहा है, ऐसे में पार्टी यहां किसी बाहरी चेहरे पर दांव लगाकर अपनी स्थानीय पहचान को कमजोर नहीं करना चाहती थी।

रणनीतिकार से नेता बनने की ‘अग्निपरीक्षा’

इस चुनाव को सबसे ज्यादा रोचक और चुनौतीपूर्ण बनाया है प्रशांत किशोर (PK) का प्रवेश। एक ऐसा शख्स, जिसने देश के तमाम बड़े नेताओं की जीत की रणनीति तैयार की, अब खुद मैदान में कूद पड़ा है। ‘जन सुराज’ पार्टी के बैनर तले प्रशांत किशोर ने बांकीपुर को अपनी राजनीतिक विरासत का पहला पन्ना चुना है। उनका इस सीट को चुनना कोई संयोग नहीं है। वे जानते हैं कि अगर उन्हें राजनीति में अपनी जमीन तलाशनी है, तो उन्हें किसी कमजोर सीट से नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के सबसे मजबूत किले (भाजपा के गढ़) को ढहाने का साहस दिखाना होगा।

प्रशांत किशोर की चुनौती इसलिए भी दोगुनी है क्योंकि उनका मुकाबला सीधा भाजपा के संगठन से नहीं, बल्कि एक ‘परिवर्तन’ की उम्मीद से है। उनकी रणनीति स्पष्ट है—जनसंपर्क, पदयात्रा और लोगों की समस्याओं को सुनकर एक अलग तरह की राजनीति का नारा देना। हालांकि, चुनावी रणनीति बनाना और खुद वोट जुटाने में दो अलग बातें हैं। प्रशांत किशोर के लिए यहां हार-जीत का आंकड़ा उतना मायने नहीं रखता जितना उनके वोट शेयर का प्रतिशत। अगर वे भाजपा के वोटों में सेंध लगाने या महागठबंधन के पारंपरिक वोटबैंक को अपनी ओर खींचने में सफल रहते हैं, तो बिहार की 2025 की विधानसभा चुनाव की राजनीति में ‘जन सुराज’ को तीसरा मोर्चे के रूप में स्थापित कर देंगे। लेकिन अगर उन्हें निराशाजनक प्रदर्शन करना पड़ा, तो ‘जुगाड़ू राजनीति’ के इस मास्टरमाइंड की छवि पर गंभीर आंच आएगी।

शहरी मतदाता का मिजाज और चुनावी निहार

बांकीपुर बिहार की राजधानी पटना का हृदय है। यहां का मतदाता राजनीतिक रूप से जागरूक माना जाता है। यहां जातिवाद के साथ-साथ विकास, कानून-व्यवस्था, शहरी बुनियादी ढांचा (सड़क, जल निकासी, सफाई) और रोजगार जैसे मुद्दे चुनावी मौसम में गूंजते हैं। भाजपा इन मुद्दों पर नितिन नबीन के कामों को अभिषेक कुमार के जरिए जनता के सामने रखेगी। प्रशांत किशोर इन्हीं विफलताओं या ‘अधूरे विकास’ को लेकर सरकार और स्थानीय प्रशासन को घेरेंगे।

इस उपचुनाव का एक बड़ा पैमाना यह भी होगा कि शहरी युवा वोटर, जो अक्सर चुनाव में उतनी बड़ी संख्या में मतदान नहीं करता, प्रशांत किशोर के ‘नई राजनीति’ के नारे से जुड़कर बूथ तक पहुंचता है या नहीं। अभिषेक कुमार के लिए फायदा यह है कि उनके पास भाजपा का पूरा संगठनात्मक मशीनरी चलाने का अनुभव है। पंचायत स्तर से लेकर बूथ लेवल तक कार्यकर्ताओं का एक बड़ा नेटवर्क उनके साथ खड़ा है, जो अक्सर चुनाव जीतने का आधार साबित होता है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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