Strait of Hormuz: मध्य पूर्व (Middle East) का वो नक्शा देखिए जहां ईरान और ओमान के बीच एक संकरा समुद्री रास्ते नजर आता है। इसे होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) कहा जाता है। दुनिया भर में जितना भी कच्चा तेल (Crude Oil) समुद्री रास्ते से ट्रेड होता है, उसका लगभग एक-तिहाई हिस्सा इसी गलियारे से गुजरता है। आसान शब्दों में कहें तो यह ग्लोबल एनर्जी सप्लाई चेन की ‘लाइफलाइन’ है।
लेकिन, अभी के समय में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने इस रास्ते को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। ईरान की सेना (IRGC) द्वारा इस मार्ग पर अड़चन डाले जाने की धमकियां लगातार आ रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर आज ही होर्मुज पूरी तरह से बंद हो जाए, तो आम आदमी की जेब पर क्या असर पड़ेगा? पेट्रोल और डीजल कितना महंगा होगा? आइए इस पूरे गणित को समझते हैं।
क्यों बढ़ती हैं तेल की कीमतें?
जब भी किसी युद्ध या सैन्य तनाव की स्थिति बनती है, तो कच्चे तेल की कीमतें इसलिए नहीं बढ़तीं क्योंकि तेल खत्म हो गया है, बल्कि इसलिए बढ़ती हैं क्योंकि “सप्लाई रुकने का डर” पैदा हो जाता है। होर्मुज बंद होने का सीधा असर तीन तरह से दिखता है:
- बढ़ा हुआ ‘वॉर रिस्क प्रीमियम’: जब तक सामान सुरक्षित न हो, तब तक उसका बीमा महंगा होता है। शिपिंग कंपनियों को इस जोखिम भरे इलाके से टैंकर निकालने के लिए बीमा कंपनियों को कई गुना ज्यादा प्रीमियम देना पड़ता है।
- फ्रेट (मालभाड़ा) चार्ज में उछाल: युद्ध के डर से जहाज़ों की उपलब्धता कम हो जाती है और लंबे रूट (जैसे अफ्रीका के चारों ओर घूमकर जाना) अपनाने पड़ते हैं। इससे ट्रांसपोर्टेशन का खर्च आसमान छू जाता है।
- फ्यूचर मार्केट की सटोरियां: दुनिया के फाइनेंशियल मार्केट में बैठे ट्रेडर्स, असल में कमी आने से पहले ही तेल के रेट बढ़ा देते हैं। वे भविष्य में मुनाफा कमाने के लिए क्रूड ऑयल फ्यूचर्स (Futures) खरीद लेते हैं, जिससे कीमतें तेजी से बढ़ती हैं।
भारत पर कितना भारी पड़ेगा यह झटका?
भारत की अर्थव्यवस्था तेल पर कितनी निर्भर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हम अपनी कुल जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से खरीदते हैं। इराक, सऊदी अरब और UAE जैसे देश हमारे सबसे बड़े सप्लायर हैं और इन सबका तेल होर्मुज स्ट्रेट से ही निकलता है।
पेट्रोल-डीजल के दामों का गणित
अगर होर्मुज बंद होने की स्थिति बनती है, तो ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल (Brent Crude) के दाम आसानी से 150 डॉलर से लेकर 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकते हैं। भारत में पेट्रोल और डीजल का अंतिम दाम कच्चे तेल की कीमत, डॉलर के मुकाबले रुपये की वैल्यू (एक्सचेंज रेट), और सरकारी टैक्स (एक्साइज ड्यूटी और वैट) के आधार पर तय होता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसी स्थिति में भारतीय पंपों पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक झटके में 20 से 30 रुपये प्रति लीटर तक की भारी वृद्धि हो सकती है।
सिर्फ कार और बाइक नहीं, रसोई भी होगी महंगी
यह संकट केवल वाहन चलाने वालों के लिए नहीं है। होर्मुज स्ट्रेट से होकर दुनिया भर में बड़ी मात्रा में एलपीजी (LPG – रसोई गैस) और एलएनजी (LNG – प्राकृतिक गैस) का भी परिवहन होता है। भारत भी इनका बड़ा आयातक है। गलियारा बंद होने का मतलब सीधा है कि घरेलू गैस सिलेंडरों के दाम छूटने और बिजली उत्पादन लागत बढ़ने वाली है।
महंगाई की बौछार और अर्थव्यवस्था पर बोझ
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे खतरनाक पहलू ‘महंगाई दर’ है। भारतीय रेलवे और ट्रकों का पूरा नेटवर्क डीजल पर चलता है। अगर डीजल 20-30 रुपये महंगा हो जाता है, तो ट्रांसपोर्टेशन का खर्च दोगुना हो जाएगा।
- सब्जियों और फलों का तेजी से सड़ना: ट्रांसपोर्टेशन महंगा होने के कारण ट्रक ऑपरेटर्स लंबे रूटों से बचने या खर्च बचाने के लिए माल को ठंडे बस्तों (कोल्ड स्टोरेज) में कम रखकर जल्दी निकालने की कोशिश करेंगे। इससे खाद्य पदार्थों की बर्बादी बढ़ेगी और बाजार में सप्लाई कम होगी, जिससे सब्जियां-फल आसमान छू लेंगे।
- फैक्ट्रियों का उत्पादन: औद्योगिक क्षेत्र में ईंधन की लागत बढ़ने से फैक्ट्रियों का प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ेगा। यह बढ़ा हुआ खर्च अंततः आम उपभोक्ता को ही देना होगा, चाहे वह साबुन खरीद रहा हो या कपड़े।























