Degree vs Skills Gap Noida: दिल्ली एनसीआर के नोएडा सेक्टर में इन दिनों जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे भारत की चमकदार अर्थव्यवस्था की ‘काली असलियत’ से रूबरू कराती हैं। यहां की फैक्ट्रियों और कॉरपोरेट ऑफिस के बाहर वो युवा नारे लगा रहे हैं, जिनके हाथ में तो डिग्रियां हैं, लेकिन जेब में महज 10 से 12 हजार रुपये की मजदूरी आ रही है।
एक महिला कर्मचारी का दर्दनाक बयान यह है कि 15 हजार देते हैं, 25 हजार बताते हैं…” —सिर्फ एक व्यक्ति का दर्द नहीं, बल्कि लाखों भारतीय युवाओं की उस निराशा की आवाज है, जो डिग्री लेकर बाजार में उतरे और ठगे गए। बीए (BA), बीकॉम (BCom) और बीटेक (B.Tech) जैसी डिग्रियों के बावजूद ये युवा इतनी कम सैलरी पर काम करने को क्यों मजबूर हैं? और इतना श्रम करने के बावजूद उन्हें एक सामान्य कर्मचारी का भी दर्जा क्यों नहीं मिल रहा?
डिग्री तो है, पर ‘काबिलियत’ कहां?
‘इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2026’ के ताजा आंकड़े इस संकट को समझने में मदद करते हैं। रिपोर्ट बताती है कि भले ही देश में ग्रेजुएट्स की ‘एम्प्लॉयबिलिटी’ (रोजगार पाने की क्षमता) में मामूली सुधार हुआ हो, लेकिन अभी भी एक बड़ी खाई मौजूद है।
- आर्ट्स और कॉमर्स: बीए और बीकॉम ग्रेजुएट्स की एम्प्लॉयबिलिटी दर महज 55.5% है। यानी करीब आधे छात्र डिग्री हाथ में लेकर भी कंपनी की जरूरतों के हिसाब से ‘फिट’ नहीं हैं।
- इंजीनियरिंग: आईटी और कंप्यूटर साइंस में यह आंकड़ा 80% तक पहुंचता है, लेकिन इंजीनियरिंग की अन्य कोर ब्रांचों के छात्रों की हालत बद से बदतर है।
वहीं, ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026’ रिपोर्ट तो और भी चौंकाने वाला खुलासा करती है। इसके अनुसार, 25 साल से कम उम्र के करीब 40% ग्रेजुएट्स या तो बेरोजगार हैं, या अपनी योग्यता और डिग्री से कई पायदान नीचे का काम करने को मजबूर हैं।
कंपनियों का ‘शोषण’ और ‘सस्ती मजदूरी’ का चक्र
जब एक युवा के पास सिर्फ ‘कागजी डिग्री’ हो और प्रैक्टिकल (व्यावहारिक) ज्ञान शून्य हो, तो कॉरपोरेट सेक्टर उसे बस ‘कच्चा माल’ समझता है। कंपनियों का तर्क होता है कि इन्हें काम करना नहीं आता, इसलिए हमें उन्हें नए सिरे से सिखाना पड़ेगा। इसी ‘ट्रेनिंग’ के नाम पर उनकी सैलरी में कटौती की जाती है। स्किल की कमी का सबसे बड़ा कहर यह है कि युवा ‘बारगेनिंग’ (मोलभाव) करने की स्थिति में नहीं रहते। डर और जरूरत के मारे वे 10-12 हजार रुपये की नौकरी को थपथपा लेते हैं, क्योंकि उनके पास कोई ‘स्पेशलाइज्ड स्किल’ नहीं होती, जिसके दम पर वे कंपनी के सामने दम भर सकें।
‘रट्टा मार पढ़ाई’ ने दिखाई असलियत
नोएडा का यह आंदोलन सीधे तौर पर भारत के पुराने ‘एजुकेशन मॉडल’ पर सवालिया निशान लगाता है। विशेषज्ञों की मानें तो अब ‘मार्क्स’ (नंबर) की रेस छोड़कर ‘मार्केट’ (बाजार) की जरूरत को समझना होगा। सिर्फ थ्योरी पढ़ाने वाले सिस्टम को बदलकर स्कूल-कॉलेज स्तर से ही इंटर्नशिप और वोकेशनल ट्रेनिंग को अनिवार्य करना होगा।
हालांकि, सरकार नई शिक्षा नीति (NEP) और ‘स्किल इंडिया’ मिशन के जरिए 12वीं कक्षा के साथ ही छात्रों को प्रोफेशनल स्किल्स सिखाने पर जोर दे रही है, ताकि वे ‘जॉब सीकर’ (नौकरी तलाशने वाले) के बजाय ‘जॉब रेडी’ (नौकरी के लिए तैयार) बन सकें। लेकिन इस बदलाव को जमीनी स्तर पर आने में अभी समय लगेगा।
क्या है समाधान?
- व्यक्तिगत स्तर पर: अगर आप वर्तमान में कोई छात्र हैं, तो सिर्फ डिग्री के भरोसे न रहें। आज के दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा एनालिटिक्स, डिजिटल मार्केटिंग या एडवांस्ड कोडिंग जैसे 3 से 6 महीने के शॉर्ट-टर्म स्किल कोर्सेज आपकी मार्केट वैल्यू को 10 हजार से बढ़ाकर 50-60 हजार तक ले जा सकते हैं।
- सामूहिक स्तर पर: जहां तक कंपनियों का सवाल है, नोएडा का प्रोटेस्ट यह साफ करता है कि सिर्फ ‘स्किल न होने’ का तोहमत छात्रों पर थोपना सही नहीं है। कंपनियां तय सैलरी के नाम पर धोखाधड़ी कर रही हैं और इन युवाओं को एक सामान्य कर्मचारी को मिलने वाले बुनियादी हक—जैसे ईएसआई (ESI), पीएफ (PF), ओवरटाइम और सम्मानजनक वेतन—से वंचित रख रही हैं।
नोएडा की सड़कों पर उतरे ये ग्रेजुएट्स किसी नौकरी की मांग नहीं कर रहे, बल्कि अपनी शिक्षा और श्रम का उचित मूल्य मांग रहे हैं। यह आंदोलन एक चेतावनी है कि अगर शिक्षा और रोजगार के बीच की यह खाई जल्द नहीं भरी, तो भारत का ‘डिमोग्राफिक डिविडेंड’ (जनसंख्या लाभ) जल्द ही ‘डिमोग्राफिक डिजास्टर’ (जनसंख्या संकट) में बदल सकता है।




















