The Unique Custom of Wet Nurses in the 19th Century: आज के दौर में अगर किसी वजह से नवजात शिशु को मां का दूध नहीं मिल पाता है, तो तुरंत डॉक्टरी सलाह पर फॉर्मूला मिल्क, स्टेरलाइज्ड बोतलें और अस्पतालों की आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि 19वीं सदी और 20वीं सदी की शुरुआत में ऐसा नहीं था? उस दौर में अगर प्रसव के दौरान मां की मौत हो जाती थी या वह किसी बीमारी या कुपोषण के कारण बच्चे को दूध नहीं पिला पाती थी, तो परिवार नवजात का मुंह सीधे बकरी के थन से सटा देता था।
जी हां, उस दौर में बकरी बच्चे की अस्थायी ‘दूध मां’ बन जाती थी और मां की तरह ही बच्चे की प्यास बुझाती थी। आइए जानते हैं इस अनोखी और हैरान करने वाली ऐतिहासिक प्रथा के बारे में…
गांवों में वेट नर्स का न होना, बकरी को बनाया गया सहारा
उस समय ग्रामीण इलाकों में अस्पताल, डॉक्टर और आधुनिक मातृ सहायता प्रणाली दूर-दूर तक नहीं पहुंची थी। शिशु की जिंदगी बचाना पूरी तरह घरेलू संसाधनों पर निर्भर था। अमीर परिवारों के लिए ‘वेट नर्स’ (दूध पिलाने वाली मां) सबसे अच्छा विकल्प थी, लेकिन दूरदराज के इलाकों में पैसों के अभाव और उपलब्धता न होने के कारण यह संभव नहीं होता था। ऐसे में बकरियां ही नवजात शिशुओं के लिए जीवन रक्षक का काम करती थीं।
क्यों चुनी गई बकरी, गाय नहीं?
इसके पीछे कई व्यावहारिक कारण थे:
- आसान रखरखाव: बकरियां कम जगह में रह लेती थीं और कम भोजन पर भी चल जाती थीं।
- पचने में आसान दूध: गाय के दूध की तुलना में बकरी का दूध हल्का और पचने में आसान माना जाता था।
- ताजा और गर्म दूध: 19वीं सदी में पाश्चुरीकरण (Pasteurization) या फॉर्मूला मिल्क का ज्ञान नहीं था। ऐसे में बकरी से ताजा और गर्म दूध सीधे पिलाना सबसे सुरक्षित विकल्प लगता था।
- शांत स्वभाव: बकरियां शांत स्वभाव की होती थीं, इसलिए जब बच्चे को उनके पास लिटाकर या गोद में लेकर थन मुंह में दिया जाता, तो वे इस प्रक्रिया को शांति से सहन कर लेती थीं।
यूरोप के अनाथालयों से लेकर भारत के गांवों तक फैली प्रथा
यह प्रथा केवल भारत तक सीमित नहीं थी। इतिहासकारों के अनुसार, 16वीं से 19वीं सदी तक यूरोप के कई हिस्सों में भी शिशुओं को बकरी का दूध पिलाया जाता था। यूरोप के अनाथालयों में बच्चों को दूध पिलाने के लिए विशेष रूप से बकरियां रखी जाती थीं। यहां तक कि कई बच्चे बकरियों से इतने जुड़ जाते थे कि उन्हें अपनी असली मां समझने लगते थे।
वहीं, भारत के ग्रामीण इलाकों में भी जहां स्तनपान संभव नहीं होता था, वहां बकरी का दूध ही एकमात्र सहारा होता था। बकरियां न केवल बच्चे को पोषण देती थीं, बल्कि उनके पास लेटने से बच्चे को गर्मी और सुरक्षा की भावना भी मिलती थी। यह व्यवस्था आदर्श जरूर नहीं थी, लेकिन बच्चे की जान बचाने का एक मजबूर जरिया जरूर थी।
क्या कहता है आधुनिक विज्ञान?
आधुनिक विज्ञान और डॉक्टरों के अनुसार, बकरी का दूध नवजात शिशुओं के लिए पूरी तरह उपयुक्त नहीं होता। इसमें मौजूद कुछ प्रोटीन और खनिज (Minerals) नवजात की नाजुक पाचन व्यवस्था पर भारी पड़ सकते हैं। लेकिन, उस दौर में जब जीने के लिए विकल्प ही नहीं थे, तो यह दूध ही शिशुओं का जीवन रक्षक साबित होता था और कई बच्चे इसी दूध पर पलकर स्वस्थ बड़े हुए।
20वीं सदी में चिकित्सा विज्ञान की प्रगति हुई। स्टेरलाइज्ड रबर निप्पल, बोतलें और फॉर्मूला मिल्क के आने के बाद शिशु को सीधे जानवर के थन से दूध पिलाने की यह प्रथा धीरे-धीरे खत्म हो गई और आज यह सिर्फ इतिहास के पन्नों में ही दर्ज है।
























