चौंकाने वाली रस्म: पश्चिम बंगाल में दूध-कपूर के साथ पिया जाता है पीरियड्स का खून!

shocking ritual: यह परंपरा बाउल दर्शन के उस सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें शरीर को मंदिर माना जाता है। उनकी तांत्रिक और सहजिया परंपरा में शारीरिक द्रव्यों (bodily fluids) को ऊर्जा का स्रोत माना जाता है।

जहां समाज मानता है 'अशुद्ध', वहीं बाउल समुदाय पीकर करता है पीरियड ब्लड का 'सम्मान' (फाइल फोटो)

HIGHLIGHTS

  • बाउल समुदाय में मासिक रक्त को बनाया जाता है पीने वाला मिश्रण
  • पश्चिम बंगाल के इस समुदाय की परंपरा जानकर उड़ जाएंगे होश
  • अशुद्ध नहीं, बल्कि 'देवी' का रूप! पहले पीरियड पर खून पीकर देते हैं बधाई
  • क्या पीरियड ब्लड पीने से बढ़ती है याददाश्त?
  • मानवशास्त्रियों ने खोले बाउल समुदाय के राज़

shocking ritual: भारत की सांस्कृतिक विविधता कई रहस्यमयी और अनोखी परंपराओं से भरी है, जिनके बारे में सुनकर आम इंसान के होश उड़ जाएंगे। ऐसी ही एक चौंकाने वाली रस्म पश्चिम बंगाल के ‘बाउल’ समुदाय में सदियों से प्रचलित रही है। यहां लड़कियों के पहले मासिक धर्म (पीरियड्स) के खून को दूध और कपूर के साथ मिलाकर पिया जाता है। इस खौफनाक से लगने वाले नियम के पीछे एक अलग ही धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यता माना जाता रहा है।

‘फूल खिलना’ माना जाता है पहला पीरियड

बता दें कि बाउल समुदाय (जो मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में रहता है) में लड़की के पहले मासिक धर्म को शुभ माना जाता है और इेे को ‘फूल खिलना’ कहा जाता है। मान्यता के अनुसार, इस दौरान निकलने वाले रक्त को दूध में मिलाकर परिवार के सदस्य या खुद लड़की पीती है। कई बार इसमें कपूर भी मिलाया जाता है। बाउल महिलाओं का विश्वास है कि यह अनोखा मिश्रण याददाश्त मजबूत करने वाला टॉनिक है और यह शरीर व मन को असीम शक्ति प्रदान करता है।

शरीर को माना जाता है मंदिर, ‘चार चंद्रमा’ की अवधारणा

यह परंपरा बाउल दर्शन के उस सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें शरीर को मंदिर माना जाता है। उनकी तांत्रिक और सहजिया परंपरा में शारीरिक द्रव्यों (bodily fluids) को ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। बाउल समुदाय में ‘चार चंद्रमा’ की अवधारणा बहुत प्रसिद्ध है – इसमें मासिक रक्त, वीर्य, मूत्र और लार को शरीर की ऊर्जा का हिस्सा माना जाता है।

अशुद्ध नहीं, बल्कि देवी का रूप

जहां देश के ज्यादातर हिस्सों में मासिक धर्म को अछूत या अशुद्ध मानकर छुपाया जाता है, वहीं बाउल समुदाय में इसके उलट लड़कियों को देवी की तरह पूजा जाता है। मासिक रक्त को ‘रज’ या ‘पुष्प’ कहकर सम्मान दिया जाता है। इस रस्म के दौरान परिवार के लोग लड़की के चारों ओर इकट्ठा होते हैं और विशेष भक्ति गीत गाए जाते हैं।

मानवशास्त्रियों ने भी की पुष्टि

यह कोई कहानी नहीं, बल्कि मानवशास्त्रियों के अध्ययनों में भी इसका जिक्र मिलता है। मानवशास्त्री क्रिस्टिन हैनसेन (Kristin Hanssen) की रिसर्च में बाउल महिला ‘तारा’ का उदाहरण दिया गया है, जहां पहले पीरियड्स के दौरान यह रस्म पूरे धूमधाम से निभाई गई थी। हालांकि, यह प्रथा पूरे बाउल समुदाय में सार्वजनिक रूप से नहीं है, बल्कि कुछ विशिष्ट परिवारों और गुरु-शिष्या परंपरा तक सीमित है।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

हाल ही में जब यह परंपरा सोशल मीडिया पर वायरल हुई, तो लोगों की प्रतिक्रियाएं मिश्रित रहीं। एक यूजर ने लिखा, “पीरियड्स का खून पीना? यह तो कल्पना से परे है।” वहीं, कुछ लोगों ने इसे सांस्कृतिक विविधता का उदाहरण बताते हुए कहा, “बाउल लोग मासिक रक्त को पवित्र मानते हैं, जबकि बाकी समाज इसे अशुद्ध कहता है। यह सोचने पर मजबूर करता है।”

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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