Sanjay Nirupam’s statement News: शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम के एक बयान ने अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, जामिया मिल्लिया इस्लामिया और कांग्रेस की प्रस्तावित रैली को लेकर राजनीतिक बहस छेड़ दी है। संजय निरुपम ने अभिनेता नसीरुद्दीन शाह की राजनीतिक टिप्पणियों पर आपत्ति जताते हुए उन पर भाजपा का विरोध करते-करते देश के खिलाफ माहौल बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने अभिनेता से सार्वजनिक जीवन में अपनी गरिमा और प्रतिष्ठा बनाए रखने की अपील भी की।
संजय निरुपम ने कांग्रेस की 1 नवंबर को रामलीला मैदान में प्रस्तावित रैली पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि त्योहारों के मौसम में प्रदर्शन से दिल्ली के कारोबारियों को नुकसान हो सकता है। उन्होंने 1984 के सिख-विरोधी दंगों की बरसी का उल्लेख करते हुए कांग्रेस से पूछा कि क्या इस तारीख़ पर रैली करना सिख समुदाय के घावों को फिर से कुरेदने जैसा नहीं है। इसके अलावा, उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया में कथित भारत-विरोधी नारों और गतिविधियों को लेकर चिंता जताई।
नसीरुद्दीन शाह की टिप्पणियों पर निरुपम की प्रतिक्रिया
संजय निरुपम ने कहा कि नसीरुद्दीन शाह को देश के लाखों दर्शक एक प्रतिभाशाली अभिनेता के रूप में पसंद करते हैं। हालांकि, उनके मुताबिक शाह की हालिया राजनीतिक टिप्पणियां एक कलाकार की छवि से अलग नजर आती हैं। संजय निरुपम ने उन पर भाजपा-विरोध के नाम पर भारत की एकता और अखंडता के खिलाफ अभियान चलाने का आरोप लगाया।
उन्होंने यह आशंका भी जताई कि राजनीतिक विचारों और दूसरे समूहों के प्रभाव में शाह भाजपा का विरोध करते-करते देश-विरोधी रुख न अपना लें। निरुपम की ये टिप्पणियां कड़ी और विवादास्पद भाषा में सामने आईं। उन्होंने नसीरुद्दीन शाह को नसीहत देते हुए कहा कि कलाकार की समाज में एक प्रतिष्ठा होती है और उसे बनाए रखना कलाकार की जिम्मेदारी है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि देश-विरोधी गतिविधियों से जुड़े आरोप संजय निरुपम के राजनीतिक दावे हैं। उपलब्ध बयान में इन आरोपों के समर्थन में कोई स्वतंत्र प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया। इसलिए इन्हें स्थापित तथ्य के बजाय निरुपम के आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
1 नवंबर की रैली और दिल्ली के कारोबारियों का मुद्दा
कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त और एसआईआर के विरोध में 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रदर्शन की योजना बनाई थी। निरुपम ने कहा कि सरकार की नीतियों का विरोध करना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन प्रदर्शन की तारीख़ और उसके संभावित असर पर विचार किया जाना चाहिए।
उनका दावा था कि दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों और अव्यवस्था के कारण दुकानदारों तथा व्यापारियों को नुकसान हो रहा है। उन्होंने त्योहारों के समय रैली आयोजित करने को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि इससे बाजारों और स्थानीय कारोबार पर असर पड़ सकता है। हालांकि, दिल्ली की अर्थव्यवस्था पर प्रदर्शन के प्रभाव के बारे में निरुपम ने जो बात कही, वह उनका दावा था; लेख में इसे स्वतंत्र रूप से पुष्ट आंकड़े के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।
1984 के सिख-विरोधी दंगों का संदर्भ
संजय निरुपम ने 1 नवंबर की तारीख़ को 1984 के सिख-विरोधी दंगों से जोड़ते हुए कांग्रेस की आलोचना की। 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली समेत कई जगहों पर सिख समुदाय के खिलाफ हिंसा हुई थी। इन दंगों में बड़ी संख्या में लोग मारे गए और अनेक परिवार प्रभावित हुए।
संजय निरुपम ने आरोप लगाया कि कांग्रेस की प्रस्तावित रैली की तारीख़ सिख समुदाय के लिए पीड़ादायक स्मृति से जुड़ी है। उन्होंने पार्टी से पूछा कि क्या 1 नवंबर को प्रदर्शन आयोजित करना उन लोगों के जख्मों को फिर से ताजा कर सकता है। दंगों की जिम्मेदारी और राजनीतिक जवाबदेही पर देश में लंबे समय से बहस होती रही है; इस संदर्भ में निरुपम की टिप्पणी भी उसी राजनीतिक विवाद का हिस्सा है।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया को लेकर आरोप
जामिया मिल्लिया इस्लामिया भारत का एक प्रमुख शैक्षणिक संस्थान है, जिसकी स्थापना राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं और शिक्षाविदों ने की थी। निरुपम ने संस्थान की ऐतिहासिक भूमिका का उल्लेख करने के बाद दावा किया कि हाल के वर्षों में वहां कुछ गतिविधियां चिंताजनक रही हैं। उन्होंने परिसर की दीवारों पर कश्मीर की आजादी और शरजील इमाम की रिहाई से जुड़े कथित नारों का हवाला दिया।
संजय निरुपम ने इन घटनाओं के आधार पर संस्थान में भारत-विरोधी और कट्टरपंथी तत्वों की मौजूदगी का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली पुलिस और सरकार को परिसर पर निगरानी रखनी चाहिए। अपने बयान में उन्होंने जामिया को “मिनी पाकिस्तान” बनने की आशंका जताई और कहा कि राजनीतिक गतिविधियों में रुचि रखने वाले छात्रों को पढ़ाई के माहौल से अलग रखा जाना चाहिए।
ये आरोप गंभीर हैं और इन्हें संस्थान या उसके विद्यार्थियों के बारे में प्रमाणित निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। किसी विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों या व्यक्तियों से जुड़ी घटनाओं के आधार पर पूरे संस्थान और उसके समुदाय को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। ऐसे मामलों में तथ्य, जांच और संबंधित पक्षों का पक्ष सामने रखना जरूरी है।



























