Brazil Presidential Election: ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव में लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने कड़े मुकाबले में कंजर्वेटिव उम्मीदवार फ्लावियो बोल्सोनारो को हराकर जीत दर्ज की है। निर्वाचन प्राधिकरण के मुताबिक, लूला को 51.75 प्रतिशत वोट मिले, जबकि फ्लावियो को 48.25 प्रतिशत मत हासिल हुए। इस नतीजे के साथ लैटिन अमेरिका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में वामपंथी नेतृत्व जारी रहेगा।
बता दे कि वही लूला की जीत को इसलिए भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि पहले दौर में वह फ्लावियो से पीछे थे। इसके बावजूद उन्होंने दूसरे दौर में मतदाताओं का समर्थन जुटाया और मुकाबले का रुख पलट दिया। नतीजों की आधिकारिक पुष्टि ब्राजील के निर्वाचन प्राधिकरण ने की।
पहले दौर में पिछड़ने के बाद लूला ने कैसे पलटी बाजी?
पहले दौर की मतगणना में लूला फ्लावियो से करीब 22 लाख वोट पीछे रह गए थे। इसके बाद उनके अभियान ने उन मतदाताओं पर ध्यान केंद्रित किया जो अब तक किसी उम्मीदवार के पक्ष में फैसला नहीं कर पाए थे। युवाओं और अलग-अलग सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने के लिए लूला ने लगातार रैलियां कीं और समर्थकों से सीधे संवाद किया।
उनके चुनाव अभियान का एक प्रमुख हिस्सा पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के कार्यकाल की आलोचना था। रैलियों में “नेवर अगेन बोल्सोनारो” यानी “बोल्सोनारो दोबारा कभी नहीं” का नारा सुनाई दिया। इस संदेश के साथ महामारी के दौरान सरकार की प्रतिक्रिया, कल्याणकारी योजनाओं में कटौती और अमेजन के जंगलों को हुए नुकसान जैसे मुद्दे उठाए गए।
लूला ने सोशल मीडिया के जरिए भी युवाओं तक पहुंचने की कोशिश की। उन्होंने स्मार्टफोन खरीदा और समर्थकों के साथ सेल्फी तथा छोटे वीडियो बनाए। अभियान से जुड़े इन पोस्ट को ऑनलाइन खूब साझा किया गया। इसके साथ ही, समर्थकों ने घर-घर जाकर मतदाताओं से बातचीत की और उन्हें मतदान के लिए प्रेरित किया।
महंगाई, अपराध और कल्याणकारी योजनाएं बने अहम मुद्दे
ब्राजील राष्ट्रपति चुनाव में महंगाई और अपराध मतदाताओं की प्रमुख चिंताओं में शामिल रहे। फ्लावियो बोल्सोनारो ने अपराध पर सख्त कार्रवाई करने और खाद्य पदार्थों की कीमतें घटाने का वादा किया। उन्होंने उन मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश की जो रोजमर्रा के खर्च और सुरक्षा को लेकर चिंतित थे।
लूला ने दूसरी ओर आर्थिक राहत और सामाजिक कल्याण से जुड़े उपायों पर जोर दिया। उनके समर्थकों ने गरीबी कम करने और वंचित समुदायों के लिए किए गए काम को उनके पक्ष में मतदान का कारण बताया। चुनावी मुकाबले में यह बहस भी अहम रही कि आर्थिक सहायता योजनाओं को किस तरह आगे बढ़ाया जाए और महंगाई से प्रभावित परिवारों को राहत कैसे मिले।
दोनों उम्मीदवारों के खेमों पर भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी चुनावी चर्चा को प्रभावित किया। जायर बोल्सोनारो का नाम कई विवादों में आया। लूला भी भ्रष्टाचार के मामलों में दोषसिद्धि के बाद एक साल से अधिक समय जेल में रहे थे, लेकिन बाद में उनकी दोषसिद्धि रद्द कर दी गई। इन मुद्दों के बावजूद मतदाताओं के सामने अर्थव्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा और शासन के विकल्प प्रमुख बने रहे।
अमेरिका के साथ संबंध और व्यापार भी चर्चा में
चुनाव अभियान में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन की नीतियों पर भी बहस हुई। लूला ने ब्राजील के निर्यात पर लगाए गए अमेरिकी शुल्क और मादक पदार्थों की तस्करी करने वाले समूहों को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित करने के अमेरिकी फैसले की आलोचना की।
फ्लावियो ने इसके विपरीत ट्रंप प्रशासन के साथ बेहतर संबंध बनाने और व्यापारिक समझौते करने की बात कही। उन्होंने दुर्लभ मृदा खनिजों के क्षेत्र में अमेरिका के साथ सहयोग की जरूरत भी बताई। ब्राजील के अनुमान के अनुसार, देश में इन खनिजों का भंडार 2.1 करोड़ टन तक हो सकता है—यह चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा भंडार माना जाता है। हालांकि, फ्लावियो ने अमेरिकी सरकार से मदद मिलने की बात से इनकार किया। ट्रंप ने चुनाव पर नजर रखने की बात कही, लेकिन किसी उम्मीदवार का समर्थन नहीं किया।
ब्राजील की राजनीति के लिए क्या मायने?
लूला की जीत बताती है कि पहले दौर में बढ़त हासिल करने के बाद भी चुनाव का अंतिम नतीजा बदल सकता है। दूसरे दौर में अनिर्णीत मतदाताओं तक पहुंच, अभियान के संदेश और रोजमर्रा के मुद्दों पर भरोसा कायम करना निर्णायक हो सकता है।
अब नई सरकार के सामने महंगाई, अपराध, सामाजिक कल्याण और अमेजन के संरक्षण जैसी चुनौतियां होंगी। साथ ही, अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध और दुर्लभ मृदा खनिजों का इस्तेमाल भी ब्राजील की आर्थिक नीति में अहम रह सकता है। चुनावी जीत के बाद लूला के सामने चुनौती होगी कि वे अपने समर्थकों की उम्मीदों और देश की व्यापक आर्थिक चिंताओं के बीच संतुलन बनाएं।



























