CPCB AQI Calculation: दिल्ली-NCR में सर्दियों की दस्तक के साथ वायु प्रदूषण की समस्या एक बार फिर चिंता बढ़ाने लगती है। हवा में धुंध छाने, आंखों में जलन और सांस लेने में परेशानी जैसी शिकायतों के बीच लोगों की नजर एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी AQI पर टिक जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि AQI की गणना आखिर कैसे होती है? हवा में मौजूद किन तत्वों के आधार पर यह तय किया जाता है कि वातावरण साफ है या सेहत के लिए नुकसानदायक?
दरअसल, AQI कैसे कैलकुलेट होता है, यह समझने के लिए हवा में मौजूद प्रदूषकों, उनकी सांद्रता और वैज्ञानिक गणना की प्रक्रिया को जानना जरूरी है। भारत में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक प्रणाली लोगों को प्रदूषण के स्तर को आसानी से समझने में मदद करती है।
क्या है AQI और इसे क्यों मापा जाता है?
AQI का पूरा नाम Air Quality Index यानी वायु गुणवत्ता सूचकांक है। यह एक ऐसा पैमाना है, जिसके जरिए हवा में मौजूद प्रदूषण के स्तर को एक संख्या के रूप में बताया जाता है। आमतौर पर इसका स्कोर 0 से 500 के बीच होता है। स्कोर जितना अधिक होगा, वायु प्रदूषण का स्तर उतना ही ज्यादा माना जाएगा।
भारत में राष्ट्रीय AQI की शुरुआत अक्टूबर 2014 में की गई थी। इसका उद्देश्य जटिल वैज्ञानिक आंकड़ों को आम लोगों के लिए सरल बनाना था, ताकि वे समझ सकें कि उनके आसपास की हवा का स्वास्थ्य पर कितना असर पड़ सकता है।
हालांकि, AQI केवल प्रदूषण की मात्रा नहीं बताता, बल्कि इसका स्तर यह समझने में भी मदद करता है कि संवेदनशील लोगों और आम नागरिकों को किस तरह की सावधानी बरतनी चाहिए।
AQI में कौन-कौन से 8 प्रदूषक मापे जाते हैं?
भारत के राष्ट्रीय AQI सिस्टम में आठ प्रमुख प्रदूषकों को शामिल किया गया है। इनकी मात्रा के आधार पर हवा की गुणवत्ता का आकलन किया जाता है।
- PM2.5: बेहद महीन कण, जो फेफड़ों में गहराई तक पहुंच सकते हैं।
- PM10: धूल, निर्माण कार्य और सड़क से उड़ने वाले अपेक्षाकृत बड़े कण।
- नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2): वाहनों और ईंधन के दहन से निकलने वाली गैस।
- सल्फर डाइऑक्साइड (SO2): मुख्य रूप से सल्फर युक्त ईंधन जलने से पैदा होने वाली गैस।
- कार्बन मोनोऑक्साइड (CO): ईंधन के अधूरे दहन से बनने वाली जहरीली गैस।
- ओजोन (O3): जमीन के करीब बनने वाली गैस, जो सांस संबंधी समस्याएं बढ़ा सकती है।
- अमोनिया (NH3): कृषि गतिविधियों, कचरे और अन्य स्रोतों से निकलने वाली गैस।
- लेड (Pb): एक विषैली भारी धातु, जिसके संपर्क में आना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
इन सभी प्रदूषकों की माप और गणना की समय-सीमा एक जैसी नहीं होती। कुछ के लिए 24 घंटे का औसत और कुछ के लिए 8 घंटे का औसत इस्तेमाल किया जाता है। लेड की निगरानी भी नियमित रीयल-टाइम प्रदूषकों से अलग होती है।
AQI की गणना कैसे होती है? समझें 3 मुख्य चरण
पहला चरण: प्रदूषकों की सांद्रता मापना
सबसे पहले मॉनिटरिंग स्टेशनों की मदद से हवा में मौजूद अलग-अलग प्रदूषकों की सांद्रता मापी जाती है। PM2.5, PM10, NO2, SO2, NH3 और लेड के लिए निर्धारित 24 घंटे की औसत अवधि, जबकि CO और ओजोन के लिए 8 घंटे की औसत अवधि के आधार पर गणना की जाती है।
दूसरा चरण: सब-इंडेक्स निकालना
प्रत्येक प्रदूषक की मापी गई सांद्रता को निर्धारित ब्रेकपॉइंट यानी तय सांद्रता सीमाओं से मिलाया जाता है। इसके बाद एक गणितीय सूत्र की मदद से उस प्रदूषक का सब-इंडेक्स निकाला जाता है। यह मान 0 से 500 के AQI पैमाने पर प्रदूषण के प्रभाव को दर्शाता है।
तीसरा चरण: अंतिम AQI तय करना
अलग-अलग प्रदूषकों के सब-इंडेक्स निकालने के बाद उनमें से सबसे अधिक मान को अंतिम AQI के रूप में लिया जाता है। यानी यदि PM2.5 का सब-इंडेक्स बाकी प्रदूषकों से अधिक है, तो वही समग्र AQI निर्धारित कर सकता है।
इसका अर्थ है कि AQI केवल सभी प्रदूषकों का साधारण औसत नहीं होता। यह उस प्रदूषक के स्तर को सामने लाता है, जिसका सूचकांक सबसे अधिक है। राष्ट्रीय AQI की गणना के लिए आवश्यक डेटा उपलब्ध होना भी महत्वपूर्ण है।
AQI की 6 श्रेणियां कौन-सी हैं?
भारत में वायु गुणवत्ता सूचकांक को छह श्रेणियों में बांटा गया है।
- 0-50: अच्छा — वायु गुणवत्ता अच्छी मानी जाती है।
- 51-100: संतोषजनक — आमतौर पर कम जोखिम, लेकिन कुछ संवेदनशील लोगों को परेशानी हो सकती है।
- 101-200: मध्यम — अस्थमा या फेफड़ों की बीमारी से पीड़ित लोगों को परेशानी हो सकती है।
- 201-300: खराब — लंबे समय तक संपर्क में रहने से सांस लेने में परेशानी हो सकती है।
- 301-400: बहुत खराब — लंबे समय तक संपर्क स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकता है।
- 401-500: गंभीर — स्वस्थ लोगों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और पहले से बीमार लोगों के लिए जोखिम बढ़ सकता है।
दिल्ली-NCR में AQI का आंकड़ा क्यों बढ़ जाता है?
दिल्ली-NCR में वायु प्रदूषण बढ़ने के पीछे कई कारण एक साथ काम करते हैं। वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण स्थलों की धूल, औद्योगिक उत्सर्जन, कचरा और अन्य पदार्थों का जलना प्रमुख स्रोत हैं। सर्दियों में हवा की गति कम होने, वातावरण में तापमान संबंधी परतें बनने और प्रदूषकों के फैलाव में कमी आने से स्थिति और गंभीर हो सकती है। आसपास के क्षेत्रों से आने वाला प्रदूषण भी स्थानीय हवा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।
इसलिए ITO, AIIMS, अक्षरधाम या आनंद विहार जैसे किसी एक इलाके का AQI दूसरे इलाके से अलग हो सकता है। किसी शहर की समग्र वायु गुणवत्ता समझने के लिए अलग-अलग मॉनिटरिंग स्टेशनों के आंकड़ों और संबंधित आधिकारिक रिपोर्ट को देखना जरूरी है।



























