Find out how different the Moon is from Earth: जब भी तूफान का जिक्र होता है, हमारे दिमाग में तेज हवाएं, काले बादल, मूसलाधार बारिश और बिजली चमकने की तस्वीर उभरती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पृथ्वी से लाखों किलोमीटर दूर मौजूद चांद पर भी तूफान आते होंगे? अगर आते हैं, तो वहां हवा किस दिशा में चलती है और बारिश कैसे होती है? दरअसल, चांद पर तूफान आने का मतलब पृथ्वी पर आने वाले तूफानों से बिल्कुल अलग है।
चंद्रमा पर न तो पृथ्वी जैसा घना वायुमंडल है और न ही बारिश और बादलों वाला मौसम तंत्र। इसके बावजूद वहां सूर्य से आने वाले ऊर्जावान कण, अंतरिक्ष की धूल और छोटे उल्कापिंड लगातार उसकी सतह को प्रभावित करते रहते हैं। आइए जानते हैं कि चांद का मौसम कैसे काम करता है और यह पृथ्वी से कितना अलग है।
क्या चांद पर भी आते हैं तूफान?
बता दें कि इस सवाल का सीधा जवाब है कि चांद पर पृथ्वी जैसे सामान्य तूफान नहीं आते। पृथ्वी पर तूफान बनने के लिए वायुमंडल, हवा, नमी और तापमान में होने वाले बदलाव अहम भूमिका निभाते हैं। चंद्रमा पर इन परिस्थितियों का अभाव है, इसलिए वहां बादल, बारिश, गरज और बिजली वाला सामान्य मौसम देखने को नहीं मिलता।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि चांद पूरी तरह शांत है। वहां अंतरिक्ष से आने वाले सौर कणों, विकिरण और सूक्ष्म उल्कापिंडों का लगातार प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिक इस तरह की गतिविधियों को स्पेस वेदर यानी अंतरिक्ष का मौसम कहते हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के मुताबिक, चंद्रमा का वातावरण बेहद विरल है और उसकी सतह सीधे अंतरिक्ष के प्रभावों के संपर्क में रहती है।
चांद पर कैसे आते हैं सौर तूफान?
सौर तूफान को समझने के लिए सबसे पहले सूर्य से निकलने वाले कणों को जानना जरूरी है। सूर्य लगातार आवेशित कणों की एक धारा अंतरिक्ष में छोड़ता है, जिसे सौर पवन (Solar Wind) कहा जाता है। इसके अलावा, सूर्य पर होने वाले बड़े विस्फोटों से अत्यधिक ऊर्जा और आवेशित कण भी निकल सकते हैं।
पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र और वायुमंडल हमें अंतरिक्ष से आने वाले कई हानिकारक प्रभावों से बचाने में मदद करते हैं। इसके उलट, चंद्रमा के पास पृथ्वी जैसा वैश्विक चुंबकीय क्षेत्र और घना वायुमंडल नहीं है। इसलिए सौर पवन और सूर्य से निकलने वाले ऊर्जावान कण उसकी सतह तक सीधे पहुंच सकते हैं।
इन कणों के प्रभाव से चंद्रमा की मिट्टी और धूल पर विद्युत आवेश जमा हो सकता है। यह प्रक्रिया चंद्रमा की सतह और वहां काम करने वाले अंतरिक्ष यानों के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, सौर तूफान के दौरान होने वाली इस गतिविधि को पृथ्वी पर आने वाले आंधी-तूफान या बिजली गिरने की घटना के समान नहीं समझना चाहिए।
चांद पर उड़ती धूल का रहस्य क्या है?
चंद्रमा की सबसे दिलचस्प घटनाओं में से एक है वहां की बारीक धूल का विद्युत बलों से प्रभावित होना। चांद की सतह पर मौजूद धूल और चट्टानों के छोटे टुकड़ों को मिलाकर रेगोलिथ (Regolith) कहा जाता है।
चंद्रमा के जिस हिस्से पर सूर्य की रोशनी पड़ती है और जिस हिस्से में अंधेरा होता है, उनके बीच की सीमा को टर्मिनेटर (Terminator) कहते हैं। इस क्षेत्र में सतह की विद्युत परिस्थितियां तेजी से बदल सकती हैं। सूर्य की पराबैंगनी किरणें और सौर पवन धूल के कणों पर आवेश पैदा करने में भूमिका निभाते हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि कुछ परिस्थितियों में विद्युत बल चंद्रमा की महीन धूल को सतह से ऊपर उठा सकते हैं या उसे दूसरी जगह पहुंचा सकते हैं। पृथ्वी पर धूल भरी आंधी मुख्य रूप से हवा से चलती है, जबकि चांद पर धूल की संभावित गति में विद्युत बलों की भूमिका हो सकती है।
अपोलो मिशन के अंतरिक्ष यात्रियों ने चंद्रमा के क्षितिज के पास चमक और प्रकाश की कुछ रहस्यमयी घटनाएं देखी थीं। इन्हें कभी-कभी चार्ज वाली धूल से जोड़कर समझाया जाता है। हालांकि, चंद्रमा पर बड़े पैमाने पर धूल उड़ने की इस प्रक्रिया के पीछे का पूरा तंत्र अभी स्पष्ट नहीं है और इसकी पुष्टि के लिए और अध्ययन जरूरी है।
चांद पर उल्कापिंडों की लगातार बौछार
पृथ्वी पर जब छोटे अंतरिक्षीय पत्थर वायुमंडल में प्रवेश करते हैं, तो उनमें से कई घर्षण और वायुमंडलीय प्रभावों के कारण गर्म होकर चमकने लगते हैं। इन्हें आम बोलचाल में टूटता तारा कहा जाता है।लेकिन चंद्रमा पर घना वायुमंडल नहीं है, जो छोटे अंतरिक्षीय पिंडों को पृथ्वी की तरह रोक सके। इस वजह से माइक्रोमीटियोरॉइड्स यानी बेहद छोटे अंतरिक्षीय पिंड सीधे चंद्रमा की सतह से टकरा सकते हैं।
इन टक्करों से चट्टानें टूटती हैं और मिट्टी के कण उछलकर आसपास फैल जाते हैं। अरबों वर्षों से जारी इस प्रक्रिया ने चंद्रमा की सतह पर धूल और छोटे चट्टानी टुकड़ों की परत बनाने में अहम भूमिका निभाई है। वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को इम्पैक्ट गार्डनिंग (Impact Gardening) कहते हैं। इस तरह चांद पर किसी तूफान की तरह हवा चलना जरूरी नहीं है। अंतरिक्ष से होने वाली लगातार बमबारी भी उसकी सतह को बदलती रहती है।
चांद पर दिन और रात का तापमान कितना होता है?
पृथ्वी पर वायुमंडल और महासागर गर्मी को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने में मदद करते हैं। इससे तापमान में होने वाले बदलाव कुछ हद तक नियंत्रित रहते हैं। चंद्रमा पर ऐसा प्रभाव बहुत सीमित है, इसलिए वहां दिन और रात के तापमान में भारी अंतर देखने को मिलता है। नासा के अनुसार, चंद्रमा के भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में दिन के समय सतह का तापमान लगभग 121 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। वहीं, चंद्र रात्रि में यह गिरकर करीब माइनस 133 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है।
ध्रुवीय क्षेत्रों के कुछ ऐसे गड्ढे भी हैं, जहां सूर्य की रोशनी कभी नहीं पहुंचती। इन स्थायी छाया वाले स्थानों में तापमान माइनस 246 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे जा सकता है। ऐसे क्षेत्रों में जमी हुई बर्फ के भंडार मौजूद होने के संकेत मिले हैं। तापमान में इतना बड़ा अंतर चंद्रमा पर भविष्य में इंसानी बस्तियां स्थापित करने और अंतरिक्ष यात्रियों को सुरक्षित रखने के लिहाज से बड़ी चुनौती है।
पृथ्वी और चांद के तूफान में क्या है अंतर?
पृथ्वी पर तूफान हवा, नमी, वायुमंडलीय दबाव और तापमान में बदलाव से बनते हैं। इसके विपरीत, चंद्रमा पर मौसम से जुड़ी प्रमुख चुनौतियां सौर पवन, अंतरिक्षीय विकिरण, विद्युत आवेश और सूक्ष्म उल्कापिंडों से आती हैं। पृथ्वी का वायुमंडल और चुंबकीय क्षेत्र जीवन की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जबकि चंद्रमा की सतह अंतरिक्ष के वातावरण के सीधे संपर्क में रहती है। यही वजह है कि वहां अंतरिक्ष यात्रियों को विकिरण, अत्यधिक तापमान और महीन धूल से बचाने के लिए विशेष उपकरणों की जरूरत होती है।



























