लिव-इन में जन्मे बच्चे को मिलते हैं कौन-कौन से अधिकार?

Rights of a child born in a live-in relationship:जानिए भारत में लिव-इन रिलेशनशिप में जन्मे बच्चे को पहचान, भरण-पोषण और संपत्ति से जुड़े कौन-से अधिकार मिलते हैं। कानून और अदालतों के फैसलों की आसान जानकारी।

बिना शादी पैदा हुआ बच्चा, क्या पिता से मांग सकता है खर्च?

HIGHLIGHTS

  • लिव-इन में बच्चा हुआ? जानिए कानून क्या कहता है
  • क्या लिव-इन के बच्चे को पिता की संपत्ति में हिस्सा मिलेगा?
  • जन्म प्रमाण पत्र में पिता का नाम जरूरी? जानिए नियम
  • लिव-इन में जन्मे बच्चे को लेकर अदालत का अहम नजरिया

Rights of a child born in a live-in relationship:लिव-इन रिलेशनशिप यानी बिना विवाह साथ रहने का चलन बढ़ने के साथ, ऐसे रिश्तों में जन्मे बच्चों के कानूनी अधिकारों को लेकर भी सवाल उठते हैं। क्या बच्चे को माता-पिता की शादी न होने के कारण कम अधिकार मिलते हैं? क्या वह पिता से भरण-पोषण मांग सकता है या माता-पिता की संपत्ति में हिस्सा पा सकता है? भारत में इन सवालों का जवाब हर मामले के तथ्यों और लागू व्यक्तिगत कानूनों पर निर्भर कर सकता है। फिर भी, एक बुनियादी सिद्धांत स्पष्ट है: बच्चे को माता-पिता के रिश्ते की स्थिति के कारण भेदभाव का सामना नहीं करना चाहिए।

क्या लिव-इन में जन्मा बच्चा ‘अवैध’ माना जाता है?

किसी बच्चे को “अवैध” कहकर उसके बुनियादी अधिकारों से वंचित करना उचित नहीं है। अदालतों ने अलग-अलग मामलों में लंबे समय तक साथ रहने वाले जोड़ों के रिश्ते और उससे जन्मे बच्चों की स्थिति पर विचार किया है। कुछ परिस्थितियों में, साथ रहने की अवधि और व्यवहार के आधार पर रिश्ते के विवाह-सदृश होने की धारणा पर भी विचार किया जा सकता है। हालांकि, हर लिव-इन रिश्ता अपने-आप कानूनी विवाह नहीं माना जाता। इसलिए किसी विशिष्ट विवाद में अदालत उपलब्ध सबूत और परिस्थितियां देखती है।

बच्चे की पहचान, देखभाल और सुरक्षा को माता-पिता के वैवाहिक दर्जे से अलग समझना जरूरी है। बच्चे के अधिकारों पर फैसला करते समय उसका हित अहम होता है।

जन्म प्रमाण पत्र और बच्चे की पहचान

बच्चे के जन्म का पंजीकरण और जन्म प्रमाण पत्र उसकी पहचान से जुड़े अहम दस्तावेज हैं। माता-पिता के नाम दर्ज कराने या दस्तावेज में सुधार कराने की प्रक्रिया संबंधित राज्य के नियमों और पंजीकरण प्राधिकारी की आवश्यकताओं के अनुसार हो सकती है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर मामले में एक ही प्रक्रिया लागू होती है।

मां अकेले बच्चे की परवरिश कर रही हो, तो बच्चे के नाम या उपनाम के बारे में निर्णय लेते समय उसके हित और लागू नियमों को ध्यान में रखा जाता है। पिता का उपनाम अपनाना हर स्थिति में बच्चे के लिए अनिवार्य है—ऐसा सामान्य नियम नहीं है। यदि जन्म प्रमाण पत्र में बदलाव या सुधार चाहिए, तो स्थानीय जन्म-मृत्यु पंजीकरण कार्यालय से प्रक्रिया और जरूरी दस्तावेजों की जानकारी लेना उपयोगी होगा।

बच्चे के भरण-पोषण का अधिकार

बच्चे के भोजन, शिक्षा, इलाज और रोजमर्रा की जरूरतों की जिम्मेदारी माता-पिता पर होती है। माता-पिता का विवाह न हुआ हो, इससे बच्चे की देखभाल की जरूरत खत्म नहीं होती। यदि पिता बच्चे का खर्च उठाने से इनकार करता है, तो परिस्थितियों के अनुसार अदालत से भरण-पोषण की मांग की जा सकती है।

भारत में भरण-पोषण से जुड़े प्रावधान अलग-अलग कानूनों के तहत लागू हो सकते हैं। कौन-सा प्रावधान उपलब्ध होगा, यह बच्चे की स्थिति, माता-पिता के संबंध और मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है। इसलिए आवेदन करने से पहले परिवार-कानून के वकील या जिला विधिक सेवा प्राधिकरण से सलाह लेना बेहतर है। अदालत आम तौर पर बच्चे की जरूरतों और माता-पिता की आर्थिक क्षमता जैसे पहलुओं पर विचार कर सकती है।

संपत्ति में बच्चे का हक

संपत्ति के मामलों में “माता-पिता की खुद की कमाई” और “पैतृक या संयुक्त परिवार की संपत्ति” के बीच फर्क समझना जरूरी है। बच्चे का माता-पिता की स्व-अर्जित संपत्ति पर दावा किस आधार पर और किस समय बनता है, यह उत्तराधिकार के लागू कानून, वसीयत और अन्य तथ्यों पर निर्भर कर सकता है। इसलिए हर स्थिति में बच्चे को उस संपत्ति का तत्काल या स्वतः हिस्सा मिलने की बात कहना सही नहीं होगा।

पैतृक या संयुक्त परिवार की संपत्ति के नियम और जटिल हो सकते हैं। हिंदू उत्तराधिकार कानून सहित लागू व्यक्तिगत कानूनों के तहत बच्चे की कानूनी स्थिति पर असर पड़ सकता है। ऐसे मामलों में संपत्ति के दस्तावेज, परिवार की संरचना और संबंधित अदालतों के फैसले देखकर ही सही निष्कर्ष निकाला जा सकता है। किसी संपत्ति विवाद में कानूनी सलाह लेना खास तौर पर जरूरी है।

बच्चे के हित को प्राथमिकता

लिव-इन रिलेशनशिप में जन्मे बच्चे के अधिकारों पर चर्चा करते समय सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे को माता-पिता के फैसलों की सजा न मिले। पहचान, देखभाल, शिक्षा और सुरक्षा से जुड़े मामलों में बच्चे का हित केंद्र में होना चाहिए। साथ ही, हर कानूनी दावा अपने-आप मंजूर नहीं होता—मामले के तथ्य और लागू कानून अहम भूमिका निभाते हैं।

Sandhya Samay News

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