आस्था के नाम पर मौतों का खेल,जंगल में कब्र,स्वर्ग का वादा

केन्या के पॉल मैकेंजी को शाकाहोला जंगल में हुई हत्याओं के मामले में दोषी ठहराया गया। जानिए कैसे उसके पंथ के अंधविश्वास और कथित आदेशों ने बच्चों समेत सैकड़ों लोगों की जान ली।

जंगल में कब्रें, स्वर्ग का वादा और सैकड़ों मौतें

HIGHLIGHTS

  • 400 से ज्यादा शव, बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन?
  • धर्मगुरु के आदेश पर भूखे रहे बच्चे, फिर हुई मौत
  • बच्चे भूख से मरते रहे, पंथ का नेता देता रहा उपदेश
  • स्वर्ग के सपने ने कैसे उजाड़ दिए सैकड़ों परिवार?

केन्या के तटीय इलाके में स्थित शाकाहोला जंगल की जमीन से जब एक के बाद एक कब्रें खोदी गईं, तो सामने आया मंजर देश ही नहीं, पूरी दुनिया को झकझोर गया। जंगल में सैकड़ों शव मिले। जांचकर्ताओं के मुताबिक, मृतकों में बड़ी संख्या बच्चों की थी। इस मामले के केंद्र में था पॉल मैकेंजी—एक ऐसा व्यक्ति, जिसे उसके अनुयायी आध्यात्मिक मार्गदर्शक मानते थे। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि उसने अपने पंथ के लोगों को भूखा रहकर मरने और अपने बच्चों को भी भोजन से वंचित रखने के लिए उकसाया।

पॉल मैकेंजी और उसके साथियों ने आरोपों से इनकार किया और कहा कि किसी को मरने के लिए मजबूर नहीं किया गया था। लेकिन अदालत ने गवाहियों और सबूतों के आधार पर मैकेंजी तथा पंथ के 28 अन्य नेताओं को हत्या के मामले में दोषी ठहराया। इस फैसले ने एक बार फिर सवाल उठाया कि आस्था और अंधभक्ति के बीच की रेखा कब मिट जाती है—और जब कोई नेता अपने अनुयायियों पर पूरा नियंत्रण हासिल कर ले, तो उसके परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं।

जाने शाकाहोला जंगल में क्या हुआ?

शाकाहोला जंगल केन्या के तटीय क्षेत्र में है। मार्च 2023 में स्थानीय लोगों को वहां शव और उथली कब्रें मिलने की खबर सामने आई। इसके बाद बड़े पैमाने पर तलाशी और खुदाई शुरू हुई। जांच के दौरान 400 से अधिक शव बरामद किए गए। अधिकारियों ने मृतकों की पहचान और मौत के कारणों का पता लगाने के लिए फॉरेंसिक जांच की गई।

मामले में अभियोजन पक्ष का कहना था कि पॉल मैकेंजी ने अपने अनुयायियों को जंगल में बसने के लिए प्रेरित किया और उन्हें भूखे रहने को कहा। कथित तौर पर उसने यह विश्वास फैलाया कि ऐसा करने से वे यीशु से मिल सकेंगे। कई लोगों के लिए यह केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु से जुड़ा आदेश बन गया था। अदालत में पेश गवाहों के बयान इस बात की ओर इशारा करते थे कि पंथ के भीतर विरोध करने वालों पर दबाव डाला जाता था।

शिक्षा और आधुनिक चिकित्सा के खिलाफ विचार

पॉल मैकेंजी के पंथ में शिक्षा और आधुनिक चिकित्सा को बुरा या अनावश्यक बताया जाता था। इससे अनुयायी स्कूलों और अस्पतालों से दूर होते गए और बाहरी लोगों से उनका संपर्क भी सीमित हुआ। ऐसे माहौल में पंथ के नेता की बात पर सवाल उठाना मुश्किल हो सकता था—खासकर तब, जब अनुयायियों को यह विश्वास दिलाया जाए कि उसकी वाणी ईसा मसीह का संदेश है।

फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश डायना मोचाचे ने कहा कि पॉल मैकेंजी के अनुयायी उसे असाधारण धार्मिक अधिकार वाला व्यक्ति मानते थे। अदालत के सामने यह भी आरोप रखा गया कि भूखे रहने के निर्देश का विरोध करने वालों को हिंसा की धमकी दी जाती थी। कुछ लोगों को कथित तौर पर मारपीट कर चुप कराया गया। इस तरह, धार्मिक भाषा का इस्तेमाल लोगों को नियंत्रित करने और उन्हें खतरनाक परिस्थितियों में बनाए रखने के लिए किया गया।

बच्चों और नवजातों की दर्दनाक मौतें

इस मामले का सबसे दिल दहला देने वाला पहलू बच्चों की मौतें थीं। एक रिपोर्ट में अदालत के एक गवाह के हवाले से बताया गया कि एक मां को अपने नवजात शिशु को दूध पिलाने से रोका गया था। बच्चे की 12 दिन बाद मौत हो गई। गवाह के मुताबिक, मां को भी भूखे रहकर मरने और अपने बच्चों के पीछे जाने के लिए कहा गया था।

अदालत में सामने आए ऐसे बयान बताते हैं कि बच्चों के पास अपने हालात बदलने या वहां से निकलने का कोई रास्ता नहीं था। वे पूरी तरह बड़ों पर निर्भर थे—और उन्हीं बड़ों को कथित तौर पर भूखे रहने के लिए कहा जा रहा था। शाकाहोला में दफनाने के काम के लिए कई लोगों को लगाया गया था। एक कब्र खोदने वाले ने बताया कि कुछ कमजोर लोग जंगल से बाहर ले जाते समय ही दम तोड़ देते थे।

स्थानीय स्तर पर मौत और दफन को धार्मिक अर्थ देने की कोशिश भी की गई। गवाहियों के अनुसार, जंगल में दफन को “शादी” कहा जाता था और मृतकों के बारे में कहा जाता था कि वे यीशु से मिल गए हैं। ऐसे शब्दों से मौत को सामान्य या पवित्र बताने का जोखिम था, जिससे अनुयायी मदद मांगने या वहां से भागने से और दूर हो सकते थे।

चर्च से जंगल तक का सफर

पॉल मैकेंजी ने 2003 में ‘गुड न्यूज इंटरनेशनल मिनिस्ट्रीज’ की स्थापना की थी। अगले वर्षों में उसका धार्मिक संगठन केन्या के अलग-अलग हिस्सों में फैल गया और उसके हजारों अनुयायी बन गए। उसके चर्च से उपदेश प्रसारित करने वाला ‘टाइम्स टीवी’ नाम का चैनल भी था। मैकेंजी के उपदेशों में कथित तौर पर भूत-प्रेत भगाने जैसी बातें भी शामिल होती थीं।

2019 में मुख्य चर्च बंद हुआ। इसके बाद मैकेंजी शाकाहोला जंगल चला गया और उसके अनुयायी भी वहां पहुंचे। अभियोजन पक्ष के अनुसार, जंगल में रहने वालों पर बाहरी दुनिया से कटे रहने और भोजन, चिकित्सा तथा शिक्षा से दूर रहने का दबाव था। जब तक स्थानीय चरवाहों को पहली बार शव दिखाई दिए, तब तक बड़ी संख्या में लोग जान गंवा चुके थे।

अदालत के फैसले का महत्व

पॉल मैकेंजी को 191 हत्याओं के मामले में दोषी ठहराया गया। उसके साथ पंथ के 28 अन्य नेताओं को भी दोषी पाया गया। यह फैसला केवल एक व्यक्ति या समूह के अपराध का मामला नहीं है; यह इस बात की गंभीर चेतावनी भी है कि जब किसी धार्मिक या आध्यात्मिक नेता को बिना सवाल किए जाने वाला अधिकार मिल जाता है, तो कमजोर लोगों—विशेषकर बच्चों—की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

शाकाहोला जंगल की घटनाएं दिखाती हैं कि अंधविश्वास, सामाजिक अलगाव और डर का मेल कितना विनाशकारी हो सकता है। धार्मिक स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी भी आस्था के नाम पर बच्चों को भोजन, इलाज या शिक्षा से वंचित करना स्वीकार्य नहीं हो सकता। इस मामले में अदालत का फैसला पीड़ितों के लिए न्याय की दिशा में एक कदम है; साथ ही यह भविष्य में ऐसे समूहों की समय रहते पहचान और निगरानी की जरूरत भी रेखांकित करता है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now