Sloth:जब भी आलस का जिक्र होता है, तो हमारे मन में पौराणिक कथाओं के कुंभकर्ण का ख्याल आता है, जो लगातार 6 महीने तक सोया रहता था। लेकिन अगर आपको असल दुनिया का ‘आलसी नंबर वन’ देखना हो, तो आपको मध्य और दक्षिण अमेरिका के घने जंगलों में जाना होगा।
यहां एक ऐसा जानवर रहता है जो रोजाना 20 से 22 घंटे तक सोता है और इतना कामचोर है कि खाना खाने में भी आलस महसूस करता है। इस जानवर का नाम है – स्लॉथ (Sloth)। जंगल में इस कामचोर प्राणी को जिसे देखकर हर कोई यही सवाल पूछता है कि आखिर इतना आलसी होकर भी ये जीवित कैसे बचा जाता है? आइए जानते विस्तार से।
स्पीड है बस 0.24 किलोमीटर प्रति घंटा
स्लॉथ दो प्रकार के होते हैं– टू-टोएड और थ्री-टोएड। वैज्ञानिकों के मुताबिक, थ्री-टोएड स्लॉथ सबसे ज्यादा आलसी माने जाते हैं। इनकी चाल की रफ्तार महज 0.24 किलोमीटर प्रति घंटा है। यानी समझिए कि अगर कोई स्लॉथ किसी पेड़ से दूसरे पेड़ पर जाना चाहे, तो उसे पूरा एक दिन लग सकता है।
पेड़ों पर ही बीतता है पूरा जीवन, हफ्ते में एक बार उतरता है जमीन पर
स्लॉथ का पूरा जीवन पेड़ों पर ही बीतता है। वे ज्यादातर उल्टा लटककर ही जिंदगी बिताते हैं। ये शायद ही कभी जमीन पर उतरते हैं। एक हफ्ते में वे सिर्फ एक बार शौच के लिए नीचे आते हैं और तुरंत वापस पेड़ पर चढ़ जाते हैं।
प्रकृति ने दी है ‘इनविजिबिलिटी क्लोक’ जैसी छुपने की तकनीक
धीमी रफ्तार के चलते जमीन पर आना उनके लिए मौत का दरवाजा बन जाता है, क्योंकि शिकारी उन्हें आसानी से अपना शिकार बना लेते हैं। लेकिन प्रकृति ने उन्हें एक अनोखा बचाव दिया है। स्लॉथ के फर पर हरे रंग का शैवाल (algae) उग आता है। इस वजह से वे पेड़ों की पत्तियों के साथ एकदम घुल-मिल जाते हैं और शिकारियों की नजर से बच जाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि उनका फर उल्टी दिशा में बढ़ता है, ताकि बारिश का पानी आसानी से बह जाए और शैवाल पनप सके।
खाना पचाने में लगता है एक महीना!
स्लॉथ का आहार मुख्य रूप से पत्तियां, टहनियां और फल होता है। लेकिन ये पत्तियां पोषक तत्वों से भरपूर नहीं होतीं। वैज्ञानिकों के अनुसार, इनका मेटाबॉलिज्म इतना धीमा होता है कि वे दूसरे स्तनधारियों की तुलना में सिर्फ एक तिहाई ऊर्जा इस्तेमाल करते हैं। इन्हें खाना पचाने में एक पूरा महीना लग जाता है। यही वजह है कि वे कम खाते हैं और ज्यादा सोते हैं।
आलस भी एक ‘सर्वाइवल स्ट्रेटजी’ (जीवन बचाने की रणनीति) है
हालांकि, यही आलस कभी-कभी उनकी जिंदगी भी ले लेता है। अगर कोई स्लॉथ गलती से पेड़ से नीचे गिर जाए, तो वापस चढ़ने में इतना समय लगता है कि शिकारी उसे मार देते हैं। कई बार भूख लगने पर पेड़ तक पहुंच न पाने के कारण भी उनकी मौत हो जाती है।
फिर भी लाखों सालों से ये जानवर जंगलों में जीवित हैं। वे इतनी कम ऊर्जा खर्च करते हैं कि उन्हें ज्यादा खाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। 10 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान सहन करने वाला ये जानवर हफ्तों तक बिना खाए-पीए जिंदा रह सकता है।
मां-बच्चे का भी आलसी कनेक्शन:
एक मादा स्लॉथ साल में सिर्फ एक बच्चा देती है। जन्म के तुरंत बाद बच्चा मां के फर से चिपक जाता है और मां के साथ उल्टा लटककर ही रहता है। यहीं से वह ‘आलस’ की इस अनोखी जिंदगी को सीखता है।
शायद यही कारण है कि स्लॉथ की जिंदगी देखकर प्रकृति से सीखने वाले लोगों को एक अलग ही सबक मिलता है—”कभी-कभी धीमे चलना और कम ऊर्जा खर्च करना भी जिंदा बचे रहने का सबसे बेहतरीन तरीका होता है।”

























