वर्दी निष्पक्ष है या पक्षपाती? बड़ा सवाल

कॉकरोच जनता पार्टी नाम से जुड़े एक विरोध प्रदर्शन के बाद शुरू हुआ यह विवाद अब दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी की भूमिका पर सवालों तक पहुंच चुका है। एक ओर नागरिक अधिकारों से जुड़े संगठन के पदाधिकारी पुलिस की चुप्पी पर सीधे हमलावर हैं, तो दूसरी ओर एक ऐसा वीडियो सामने आया है जिसमें एक हिंदुत्ववादी प्रभावशाली इंसान अपने आप को किसी हमले में शामिल होने का करारा दावा करता सुनाई देता है।

वर्दी की निष्पक्षता पर उठे सवाल

HIGHLIGHTS

  • निशू के आंसू और तंत्र की नींद
  • एक बेटी की गुहार, व्यवस्था की बेबसी
  • दो महीने बीते, इंसाफ अब भी दूर
  • पिता की चोट, बेटी का टूटा भरोसा

लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन केवल नारेबाजी का माध्यम नहीं होते, वे नागरिकों की आवाज़ बनकर सत्ता के दरवाज़े पर दस्तक देते हैं। लेकिन जब उस दस्तक का जवाब लाठी से मिले, जब प्रदर्शनकारी घायल होकर अस्पताल पहुंचे और जब दो महीने बीत जाने के बाद भी आरोपी खुलेआम घूमते रहें, तो यह केवल एक कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह जाता। यह पूरे शासन तंत्र की निष्पक्षता की कसौटी बन जाता है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए एक विवादित प्रदर्शन और उससे जुड़ी ताज़ा घटनाओं ने इसी कसौटी पर कई कठिन सवाल खड़े कर दिए हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी नाम से जुड़े एक विरोध प्रदर्शन के बाद शुरू हुआ यह विवाद अब दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी की भूमिका पर सवालों तक पहुंच चुका है। एक ओर नागरिक अधिकारों से जुड़े संगठन के पदाधिकारी पुलिस की चुप्पी पर सीधे हमलावर हैं, तो दूसरी ओर एक ऐसा वीडियो सामने आया है जिसमें एक हिंदुत्ववादी प्रभावशाली इंसान अपने आप को किसी हमले में शामिल होने का करारा दावा करता सुनाई देता है। इन दोनों घटनाक्रमों के बीच खड़ी है एक युवा छात्रा की मजबूरी, एक पिता का दर्द और कानून के राज की कसम खाई हुई एक वर्दी।

जंतर-मंतर की वह दोपहर

घटनाक्रम को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा। जंतर-मंतर दिल्ली का वह ऐतिहासिक स्थल है जहां दशकों से हर तरह की आवाज़ें उठती रही हैं। किसान आए, छात्र आए, बेरोजगार आए और अब भी आते हैं। इसी स्थल पर हाल में एक प्रदर्शन के दौरान हिंसक झड़पें हुईं, जिसमें एक प्रदर्शनकारी युवक संजय को गंभीर चोटें आईं। उनकी बेटी, छात्रा निशू आजाद, ने आरोप लगाया कि उनके पिता पर हमला हुआ और उन्हें न्याय चाहिए।

मामला यहीं खत्म होता, तो शायद यह केवल एक साधारण अपराध की खबर होती। लेकिन समय के साथ जो परतें खुलीं, वे इसे एक बड़े बहस का विषय बना गईं। सबसे पहले यह तथ्य सामने आया कि हमले के आरोपी बताए जा रहे लोगों के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं हुई। दूसरे, एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें हिंदुत्व से जुड़े एक सोशल मीडिया प्रभावशाली व्यक्ति स्वतंत्र भारद्वाज अपने एक साक्षात्कार में उस घटना को लेकर बेधड़क बयान देते सुनाई दिए।

वायरल वीडियो: स्वीकारोक्ति या स्टंट?

पूछताछ की बुनियादी विधियों में एक सिद्धांत यह है कि किसी भी घटना का असली चेहरा उसके साक्ष्यों में छिपा होता है। जब कोई व्यक्ति खुद किसी अपराध की बात को अपने मुंह से कहे, तो कानून तंत्र के लिए उसे नजरअंदाज करना आसान नहीं रहता। इंटरनेट पर प्रसारित करीब एक घंटे के साक्षात्कार में स्वतंत्र भारद्वाज को उस विवादित दिन के हवाले से कहते हुए सुना जा सकता है कि उन्हें भारतीय दंड संहिता की धाराओं का पूरा ज्ञान है और उन्होंने घायल व्यक्ति को एम्बुलेंस में जाते देखा था। उनकी बेटी थाने के बाहर रोती रही, न्याय की गुहार लगाती रही, लेकिन भारद्वाज के मुताबिक उन्हें न जेल भेजा गया, न पूछताछ के लिए बुलाया गया।

यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि भारद्वाज यह बयान किसी मजबूरी में नहीं दे रहे हैं। वे कैमरे के सामने, प्रसारित होने वाले साक्षात्कार में, बड़ी शान से अपने-अपने संबंधों का बखान कर रहे हैं। वे कहते हैं कि उन्हें नेताओं का समर्थन प्राप्त है, कुछ राजनेता उनके ‘बड़े भाई’ हैं और उन्हें किसी विधायी संरक्षण की जरूरत नहीं। यह भाषा भले ही दिखावटी अहंकार लगे, पर इसका निहितार्थ गंभीर है, यह दर्शाती है कि कैसे कुछ लोग राजनीतिक संरक्षण के नाम पर कानून की प्रक्रिया को हल्का समझने लगते हैं।

अब सवाल यह है कि अगर कोई व्यक्ति खुद स्वीकार करे कि वह किसी हमले से जुड़ा था या उसके बारे में जानकार भी चुप रहा, तो क्या पुलिस उसे सामान्य नागरिक समझकर छोड़ देगी? अगर यह वीडियो किसी आम आदमी का होता, तो क्या उसे समन नहीं बुलाया जाता? यह असमानता ही उस चुनौती की जड़ है जिसका सामना भारतीय पुलिस व्यवस्था आज कर रही है।

पुलिस निष्पक्ष रही या पक्षपात का शिकार?

नागरिक अधिकारों की वकालत करने वाले संगठन CJP के संयोजक अभिजीत दीपके ने इस मामले को उठाते हुए दिल्ली पुलिस के शीर्ष अधिकारियों पर सीधे सवाल खड़े किए हैं। उनका आरोप है कि नई दिल्ली के डीसीपी सचिन शर्मा ने इस मामले में ठीक से कार्रवाई नहीं की। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दीपके ने लगातार पोस्ट करते हुए पूछा कि जब एक पिता पर हमला हुआ, जब उसकी बेटी रोती रही, तो क्या पुलिस अधिकारी को शर्म नहीं आनी चाहिए?

दीपके की टिप्पणियों में एक खास बात यह है कि वे सिर्फ व्यवस्था को ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत विश्वास और कर्तव्य की भावना को भी चुनौती देती हैं। उन्होंने एक पोस्ट में लिखा कि वर्दी का अपमान तब होता है जब उसे पहनने वाला अधिकारी निर्दोष युवाओं की जिंदगी बर्बाद करता है और असली आरोपियों को बचाता है। उन्होंने यहां तक कह दिया कि उन्हें उनके ही विभाग के लोगों से यह जानकारी मिली है कि उक्त अधिकारी एक विशेष विचारधारा से जुड़े व्यक्ति हैं, इसलिए आरोपी पर कार्रवाई नहीं हो रही।

यहां हमें सावधानी से चलने की जरूरत है। दीपके के ये आरोप अभी तक किसी न्यायालय द्वारा सिद्ध नहीं हुए हैं। ये उनके द्वारा किए गए दावे हैं और इनकी जांच होनी चाहिए। लेकिन इतना भी नकारा नहीं जा सकता कि जब एक संगठित नागरिक समूह इतनी स्पष्ट शब्दों में एक वरिष्ठ अधिकारी पर सवाल उठाए, तो इसे केवल राजनीतिक क्रोध कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसके लिए कम से कम एक स्वतंत्र जांच की मांग उठना स्वाभाविक है।

पुलिस का पक्ष: सत्य किधर है?

दिल्ली पुलिस ने इस विवाद को लेकर अपना पक्ष भी रखा है। पुलिस के अनुसार जंतर-मंतर की घटना में जिस युवक संजय को चोट आई, वह गंभीर नहीं थी, बल्कि हाथापाई के दौरान मामूली चोट थी। उनकी शिकायत पर कार्यवाही की गई और मामला दर्ज किया गया। पुलिस ने यह भी खंडन किया है कि उनकी खोपड़ी या सिर की हड्डी टूटी थी।

यहां दो विरोधाभासी कथन सामने हैं। एक ओर पीड़ित पक्ष और उसके समर्थक गंभीर चोट और आरोपियों की सुरक्षा की बात करते हैं, तो दूसरी ओर पुलिस घटने को कम करके आंकती है। इस तरह की स्थिति में न्याय प्रक्रिया की गरिमा को बनाए रखने के लिए स्वतंत्र चिकित्सा रिपोर्ट, साक्ष्यों का रिकॉर्ड और पारदर्शी जांच ही एकमात्र रास्ता है। यदि चोट वास्तव में मामूली थी, तो पुलिस को इसका चिकित्सीय प्रमाण सार्वजनिक करते हुए पीड़ित पक्ष को आश्वस्त करना चाहिए। यदि चोट गंभीर थी, तो आरोपियों को बिना किसी पूर्वाग्रह के गिरफ्तार किया जाना चाहिए था।

न्याय में देरी: अपराध का दूसरा नाम

भारतीय न्याय प्रणाली में एक कहावत मशहूर है, “न्याय में देरी न्याय से इनकार है।” यहां पीड़िता निशू आजाद दो महीने से न्याय की गुहार लगा रही है और उनका कहना है कि आरोपी अब भी खुलेआम घूम रहे हैं। यह देरी कई संदेश देती है, पीड़ित को यह कि उसका दर्द महत्वपूर्ण नहीं, समाज को यह कि शक्तिशाली के सामने कानून झुक जाता है, और आरोपियों को यह कि समय रहते बच निकलने का रास्ता खुला है।

जब एक छात्रा आत्महत्या की चेतावनी देने तक पहुंच जाती है, तो यह सिर्फ उसकी निजी निराशा नहीं है। यह पूरे तंत्र की विफलता का प्रतीक है। कोई व्यक्ति इतना क्यों मजबूर हो जाए कि उसे अपनी जिंदगी देने की बात कहनी पड़े? इसका जवाब तंत्र को देना ही होगा, उस युवती को नहीं।

हेट स्पीच और प्रभावशाली लोग: डिजिटल युग की नई चुनौती

इस विवाद में एक और पहलू छिपा है जिस पर बात करना जरूरी है, सोशल मीडिया के प्रभावशाली लोगों की जवाबदेही। स्वतंत्र भारद्वाज जैसे इंसान लाखों लोगों तक पहुंच रखते हैं। जब वे वायरल वीडियो में हिंसा से जुड़े बयान देते हैं, तो उनका असर केवल उनके श्रोताओं तक सीमित नहीं रहता। यह एक सामाजिक संदेश बन जाता है कि हिंसा की भाषा में बोलना दंडनीय नहीं, बल्कि गौरवशाली है।

कानून में किसी भी व्यक्ति की नस्ल, धर्म या विचारधारा के आधार पर उसे चोट पहुंचाने वाले बयानों पर रोक है। यदि कोई व्यक्ति खुद घोषणा करे कि उसने हिंसा में हिस्सा ली और इसके बाद भी उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती, तो यह एक खतरनाक उदाहरण स्थापित करता है। इससे न केवल कानून की मर्यादा कमजोर होती है, बल्कि यह दर्शाता है कि कानून के सामने सभी नागरिक समान नहीं हैं।

पुलिस सुधार: अब और टाल नहीं सकते

यह घटना भारतीय पुलिस सुधार की उस लंबी बहस को दोबारा जीवित कर देती है जो दशकों से अधूरी पड़ी है। पुलिस अधिकारियों की स्वतंत्रता, उनके राजनीतिक दबाव से मुक्त होने की स्थिति और उनकी जवाबदेही के ढांचे पर सुप्रीम कोर्ट से लेकर विभिन्न आयोगों तक ने सुझाव दिए हैं, पर व्यवहार में बदलाव धीमा रहा है।

जब एक डीसीपी पर सार्वजनिक रूप से पक्षपात का आरोप लगता है, तो उसे खारिज करने या सिद्ध करने के लिए एक स्वतंत्र तंत्र होना चाहिए। आंतरिक जांच, जो अक्सर उसी विभाग द्वारा की जाती है, उसकी विश्वसनीयता प्रश्नचिह्न के अधीन रहती है। यही कारण है कि नागरिक समाज अक्सर स्वतंत्र जांच एजेंसी या न्यायिक जांच की मांग करता है।

क्या कानून व्यवस्था भी पार्टी लाइन के अधीन है?

इस पूरे मामले की सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि इसे आसानी से राजनीतिक रंग दिया जा सकता है। जंतर-मंतर प्रदर्शन से लेकर डीसीपी की भूमिका तक, हर बिंदु पर सत्तापक्ष और विपक्ष की अलग-अलग कथाएं गढ़ी जा सकती हैं। लेकिन कानून व्यवस्था कोई राजनीतिक प्लेटफॉर्म नहीं है। यह हर नागरिक के लिए समान रूप से लागू होनी चाहिए, चाहे वह किसी भी विचारधारा से जुड़ा हो।

जब एक अधिकारी पर यह आरोप लगे कि उसने अपनी व्यक्तिगत विचारधारा को कर्तव्य से ऊपर रखा, तो यह केवल उस अधिकारी के लिए नहीं, बल्कि पूरी पुलिस व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। एक ही घटना में दो तरफ के नागरिकों के प्रति असमान व्यवहार पुलिस की साख को गहरी चोट पहुंचाता है। इसे रोकने के लिए संस्थागत बदलाव जरूरी हैं।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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