अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के नए सीईओ की नियुक्ति ने एक बार फिर राम मंदिर को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पश्चिमी वायु कमान के प्रमुख रहे रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को ट्रस्ट का प्रमुख कार्यपालक अधिकारी बनाए जाने की खबर आते ही विपक्ष ने बौछारें खोल दीं। बिहार के मुख्य विपक्षी दल आरजेडी के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने इस नियुक्ति को ‘हास्यास्पद’ बताया, तो कांग्रेस ने इसे आंखें बूंदने वाली कार्रवाई करार दिया।
लेकिन क्या यह बहस सिर्फ एक नियुक्ति को लेकर है, या इसके पीछे बड़े सवाल छिपे हैं? क्या मंदिर के प्रबंधन में सैन्य अनुभव वाले अधिकारी की नियुक्ति असामान्य है, या यह एक व्यावहारिक फैसला है? और सबसे अहम बात—ट्रस्ट की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और जवाबदेही पर उठ रहे सवालों का जवाब कौन देगा? इन सवालों पर गौर करना ज़रूरी है।

चढ़ावे को लेकर उठी गड़बड़ी की आशंकाएं
नई नियुक्ति को लेकर हो रही बहस की जड़ में ट्रस्ट के भीतर पहले से चली आ रही असहजता है। पिछले कुछ समय से राम जन्मभूमि मंदिर में आने वाले चढ़ावों की रसीदों और धन के हिसाब-किताब को लेकर सवाल उठ रहे थे। मीडिया रिपोर्ट्स में दान-पात्र से जुड़ी अनियमितताओं की चर्चा खूब उठी और ट्रस्ट के भीतर ही आपसी तनाव की खबरें सामने आईं।
इसके बाद पुरानी समिति से जुड़े कई लोगों ने अपने पद से इस्तीफे दे दिए, जिसके बाद ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर सवालों का दौर शुरू हो गया। विपक्ष का आरोप है कि जिन लोगों के कार्यकाल में यह विवाद पैदा हुआ, उनसे कोई पूछताछ नहीं हुई और अब नई नियुक्ति के ज़रिए पूरे मामले को दफनाया जा रहा है।
यहां यह समझना ज़रूरी है कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट कोई आम धार्मिक संस्था नहीं है। यह देश के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और उनके श्रद्धा-धन का संरक्षक है। मंदिर में आने वाला प्रत्येक रुपया—चाहे वह दान-पात्र में डाला गया हो या ऑनलाइन चढ़ाया गया हो—एक आस्था की अभिव्यक्ति है। इसलिए इस ट्रस्ट की जवाबदेही का मानक सामान्य संस्थाओं से कहीं ऊंचा होना चाहिए। जब इतने बड़े पैमाने पर धन और इतनी गहरी आस्था शामिल हो, तो हर नियुक्ति और हर फैसले पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

नई नियुक्ति: कौन हैं एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा?
ट्रस्ट का नया सीईओ बनाए गए एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा (सेवानिवृत्त) भारतीय वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वे पश्चिमी वायु कमान के प्रमुख की जिम्मेदार संभाल रहे थे, जो देश की सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण कमानों में से एक मानी जाती है। सैन्य प्रशासन में इतने ऊंचे पद तक पहुंचना किसी भी अधिकारी की योग्यता, अनुशासन और नेतृत्व क्षमता का प्रमाण होता है।
इस नियुक्ति के पक्ष में तर्क दिया जा सकता है कि मंदिर ट्रस्ट अब एक विशाल संस्थागत ढांचा बन चुका है, जहां लाखों श्रद्धालु आते हैं, करोड़ों का प्रबंधन होता है और व्यवस्थित प्रशासन की ज़रूरत है। एक अनुशासित, ईमानदार प्रतिष्ठा वाले सेवानिवृत्त अधिकारी की नियुक्ति से ट्रस्ट की कार्यप्रणाली में सुधार की उम्मीद जताई जा सकती है। देश में कई धार्मिक और धर्मार्थ संस्थानों में सेवानिवृत्त अधिकारियों को प्रशासनिक भूमिकाएं दी गई हैं।
लेकिन विपक्ष का तर्क भी निरर्थक नहीं है। उनका कहना है कि जब मुद्दा मंदिर के चढ़ावों की लेखा-जोखा व्यवस्था का है, तो फिर पाकिस्तान से लड़ाई का अनुभव किस काम आएगा? शिवानंद तिवारी ने अपने बयान में यही सवाल उठाते हुए व्यंग्य किया कि लगता है देश में ईमानदार और प्रशासनिक अनुभव वाले लोगों की कमी हो गई है।
शिवानंद तिवारी का व्यंग्य
आरजेडी नेता शिवानंद तिवारी अपने तीखे व्यंग्य के लिए जाने जाते हैं, और इस बार उन्होंने फेसबुक पोस्ट के ज़रिए मुद्दे को खींचकर एक बड़े बिंदु पर ले जाया। उनका मूल तर्क यह है कि ट्रस्ट में चढ़ावे की रसीदों और पैसों को लेकर गड़बड़ी की चर्चा हुई। पुरानी कमेटी के लोग इस्तीफा देकर चले गए। जो लोग इस पूरी व्यवस्था के ‘सर्वेसर्वा’ थे, उनसे कोई पूछताछ नहीं हुई और अब नए सिरे से व्यवस्था के नाम पर एक रिटायर्ड एयर मार्शल को लाया गया।
तिवारी ने सवाल उठाया कि मंदिर के चढ़ावे की सुरक्षा और व्यवस्था के लिए ‘युद्ध का अनुभव’ क्यों तलाशा जा रहा है? उन्होंने कहा कि पूरा मामला इतना हास्यास्पद है कि समझ नहीं आता इस पर हंसा जाए या रोया जाए।
यह व्यंग्य चाहे जितना तीखा हो, इसके पीछे की चिंता गंभीर है। असली सवाल यह है कि जब किसी संस्था में गड़बड़ी की आशंका जताई जाती है, तो उसका समाधान ‘पूछताछ’ होना चाहिए या सिर्फ ‘पुनर्गठन’? अगर पुराने पदाधिकारी बिना जवाबदेही के निकल जाते हैं और नए व्यक्ति को जिम्मेदारी थमा दी जाती है, तो क्या इससे पारदर्शिता आती है या सिर्फ एक नया पर्दा गिरता है?
कांग्रेस की प्रतिक्रिया
बिहार कांग्रेस के प्रवक्ता डॉ. स्नेहाशीष वर्धन ने भी इस नियुक्ति पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि राम के नाम पर राजनीति करने वालों ने राम मंदिर के चंदा को लेकर जो किया, वह करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर चोट है। उन्होंने शब्दों की करामात के साथ कहा कि ‘चंपत’ राय ने ‘चंपत’ (चोरी) की भूमिका अदा की—हालांकि यह शब्द-युग्म उनका राजनीतिक व्यंग्य है, इसे तथ्य नहीं माना जा सकता।
कांग्रेस प्रवक्ता का सबसे अहम तर्क यह है कि नए सीईओ की नियुक्ति एक ‘आई वॉश’ है, जिसका उद्देश्य यह है कि आने वाले समय में यदि कोई जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति या ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए, तो संगठन के लोग सीधे उस व्यक्ति की ‘देशभक्ति’ पर सवाल उठा सकें—क्योंकि नियुक्त व्यक्ति एक सजग योद्धा रह चुका है।
यह आरोप भले ही तीखा है, लेकिन इसमें एक वास्तविक राजनीतिक चिंता छिपी है। देश में कुछ समय से यह प्रवृत्ति देखी गई है कि सैन्य पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को नागरिक संस्थानों में लाया जाता है, और फिर उन पर होने वाली किसी भी आलोचना को ‘सेना का अपमान’ या ‘देशद्रोह’ तक कह दिया जाता है। सैनिकों की वीरता किसी दल की संपत्ति नहीं हो सकती, और न ही सेवानिवृत्त अधिकारी की नियुक्ति किसी संस्था की जवाबदेही खत्म कर सकती है।
विपक्ष की चुनौती: मुद्दा या माहौल?
बहरहाल, यह भी समझना ज़रूरी है कि विपक्ष की हर प्रतिक्रिया शुद्ध रूप से जवाबदेही के सवाल से प्रेरित हो, यह मान लेना भी भोलापन होगा। बिहार में चुनावी माहौल गर्म होते दिख रहा है और राम मंदिर जैसे मुद्दे राजनीतिक भावनाओं को सीधे छूते हैं। आरजेडी और कांग्रेस के लिए यह नियुक्ति एक ऐसा मौका है जिसमें वे बीजेपी पर ‘आस्था का दोहन’ का आरोप लगा सकते हैं—वही आरोप जो बीजेपी पर वर्षों से लगाए जा रहे हैं।
शिवानंद तिवारी की टिप्पणी और कांग्रेस प्रवक्ता के बयान दोनों में एक सामान्य रणनीति झलकती है: बीजेपी को उसके अपने मैदान—आस्था—पर घेरना। लेकिन इस रणनीति की एक सीमा भी है। जब तक विपक्ष ट्रस्ट की जवाबदेही के सवालों को संस्थागत रूप से नहीं उठाता—जैसे ऑडिट रिपोर्ट्स की सार्वजनिकता, चंदा संग्रह की पारदर्शी व्यवस्था, पदाधिकारियों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता—तब तक ये बयान बजरंगी से पहले की गूंज बनकर रह जाएंगे। आरोप की भाषा चुनावी मंच तक तो जाती है, लेकिन संस्थागत सुधार की राह बयानों से नहीं, निरंतर जन-दबाव और कानूनी-लेखा प्रक्रियाओं से खुलती है।
राजनीतिक पड़ाव: बिहार का संदर्भ
इस बहस का एक तात्कालिक संदर्भ बिहार की राजनीति भी है। आरजेडी और कांग्रेस दोनों ने इस मुद्दे को बिहार के नेतृत्व से उठाया है, जो संयोग नहीं माना जा सकता। राम मंदिर का मुद्दा हिंदी पट्टी की राजनीति में वर्षों से केंद्रीय रहा है। विपक्ष की कोशिश है कि हिंदू वोटबैंक में बीजेपी की पकड़ में दरार पैदा करें, और इस नियुक्ति को वह अवसर मान रहे हैं।
बीजेपी के लिए चुनौती यह है कि वह इस मुद्दे को सिर्फ भावनात्मक जवाबी हमले से नहीं टाल सकती। अगर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली में सचमुच सुधार का इरादा है, तो उसे साबित करना होगा—पारदर्शी ऑडिट, सार्वजनिक रिपोर्टिंग और संस्थागत सुधारों से। चुप्पी और टालमटोल से तो हर नियुक्ति अगले विवाद का बीज बन जाएगी।























