भारतीय लोकतंत्र में चुनाव कभी महज एक राजनीतिक प्रक्रिया नहीं होते, ये उस धड़कन का दर्पण होते हैं जो हर पांच साल में जनता के भीतर ठहर-ठहर कर गूंजती है। साल 2027 ऐसे ही तीन प्रदेशों की धड़कनें तेज करने वाला है, जहां इतिहास, जाति, धर्म और विकास के सवाल सुलगते रहे हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब — तीनों राज्यों की राजनीति अपने-अपने ढंग से राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करती रही है। यूपी देश का सबसे बड़ा राज्य है, उत्तराखंड ‘देवभूमि’ होकर भी राजनीतिक बरोमीटर का काम करता है और पंजाब अपनी अलग पहचान, खेती और शहादत की जमीन से जुड़ा है।
ऐसे मौके पर जब चुनाव अभी काफी दूर हैं, किंतु राजनीतिक दल पहले ही अपनी चौखट सजा रहे हैं, एक सर्वे ने तीनों प्रदेशों के मतदाताओं के मन की दशा सामने रख दी है। ‘वोट वाइब’ के ‘स्टेट वाइब’ सर्वे में जो आंकड़े उभरे हैं, वे चुनावी रणनीति बना रही पार्टियों के लिए सुखद और चिंताजनक — दोनों तरह के संकेत लेकर आए हैं।

उत्तर प्रदेश: कांटे की टक्कर की सियासत
उत्तर प्रदेश हमेशा से भारतीय राजनीति का केंद्रीय मंच रहा है। यहां के परिणाम केंद्र की सत्ता के समीकरणों को झकझोर देते हैं। सर्वे के आंकड़े गौर करने योग्य हैं — जब जनता से पूछा गया कि वे किस पार्टी या गठबंधन को वोट देने की सबसे अधिक संभावना रखते हैं, तो 41.8 प्रतिशत लोगों ने भाजपा गठबंधन का नाम लिया, वहीं 38.7 प्रतिशत ने समाजवादी पार्टी गठबंधन को चुना। दोनों के बीच महज तीन प्रतिशत का अंतर है, जो राजनीतिक भाषा में ‘नगण्य’ माना जाता है। बसपा इस बार एक छोटे से घेरे तक सीमित दिख रही है — मात्र 5.2 प्रतिशत।
इस आंकड़े को समझने के लिए हमें पिछले कुछ वर्षों की राजनीतिक तस्वीर पर नजर डालनी होगी। 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अपनी सत्ता बरकरार रखी थी, जो दशकों में एक दुर्लभ उपलब्धि मानी गई, क्योंकि यहां परंपरागत रूप से सत्ता बदलती रही है। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों ने भाजपा के लिए सोचने की जगह छोड़ दी थी। उस चुनाव में सपा-कांग्रेस के गठबंधन ने भाजपा को कई दृढ़ किलों में हराया था। पिछड़े वर्गों, दलितों और युवा मतदाताओं के बीच गठबंधन की पकड़ दिखाई दी थी।
इस सर्वे में भाजपा गठबंधन की थोड़ी बढ़त यह संदेश देती है कि मतदाता अभी निर्णायक मोड़ पर नहीं पहुंचा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व पर राज्य में लॉ एंड ऑर्डर और कई विवादास्पद फैसलों के कारण समर्थन और विरोध — दोनों ही तीखे रहे हैं। वहीं सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की ‘पीडीए’ (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति ने परिणाम दिया है, लेकिन उनके सामने अभी यह चुनौती है कि ब्राह्मण और अपराधी वर्गों सहित अन्य वर्गों का भरोसा कैसे जीता जाए।
सबसे बड़ी रणनीतिक नकारात्मकता इस आंकड़े में बहुजन समाज पार्टी की स्थिति की है। जिस पार्टी के एक नेतृत्व में चुनावी चौखटे से सबसे ऊपर रहने की छवि थी, उसके यहां सिर्फ 5.2 प्रतिशत समर्थन और जीत की अपेक्षा में 4.4 प्रतिशत — यह आंकड़ा मायावती की पार्टी के चुनावी पतन का संकेत जान पड़ता है। बसपा का यह वोट मुख्य रूप से किसके पक्ष में जाएगा — यही असली बाजीगरी 2027 की होगी।
उत्तराखंड: देवभूमि में दो दलों की धक्का-मुक्की
उत्तराखंड की राजनीति में बदलाव की रफ्तार हमेशा से तेज रही है। किसी एक दल की सरकार यहां लगातार कई कार्यकाल टिक पाई हो, यह अपवाद भर है। 2022 के चुनावों में भाजपा ने पुष्कर सिंह धामी को अचानक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाकर चुनाव लड़ा था और जीत हासिल की थी। सर्वे के नए आंकड़ों में 40.9 प्रतिशत लोग भाजपा को वोट देने की संभावना रखते हैं और 36.7 प्रतिशत कांग्रेस को। यह अंतर — लगभग चार प्रतिशत — ऐतिहासिक दृष्टि से उत्तराखंड में बहुत बड़ा नहीं कहा जा सकता।
आंकड़ों में एक और रोचक पहलू उत्तराखंड क्रांति दल की उपस्थिति है — 8.6 प्रतिशत मतदाता इस क्षेत्रीय दल को वोट देने की संभावना रखते हैं और 9.2 प्रतिशत को उसकी जीत की उम्मीद है। यह संख्या अनुपात में छोटी हो सकती है, लेकिन क्षेत्रीय चुनावों में कहीं-कहीं पर ऐसा प्रतिशत निर्णायक भूमिका निभाता है। यदि भावी सरकार बनाने में क्षेत्रीय दल के वोट उभर आए, तो परिणाम उलटा जा सकता है। उत्तराखंड में भाजपा की ताकत धामी सरकार के कठोर कदमों, समान नागरिक संहिता जैसे फैसलों और धर्माधार के मुद्दों के इर्द-गिर्द बनी है, वहीं कांग्रेस की मुख्य कमजोरी संगठन और नेतृत्व की स्थिरता रही है। 2027 में यहां चुनावी लड़ाई के चित्र के मानसून की पहली कड़ी जैसी ही गौर करने योग्य स्थिति बनती जा रही है।

पंजाब: आप की पकड़, कांग्रेस की सांस और भाजपा का खाली घर
पंजाब की राजनीतिक कहानी पिछले दस वर्षों में ही पूरी तरह से बदल चुकी है। एक ऐसा प्रदेश, जहां सिर्फ दो परंपरागत दलों का राज चलता था, वहां 2022 में आम आदमी पार्टी ने भूचाल ला दिया था। अब सर्वे के आंकड़े दर्शाते हैं कि 34 प्रतिशत मतदाता आप को वोट देने की संभावना रखते हैं और 36.7 प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि भगवंत मान की सरकार दोबारा जीतेगी। कांग्रेस 30.2 प्रतिशत के साथ निकटतम प्रतिद्वंद्वी बनी हुई है, जो बताता है कि पंजाब में कांग्रेस अभी भी खेमे में मौजूद है।
सबसे चिंताजनक स्थिति भाजपा की है। 12.2 प्रतिशत — यह उन प्रदेशों में भाजपा का आंकड़ा है जहां केंद्र सरकार के पिछले कई वर्षों में पूरी देशव्यापी राजनीतिक जमीन मजबूत हुई। पंजाब में भाजपा अब भी अपनी जमीन तलाश रही है। शिरोमणि अकाली दल 11.3 प्रतिशत पर टिका है, जो बताता है कि पंथिक राजनीति की पुरानी बराबरी टूट चुकी है। अकाली दल (वारिस पंजाब दे) 6.6 प्रतिशत पर यह दिखाता है कि किसान आंदोलन की विरासत की राजनीति एक दर्जना हिस्सा पाने में कामयाब रही है।
पंजाब में आप की स्थिति की कठिनाई यह है कि सत्ता की जिम्मेदारियां अब उनके कंधों पर हैं। भगवंत मान सरकार को ‘दिल्ली मॉडल’ का परिणाम दिखाना है, जबकि नशे की समस्या, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था के सवाल और किसानों की समस्याओं के घेरे में उनकी सरकार है। यदि अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद भी जनता का विश्वास बना रहे, तो आप की जीत के संकेत महज सर्वे के आंकड़े नहीं रहेंगे।
मतदाता का जल्दी पक्का हुआ फैसला
इस सर्वे का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि चुनाव में अभी काफी समय होते हुए भी बड़ी संख्या में मतदाताओं ने अपना फैसला कर लिया है। यूपी में 64.4 प्रतिशत, उत्तराखंड में 52.5 प्रतिशत और पंजाब में 71.2 प्रतिशत लोगों ने कहा है कि उन्होंने यह तय कर लिया है कि वे किसे वोट देंगे। यह तीनों प्रदेशों में मतदाताओं की राजनीतिक जागरूकता और अटल रुख का संकेत है।
यह आंकड़ा दो प्रकार से पढ़ा जा सकता है। एक दृष्टिकोण यह है कि समाज की राजनीतिक सोच अब ध्रुवीकृत हो चुकी है — लोग अपने विचारों, पहचान और अनुभवों के आधार पर निर्णय ले चुके हैं और चुनावी प्रचार उन्हें हिला पाएगा, यह मुश्किल काम होगा। दूसरा पहलू यह है कि यह अटलता कई बार ‘संतोषजनक विकल्पों की कमी’ का भी रूप हो सकती है — मतदाता वोट देने के लिए तैयार है, लेकिन यह आंकड़ा उस आकर्षण का माप नहीं है जिसे पार्टी-गठबंधन में बदला जा सकता है। जो लोग ‘एक पसंद है मगर फैसला नहीं किया’ — यूपी में 19 प्रतिशत, उत्तराखंड में 25.6 प्रतिशत और पंजाब में 14.7 प्रतिशत — वे मतदाता संख्या में छोटे दिखते हैं, लेकिन उन्हीं के ऊपर सियासती लड़ाई की जीत-हार टिकी होगी।
मतदाता का फैसला पहले से तय — यह अच्छा है या बुरा?
सर्वे का एक पहलू इससे भी अधिक विचारणीय है — मतदाताओं की तीव्र निश्चितता। यूपी में 64.4 प्रतिशत, उत्तराखंड में 52.5 प्रतिशत और पंजाब में 71.2 प्रतिशत लोगों ने अपना वोट पहले ही तय कर लिया है। पंजाब में यह आंकड़ा सबसे ऊँचा है, जो दर्शाता है कि वहाँ की जनता अपनी राजनीतिक पसंद में अपेक्षाकृत दृढ़ है।
इसके दो पक्ष हैं। पहला सकारात्मक पक्ष यह कि मतदाता अब चुनावी भाषण, झूठे वादों और आख़िरी समय की लुभावनी घोषणाओं से कम प्रभावित होता है। वह अपने निर्णय को सरकार के प्रदर्शन, अपने आर्थिक अनुभव और उम्मीदों की पूर्ति पर आधारित करता है। यह परिपक्व लोकतंत्र की निशानी है।
दूसरा पक्ष यह कि चुनावी महीनों की ऊर्जा और जनसंपर्क किसी के लिए अब बहुत ज़्यादा फलदायी नहीं रहेगा। वह पार्टी जो अभी से ज़मीन पर काम कर रही है, उसी को लाभ होगा। यानी 2027 का चुनाव 2025 से ही शुरू हो चुका है और जो पार्टी इस तथ्य को समझ गई है, उसी का पलड़ा भारी होगा।























