लोकप्रियता की नई राजनीति, दीपके की बढ़ती सियासी चर्चा

भारतीय राजनीति के लिए पूरी तरह नई घटना नहीं है। देश के राजनीतिक इतिहास में कई ऐसे उदाहरण रहे हैं जब सामाजिक आंदोलनों ने नए नेतृत्व को जन्म दिया। फर्क इतना है कि आज सोशल मीडिया और डिजिटल संचार ने किसी आंदोलन को स्थानीय सीमा से बाहर ले जाने की गति कई गुना बढ़ा दी है।

सियासत में उभरता नया चेहरा (फाइल फोटो)

HIGHLIGHTS

  • क्या दीपके बन रहे हैं नया चेहरा?
  • सियासत में दीपके की दस्तक
  • मोदी के बाद किसकी बारी?
  • दीपके की लोकप्रियता ने चौंकाया

भारतीय राजनीति में लोकप्रियता का पैमाना लगातार बदल रहा है। कभी राजनीतिक दल, लंबे समय का जनसंघर्ष, चुनावी जीत और संगठन किसी नेता की पहचान तय करते थे। आज सोशल मीडिया, आंदोलनों, वायरल अभियानों और कुछ ही दिनों में राष्ट्रीय स्तर पर बन जाने वाली सार्वजनिक छवि ने राजनीति के इस पुराने समीकरण को काफी हद तक बदल दिया है। इसी बदलते राजनीतिक परिदृश्य में अभिजीत दीपके का नाम अचानक चर्चा में आना महज एक सर्वे का आंकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में बदलती राजनीतिक आकांक्षाओं का संकेत भी माना जा सकता है।

हाल में सामने आए ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे के आंकड़ों में प्रधानमंत्री पद के लिए अभिजीत दीपके को 1.3 प्रतिशत लोगों की पसंद बताया गया है, जबकि अरविंद केजरीवाल को 1.2 प्रतिशत लोगों ने अपनी पसंद माना। आंकड़ों का अंतर बेहद मामूली है, लेकिन राजनीतिक अर्थों में यह तुलना इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि दोनों नेताओं की राजनीतिक यात्रा और सार्वजनिक पहचान में जमीन-आसमान का अंतर है।

एक ओर अरविंद केजरीवाल हैं, जो दिल्ली के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके हैं और आम आदमी पार्टी के संस्थापक नेताओं में शामिल हैं। दूसरी ओर अभिजीत दीपके का नाम कुछ समय पहले तक राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में लगभग अपरिचित था। ऐसे में किसी राष्ट्रीय सर्वे में उनका नाम प्रधानमंत्री पद की पसंद के रूप में सामने आना इस बात की ओर संकेत करता है कि राजनीतिक लोकप्रियता अब केवल स्थापित चेहरों की बपौती नहीं रह गई है।

लेकिन इस आंकड़े को लेकर सबसे पहले सावधानी जरूरी है। 1.3 प्रतिशत और 1.2 प्रतिशत के बीच का अंतर इतना छोटा है कि इसे निर्णायक राजनीतिक बढ़त कहना जल्दबाजी होगी। खासकर तब, जब सर्वे में तीन प्रतिशत का एरर मार्जिन बताया गया हो। इसलिए यह कहना कि दीपके ने लोकप्रियता के मामले में केजरीवाल को निश्चित रूप से पीछे छोड़ दिया है, आंकड़ों की व्याख्या से अधिक राजनीतिक सनसनी पैदा करने वाली बात होगी।

फिर भी, सवाल यह नहीं है कि दीपके केजरीवाल से वास्तव में आगे निकल गए या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि दीपके जैसे अपेक्षाकृत नए चेहरे का नाम ही प्रधानमंत्री पद की पसंद के सर्वे में क्यों दिखाई देने लगा?

आंदोलन से बनी पहचान का असर

किसी भी लोकतंत्र में आंदोलन राजनीतिक पहचान बनाने का शक्तिशाली माध्यम होते हैं। संसद और चुनाव के बाहर जब कोई नेता किसी जनमुद्दे को लेकर लगातार जनता के बीच दिखाई देता है, तो उसकी राजनीतिक विश्वसनीयता बनने लगती है। अभिजीत दीपके की चर्चा भी इसी संदर्भ में देखी जानी चाहिए।

जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच पार्टी के आंदोलन ने उन्हें अचानक व्यापक राजनीतिक चर्चा में ला दिया। आंदोलन के बाद यदि उनका नाम राष्ट्रीय सर्वे में दर्ज होने लगा है, तो इसका एक अर्थ यह हो सकता है कि आज का मतदाता केवल पारंपरिक राजनीतिक संस्थाओं के माध्यम से ही नेतृत्व तलाश नहीं रहा। वह नए चेहरों और नए राजनीतिक प्रयोगों के प्रति भी जिज्ञासु है।

यह भारतीय राजनीति के लिए पूरी तरह नई घटना नहीं है। देश के राजनीतिक इतिहास में कई ऐसे उदाहरण रहे हैं जब सामाजिक आंदोलनों ने नए नेतृत्व को जन्म दिया। फर्क इतना है कि आज सोशल मीडिया और डिजिटल संचार ने किसी आंदोलन को स्थानीय सीमा से बाहर ले जाने की गति कई गुना बढ़ा दी है।

एक व्यक्ति यदि किसी मुद्दे पर प्रभावी ढंग से जनता का ध्यान खींचने में सफल होता है, तो वह कुछ ही सप्ताह या महीनों में ऐसी पहचान हासिल कर सकता है, जिसके लिए पारंपरिक राजनीति में वर्षों लगते थे।

यही कारण है कि दीपके के आंकड़े को केवल एक व्यक्ति की लोकप्रियता के रूप में देखने के बजाय नई राजनीतिक संचार व्यवस्था के संकेत के रूप में देखना चाहिए।

केजरीवाल के लिए यह चेतावनी क्यों?

अरविंद केजरीवाल भारतीय राजनीति के उन नेताओं में हैं जिन्होंने पारंपरिक राजनीति के बाहर से आकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बनाई। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर आम आदमी पार्टी के गठन और दिल्ली की सत्ता तक उनकी यात्रा भारतीय राजनीति में असाधारण बदलाव का उदाहरण रही है।

इसलिए दीपके और केजरीवाल के बीच की यह छोटी-सी तुलना एक दिलचस्प राजनीतिक विडंबना भी पैदा करती है। जिस तरह कभी केजरीवाल ने स्थापित राजनीतिक व्यवस्था के सामने खुद को एक नए विकल्प के रूप में पेश किया था, उसी तरह आज उनके सामने ऐसे नए चेहरे उभर सकते हैं जो स्वयं को स्थापित राजनीति से अलग बताएं।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि केजरीवाल का राजनीतिक प्रभाव समाप्त हो रहा है। किसी राष्ट्रीय सर्वे में 1.2 प्रतिशत की हिस्सेदारी को किसी बड़े नेता के पतन का प्रमाण नहीं माना जा सकता। केजरीवाल के पास राजनीतिक संगठन, चुनावी अनुभव, प्रशासनिक पृष्ठभूमि और राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना जाने वाला ब्रांड है। इन संसाधनों की तुलना किसी नए राजनीतिक चेहरे से करना अभी उचित नहीं होगा।

लेकिन स्थापित नेताओं के लिए असली चुनौती अक्सर चुनावी आंकड़ों से पहले बदलती हुई जनभावना होती है। यदि नए चेहरे लगातार युवाओं, डिजिटल दर्शकों या किसी खास सामाजिक वर्ग में जगह बनाने लगें, तो पुराने राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि मतदाता की अपेक्षाएं बदल रही हैं।

प्रधानमंत्री पद के आंकड़े क्या बताते हैं?

सर्वे में नरेंद्र मोदी अब भी प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे मजबूत पसंद बने हुए हैं। करीब 48.7 प्रतिशत लोगों का उन्हें पसंद करना बताता है कि राष्ट्रीय नेतृत्व के स्तर पर उनकी पकड़ फिलहाल बहुत मजबूत है। राहुल गांधी 27.1 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर हैं। इसके बाद तमिल अभिनेता और राजनीतिक नेता सी. जोसेफ विजय का नाम 9.2 प्रतिशत समर्थन के साथ सामने आता है।

इन आंकड़ों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि प्रधानमंत्री पद की पसंद में अभी भी राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित चेहरों का वर्चस्व कायम है। मोदी और राहुल गांधी के बीच बड़ा अंतर है, जबकि बाकी नेताओं के आंकड़े काफी नीचे दिखाई देते हैं।

इस लिहाज से दीपके का 1.3 प्रतिशत समर्थन बड़ी चुनावी ताकत का संकेत नहीं है। इसे राजनीतिक संभावना के शुरुआती संकेत के रूप में पढ़ना अधिक उचित होगा। लोकतंत्र में शुरुआती लोकप्रियता और चुनावी क्षमता दो अलग चीजें हैं। किसी नेता को लेकर लोगों में उत्सुकता होना एक बात है और उस उत्सुकता को स्थायी राजनीतिक समर्थन में बदल देना दूसरी।

गठबंधन राजनीति अभी भी निर्णायक

सर्वे के मुताबिक यदि उस समय लोकसभा चुनाव हो तो एनडीए को 326 और इंडिया गठबंधन को 185 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। वोट शेयर में भी एनडीए को लगभग 45 प्रतिशत और इंडिया गठबंधन को 39 प्रतिशत हिस्सेदारी मिलने का अनुमान बताया गया है।

यदि इन आंकड़ों को व्यापक राजनीतिक तस्वीर के संदर्भ में देखें, तो संदेश साफ है—राष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन अभी भी चुनावी समीकरण का केंद्रीय तत्व बने हुए हैं। प्रधानमंत्री पद की लोकप्रियता किसी एक नेता की व्यक्तिगत छवि को दिखा सकती है, लेकिन लोकसभा चुनाव का वास्तविक परिणाम संगठन, उम्मीदवार, क्षेत्रीय समीकरण, गठबंधन, स्थानीय मुद्दों और मतदान व्यवहार जैसे अनेक कारकों से तय होता है।

यही कारण है कि प्रधानमंत्री पद की पसंद का सर्वे और लोकसभा सीटों का अनुमान एक ही चीज नहीं हैं। एक मतदाता किसी नेता को प्रधानमंत्री के रूप में पसंद कर सकता है, लेकिन अपने लोकसभा क्षेत्र में किसी दूसरे दल के उम्मीदवार को वोट दे सकता है।

आंकड़ों से ज्यादा महत्वपूर्ण है उनका संदर्भ

सर्वे में एक लाख से अधिक लोगों की राय लिए जाने का दावा इसे व्यापक कवरेज वाला अध्ययन बनाता है। लेकिन किसी भी सर्वे के आंकड़ों को अंतिम राजनीतिक सत्य मानना उचित नहीं होगा। सर्वेक्षण की पद्धति, नमूना चयन, क्षेत्रीय वितरण, ग्रामीण और शहरी मतदाताओं का अनुपात, उम्र और सामाजिक समूहों की भागीदारी जैसे कई तत्व परिणामों को प्रभावित करते हैं।

इसके अलावा तीन प्रतिशत का एरर मार्जिन भी यह याद दिलाता है कि बेहद छोटे अंतर को निर्णायक बढ़त के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए। दीपके और केजरीवाल के बीच केवल 0.1 प्रतिशत का अंतर है। यदि एरर मार्जिन तीन प्रतिशत है, तो इस अंतर को लेकर किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचना सांख्यिकीय रूप से बेहद सावधानी की मांग करता है।

इसलिए इस खबर की सबसे सनसनीखेज व्याख्या—कि दीपके ने केजरीवाल को लोकप्रियता में पछाड़ दिया—शायद सबसे कम महत्वपूर्ण व्याख्या है। अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि एक नया राजनीतिक चेहरा राष्ट्रीय मतदाताओं की कल्पना में जगह बनाने लगा है।

क्या आंदोलन से राष्ट्रीय राजनीति बन सकती है?

यह वह प्रश्न है जिसका जवाब आने वाला समय देगा। भारत जैसे विशाल और विविध देश में आंदोलन से लोकप्रियता हासिल करना संभव है, लेकिन उसे स्थायी राजनीतिक शक्ति में बदलना कठिन है।

किसी नेता को राष्ट्रीय विकल्प बनने के लिए केवल सरकार या मंत्री के खिलाफ आंदोलन करना पर्याप्त नहीं होता। उसे रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, अर्थव्यवस्था, विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और संघीय संबंधों जैसे जटिल मुद्दों पर स्पष्ट दृष्टिकोण देना पड़ता है।

इसके साथ संगठन खड़ा करना, अलग-अलग राज्यों में स्थानीय नेतृत्व विकसित करना और चुनावी राजनीति की कठिन वास्तविकताओं को समझना भी जरूरी है। भारत की राजनीति में कई बार आंदोलन लोकप्रिय हुए, चेहरे चर्चित हुए और कुछ समय बाद उनका प्रभाव सीमित हो गया। दूसरी ओर कुछ आंदोलनों ने ऐसे नेतृत्व को जन्म दिया जिसने वर्षों तक राजनीति को प्रभावित किया।

सोशल मीडिया युग में लोकप्रियता का नया अर्थ

दीपके के मामले में एक और पहलू महत्वपूर्ण है—उनकी पृष्ठभूमि का डिजिटल राजनीति से जुड़ा होना। सोशल मीडिया आज राजनीतिक धारणा बनाने का प्रमुख माध्यम बन चुका है। राजनीतिक संदेश अब केवल रैलियों, पोस्टरों और टेलीविजन बहसों के जरिए जनता तक नहीं पहुंचता। एक वीडियो, एक बयान या एक अभियान कुछ घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है।

इससे राजनीति में प्रवेश की बाधाएं कुछ हद तक कम हुई हैं। जिन लोगों के पास पारंपरिक संगठन नहीं है, वे भी डिजिटल माध्यमों से अपना राजनीतिक नैरेटिव तैयार कर सकते हैं। लेकिन सोशल मीडिया की लोकप्रियता और जमीनी संगठन में बड़ा अंतर है।

डिजिटल दुनिया में ट्रेंड होना और मतदान केंद्र तक समर्थकों को पहुंचाना दो अलग क्षमताएं हैं। इसलिए दीपके की वास्तविक परीक्षा तब होगी जब उनकी लोकप्रियता सोशल मीडिया और आंदोलनों से आगे बढ़कर जमीनी राजनीतिक समर्थन में बदलती है।

लोकतंत्र के लिए यह बदलाव

नए राजनीतिक चेहरों का उभरना लोकतंत्र के लिए अपने आप में नकारात्मक नहीं है। इसके उलट, यह स्थापित राजनीतिक दलों को आत्ममंथन के लिए मजबूर कर सकता है। यदि जनता नए नेताओं की ओर आकर्षित हो रही है, तो इसका मतलब यह भी हो सकता है कि मतदाता मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से कुछ नए जवाब चाहता है।

नई पीढ़ी की प्राथमिकताएं, रोजगार की चिंता, शिक्षा, डिजिटल अधिकार, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही जैसे मुद्दे पुराने राजनीतिक भाषणों से अलग तरीके से उठाए जा सकते हैं। स्थापित दलों के लिए यह समझना जरूरी है कि केवल पुराने समीकरणों के भरोसे भविष्य की राजनीति नहीं जीती जा सकती।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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