Discover the miracle of nature: प्रकृति ने हर जीव को उसकी संतान की परवरिश के लिए कुछ न कुछ खास गुण दिए हैं। इंसानों समेत सभी स्तनधारी जानवरों में मां के शरीर में स्तन होते हैं, जिनमें बच्चे के जन्म के बाद दूध बनता है। लेकिन पक्षियों की दुनिया में ऐसा कोई अवयव नहीं होता। फिर भी अजब बात यह है कि कबूतर अपने नवजात चूजों को ‘दूध’ पिलाता है। जी हां, आपने बिल्कुल सही पढ़ा! जिस पक्षी के शरीर पर न स्तन होते हैं, न ममरी ग्रंथियां, वह भी अपने बच्चों को दूध जैसा पोषक तत्व खिलाता है। आइए जानते हैं इस रहस्य के पीछे छिपी अद्भुत विज्ञान की कहानी.
क्या है कबूतर का ‘दूध’?
जिसे लोग आम बोलचाल में कबूतर का दूध कहते हैं, विज्ञान की भाषा में उसे क्रॉप मिल्क (Crop Milk) या पिजन मिल्क कहा जाता है। यह स्तनधारियों के दूध जैसा तरल नहीं, बल्कि एक गाढ़ा, पनीर जैसी बनावट वाला अर्ध-ठोस पदार्थ होता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह दूध किसी ग्रंथि से निकलता नहीं, बल्कि कबूतर के पाचन तंत्र के एक हिस्से से तैयार होता है।
कबूतर समेत कई पक्षियों के गले में क्रॉप (Crop) नाम की एक थैली जैसी संरचना होती है। यह थैली आमतौर पर भोजन को कुछ समय के लिए संभालकर रखने का काम करती है लेकिन जब कबूतर के घर संतान आती है, तो यही क्रॉप एक छोटे-से ‘डेयरी प्लांट’ की तरह काम करने लगता है।
शरीर में कैसे बनता है यह खास ‘दूध’
जब मादा कबूतर अंडे देती है, तो नर और मादा दोनों के शरीर में प्रोलैक्टिन (Prolactin) नाम का हार्मोन सक्रिय हो जाता है। यही हार्मोन इंसानों समेत स्तनधारियों में दूध बनने की प्रक्रिया शुरू करता है। इस हार्मोन के प्रभाव से क्रॉप की अंदरूनी परत की कोशिकाएं तेजी से विकसित होने लगती हैं और वसा व प्रोटीन से भरपूर एक विशेष स्राव का उत्पादन करने लगती हैं।
यह स्राव क्रॉप की दीवारों पर परत के रूप में जमा होता है इंटरेस्टिंग बात यह है कि यह प्रक्रिया अंडे फूटने से एक-दो दिन पहले ही शुरू हो जाती है, ताकि जैसे ही चूजा बाहर आए, उसका पहला भोजन तैयार रहे।
चोंच के जरिए कैसे पहुंचता है चूजों तक?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्तन नहीं होने पर चूजे यह दूध पीते कैसे हैं? इसका तरीका काफी अनोखा है। नवजात चूजे, जिन्हें स्क्वैब (Squab) कहा जाता है, अपनी नन्ही चोंच को माता-पिता की चोंच के अंदर डाल देते हैं। तब वयस्क कबूतर अपने क्रॉप में जमा इस पोषक पदार्थ को रीगर्जिटेट (उगलकर) चूजे के मुंह में सीधे पहुंचा देता है।
यानी यहां स्तन से दूध पीने की जगह मुंह से मुंह मिलाकर भोजन देने की पद्धति अपनाई जाती है। जन्म के पहले कुछ दिनों तक चूजे सिर्फ इसी क्रॉप मिल्क पर निर्भर रहते हैं। इसके बाद धीरे-धीरे उनके आहार में दाने और अनाज मिलाए जाने लगते हैं।
सबसे बड़ी खासियत: पिता भी देते हैं दूध!
कबूतरों से जुड़ा सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि यहां दूध बनाने की जिम्मेदारी सिर्फ मादा की नहीं होती। नर कबूतर भी उतनी ही मात्रा में क्रॉप मिल्क बनाता है। यानी कबूतरों की दुनिया में पिता भी ‘मां’ की भूमिका निभाते हैं। दोनों मिलकर बारी-बारी से चूजों को खिलाते हैं। ऐसा सहकारी पालन-पोषण प्रकृति में बहुत कम जीवों में देखने को मिलता है और यही कबूतरों को अन्य पक्षियों से अलग पहचान दिलाता है।
पोषण में कितना अमीर है यह दूध?
क्रॉप मिल्क की तुलना गाय के दूध से की जाए, तो इसमें प्रोटीन और वसा की मात्रा कहीं अधिक पाई जाती है। इसमें लगभग 13 प्रतिशत प्रोटीन और 9 प्रतिशत वसा होती है, साथ ही एंटीऑक्सिडेंट और इम्यूनिटी बढ़ाने वाले तत्व भी होते हैं। हालांकि, इसमें कैल्शियम स्तनधारियों के दूध की तुलना में कम होता है, क्योंकि यह हड्डियों से नहीं बल्कि कोशिकाओं से बनता है। बढ़ते चूजों के लिए यह शुरुआती दिनों का सबसे बेहतरीन भोजन माना जाता है।
सिर्फ कबूतर ही नहीं, ये पक्षी भी देते हैं दूध
यह सुनकर आपको हैरानी होगी कि क्रॉप मिल्क बनाने की खूबी सिर्फ कबूतरों में नहीं है। फ्लेमिंगो भी अपने पाचन तंत्र के ऊपरी हिस्से से इसी तरह का पोषक स्राव बनाते हैं, जो एक लाल रंग का दूध जैसा होता है। इसके अलावा एम्परर पेंगुइन के नर भी अपने पेट की नली से दूध जैसा पदार्थ बनाकर बच्चे को खिलाते हैं, खासकर तब जब मादा भोजन की तलाश में दूर रहती है।


























