Christmas Island: कल्पना कीजिए कि आप सुबह घर से निकले और रास्ते भर आपको सड़क पर केकड़े ही केकड़े दिखे। न सड़क दिखे, न कद्दू की तरह टिक-टिक करती गाड़ियां, बस दूर तक फैला लाल रंग। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि ऑस्ट्रेलिया के अधिकार क्षेत्र में आने वाले हिंद महासागर स्थित क्रिसमस आइलैंड (Christmas Island) की हर साल की हकीकत है। यहां इंसानों की तुलना में केकड़ों की आबादी लाखों गुना ज्यादा है और साल में एक बार ये छोटे-से जीव पूरे द्वीप पर अपना ‘राज’ कायम कर देते हैं।
कौन हैं ये लाल पर्यटक?
क्रिसमस आइलैंड पर पाए जाने वाले इन केकड़ों का वैज्ञानिक नाम Gecarcoidea natalis है और इन्हें दुनिया में क्रिसमस आइलैंड रेड क्रैब के नाम से जाना जाता है। खास बात यह है कि यह प्रजाति पृथ्वी पर मुश्किल से किसी और जगह पाई जाती है, यानी यह द्वीप की अपनी देन है। अनुमान लगाया जाता है कि इस छोटे-से द्वीप पर इन केकड़ों की संख्या करोड़ों में है, जबकि यहां रहने वाले इंसानों की गिनती मुश्किल से दो हजार है।
इन केकड़ों का आकार औसतन साढ़े चार से पांच इंच तक होता है और इनका चमकीला लाल रंग इन्हें जंगल की हरी पृष्ठभूमि में बेहद अलग पहचान देता है। जंगल की नमी, पत्तों की परत और समुद्र की निकटता इनके जीवन के लिए एकदम सही माहौल बनाती है।
बारिश की पहली बूंद से शुरू होता है महाप्रवास
हर साल आखिरी मौसमी बारिश के बाद, आमतौर पर अक्टूबर-नवंबर के बीच, जब मिट्टी नम होती है और हवा में नमी भरपूर होती है, तब इन केकड़ों का सबसे बड़ा सफर शुरू होता है। जंगल की गहराइयों से निकलकर ये केकड़े समुद्र की ओर कूच करने लगते हैं।
इस सफर का मकसद है प्रजनन। नर केकड़े सबसे पहले समुद्र तट पर पहुंचते हैं और वहां बिल बनाते हैं। इसके बाद मादा केकड़े वहां पहुंचती हैं और संभोग के बाद अंडे देती हैं। चंद्रमा की कलाओं से इस प्रक्रिया का समय तय होता है, क्योंकि ज्वार-भाटा अंडों को समुद्र तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाता है। एक मादा केकड़ा एक साथ लाखों अंडे समुद्र में छोड़ देती है, जिनसे पैदा हुए छोटे केकड़े कुछ हफ्तों बाद वापस तट पर लौटकर जंगल की ओर चल पड़ते हैं।
सड़कें बंद, ताकि लाखों जिंदगियां सुरक्षित रहें
इस प्रवास के दौरान द्वीप का दैनिक जीवन भी बदल जाता है। सड़कों पर केकड़ों के झुंड इतने घने होते हैं कि वाहनों के पहिए उन तक पहुंचने की सूरत में बड़ा नुकसान हो सकता है। इसीलिए द्वीप प्रशासन हर साल कई मुख्य सड़कों पर अस्थायी प्रतिबंध लगा देता है।
प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी दिखाते हुए यहां केकड़ों के लिए खास ढांचे भी बनाए गए हैं। कुछ सड़कों पर ऊंचे पुल और कुछ जगहों पर जमीन के नीचे गुजरने वाले खास टनल बनाए गए हैं, जिनका इस्तेमाल करके केकड़े सुरक्षित तरीके से सड़क पार कर लेते हैं। स्थानीय लोग और वॉलंटियर कई बार छड़ियों की मदद से केकड़ों को सड़क पार कराने में भी मदद करते हैं।
दुनिया भर के पर्यटकों के लिए दुर्लभ नजारा
करीब 135 वर्ग किलोमीटर में फैले इस द्वीप पर हर साल हजारों पर्यटक अपनी आंखों से यह अद्भुत दृश्य देखने पहुंचते हैं। जंगल की ओर से आती लाल केकड़ों की नदी, रेस्टोरेंट की दीवारों पर चढ़ते केकड़े और घरों के बरामदे में सैर करते छोटे-बड़े केकड़े — यह सब पर्यटकों के लिए किसी वन्यजीव डॉक्यूमेंट्री का जीता-जागता सीन जैसा लगता है।
पर्यटन विभाग हर साल माइग्रेशन के संभावित समय की जानकारी अपडेट करता रहता है, ताकि दुनिया भर से आने वाले फोटोग्राफर और नेचर लवर्स सही वक्त पर यह नजारा कैद कर सकें।
पारिस्थितिकी के लिए केकड़े क्यों हैं इतने जरूरी?
ये लाल केकड़े सिर्फ द्वीप की पहचान नहीं, बल्कि यहां की पारिस्थितिकी के रक्षक भी हैं। जंगल की सतह पर गिरे पत्ते, फल और अन्य जैविक सामग्री को खाकर ये पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण करते हैं। इनकी बिलें मिट्टी को हवादार बनाती हैं और वनस्पति की वृद्धि में मदद करती हैं। वैज्ञानिक इन्हें द्वीप का ‘कीस्टोन स्पीशीज’ यानी सबसे अहम कड़ी मानते हैं।
हालांकि, इनके सामने चुनौतियां भी हैं। बाहर से आई एक आक्रामक प्रजाति ‘येलो क्रेजी एंट’ के समूहों ने पहले कई सालों में करोड़ों केकड़ों की जान ली थी। इस पर नियंत्रण के लिए लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं और अच्छी बात यह है कि केकड़ों की आबादी अब दोबारा उबरने लगी है।
प्रकृति का अनोखा चक्र
जहां दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में एक केकड़ा सड़क पर दिख जाए तो लोगों के होश उड़ जाते हैं, वहीं क्रिसमस आइलैंड पर इंसान अपने रोजमर्रा के काम रोककर केकड़ों का रास्ता छोड़ देते हैं। यह कहानी सिर्फ करोड़ों लाल जीवों के समुद्र तक के सफर की नहीं है, बल्कि इंसान और प्रकृति के सह-अस्तित्व की भी है। यही वजह है कि इस छोटे-से द्वीप को आज दुनिया के सबसे अनोखे वन्यजीव गंतव्यों में गिना जाता है।

























