श्रद्धा तिवारी
Mumbai News: प्रिंस एल.एन. वेलिंगकर इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट डेवलपमेंट एंड रिसर्च (WeSchool), मुंबई में आज एक विशेष सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें दिग्गज मार्केटिंग विशेषज्ञ प्रो. वी. कुमार ने नई तकनीकों के दौर में शिक्षा, उद्योग और भविष्य की कार्यशक्ति के बीच तालमेल पर चर्चा की। इस कार्यक्रम में फैकल्टी, छात्रों और उद्योग जगत के बड़े प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
प्रो. कुमार ने अपने संबोधन की शुरुआत एक सकारात्मक नजरिए से करते हुए कहा, “शिक्षा और उद्योग के बीच बदलता तालमेल किसी समझौते नहीं, बल्कि नवाचार और विकास का एक बड़ा अवसर है।” उन्होंने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग, ब्लॉकचेन, IoT, रोबोटिक्स और मेटावर्स जैसी तकनीकें न सिर्फ काम करने के तरीके बल्कि ‘कौन काम करेगा’ को भी बदल रही हैं।
“इंसान से लेकर मशीन तक का सफर”
प्रो. कुमार ने कार्यप्रणाली में आए बदलावों को तीन चरणों में समझाया- “पहले इंसान अकेले काम करता था, फिर इंसान और मशीन साथ में काम करने लगे, और अब मशीनें खुद ही कई कार्य संभाल रही हैं।” उन्होंने चेतावनी दी कि जहां पारंपरिक नौकरियां खत्म हो रही हैं, वहीं नई भूमिकाओं के लिए छात्रों को तेजी से तैयार होना होगा।
क्या है ‘3Es फ्रेमवर्क’ और ‘UaaP’?
इस सत्र का सबसे आकर्षण प्रो. कुमार का ‘3Es फ्रेमवर्क’ रहा— Education (शिक्षा), Experience (अनुभव) और Engagement (जुड़ाव)। उन्होंने बताया कि अब AI आधारित पर्सनलाइज्ड शिक्षा और वर्चुअल रियलिटी (VR) के जरिए प्रैक्टिकल अनुभव देना जरूरी हो गया है।
साथ ही, उन्होंने ‘University as a Platform (UaaP)’ की अवधारणा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अब यूनिवर्सिटी सिर्फ एक भौतिक इमारत नहीं रह गई हैं, बल्कि वे डिजिटल प्लेटफॉर्म बन गई हैं, जहां से दुनिया में कहीं भी, कभी भी शिक्षा दी जा सकती है।
ग्लोबल ब्रांड्स से सीखें भविष्य का नक्शा
उन्होंने शिक्षा, मार्केटिंग, ब्रांडिंग, ऑपरेशन्स और रणनीति के पांच क्षेत्रों में हो रहे बदलावों को Nike, Zara, Amazon, BMW और JPMorgan जैसी वैश्विक कंपनियों के उदाहरणों से समझाया। उन्होंने बताया कि ये कंपनियां प्रेडिक्टिव एनालिसिस और ऑटोमेशन के जरिए ग्राहक अनुभव को कैसे बेहतर बना रही हैं।
‘स्किल गैप’ को दूर करने की अपील
सत्र के दौरान प्रो. कुमार ने वर्तमान सिस्टम की सबसे बड़ी कमजोरी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “आज शिक्षा प्रणाली, उद्योग और छात्र तीनों अलग-अलग दिशाओं में काम कर रहे हैं, जिससे स्किल गैप (कौशल की कमी) बढ़ रहा है।” उन्होंने तीनों पक्षों को संदेश दिया:
- शिक्षा संस्थान: पुराने पाठ्यक्रमों से बाहर निकलकर नए डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित करें।
- उद्योग जगत: छात्रों को तैयार करने में पीछे न रहें, सक्रिय भागीदार बनें।
- छात्र: स्वयं आगे बढ़कर सीखने की जिम्मेदारी उठाएं।
डिग्री-आधारित शिक्षा का दौर खत्म
प्रश्नोत्तर सत्र (Q&A) में जब शिक्षा नीतियों पर सवाल उठे, तो प्रो. कुमार ने स्पष्ट कहा कि अब डिग्री-आधारित शिक्षा से ऊपर उठकर ‘कौशल-आधारित शिक्षा’ (Skill-based education) पर ध्यान देने का समय आ गया है। भविष्य की नौकरियों के लिए ‘मेटा-स्किल्स’ जैसे अनुकूलन क्षमता (Adaptability), क्रिटिकल थिंकिंग और निरंतर सीखने की आदत सबसे ज्यादा जरूरी होगी।

























