अमेरिका में स्थायी रूप से बसने का सपना देखने वाले भारतीय पेशेवरों के लिए इमिग्रेशन से जुड़ी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। अमेरिकी वित्तीय वर्ष 30 सितंबर को समाप्त होने वाला है और इससे पहले रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड की कुछ श्रेणियों में उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ गई है।
खास तौर पर EB-1 कैटेगरी में भारतीय आवेदकों की भारी मांग के कारण उपलब्ध वीजा संख्या समाप्त होने की आशंका जताई जा रही है।

ऐसे समय में यह समझना जरूरी है कि अमेरिकी ग्रीन कार्ड आखिर होता क्या है, इसे हासिल करने में कितना खर्च आता है और किन देशों के नागरिकों को सबसे ज्यादा स्थायी निवास मिलता है।
क्या होता है अमेरिका का ग्रीन कार्ड?
अमेरिका का ग्रीन कार्ड आधिकारिक तौर पर परमानेंट रेजिडेंट कार्ड (Permanent Resident Card) कहलाता है। यह किसी विदेशी नागरिक को अमेरिका में स्थायी रूप से रहने और कानूनी तौर पर काम करने की अनुमति देता है। ग्रीन कार्ड धारक नौकरी करने, कारोबार शुरू करने और अमेरिका में लंबे समय तक रहने जैसी कई सुविधाओं का लाभ उठा सकता है।
हालांकि, ग्रीन कार्ड और अमेरिकी नागरिकता एक समान नहीं हैं। स्थायी निवासी को नागरिकों के सभी अधिकार हासिल नहीं होते। उदाहरण के लिए, संघीय चुनावों में मतदान का अधिकार अमेरिकी नागरिकों के लिए आरक्षित है।
ग्रीन कार्ड हासिल करने के कई रास्ते हैं। इनमें परिवार के आधार पर इमिग्रेशन, रोजगार, विशेष योग्यता, शरण या मानवीय आधार और निवेश जैसी श्रेणियां शामिल हैं।
ग्रीन कार्ड के लिए कितना पैसा खर्च होता है?
ग्रीन कार्ड की लागत इस बात पर निर्भर करती है कि आवेदन किस श्रेणी और किस प्रक्रिया के जरिए किया जा रहा है। रोजगार आधारित मामलों में नियोक्ता या आवेदक को संबंधित इमिग्रेशन फॉर्म की फीस के साथ अन्य सरकारी और प्रशासनिक खर्च भी उठाने पड़ सकते हैं।
उदाहरण के लिए, रोजगार आधारित इमिग्रेशन में Form I-140 दाखिल किया जाता है। इसके अलावा अगर आवेदक पहले से अमेरिका में रह रहा है और वहीं अपना स्टेटस बदल रहा है, तो उसे Form I-485 के लिए भी शुल्क देना होता है।
परिवार के जरिए ग्रीन कार्ड हासिल करने वालों के लिए Form I-130 महत्वपूर्ण होता है। इसकी फीस के अलावा मेडिकल जांच, दस्तावेज, बायोमेट्रिक्स और अन्य प्रक्रियाओं का खर्च भी जुड़ सकता है।
इसलिए केवल सरकारी आवेदन शुल्क देखकर कुल लागत का अंदाजा लगाना सही नहीं होगा। वकील की फीस, मेडिकल जांच और दस्तावेजी प्रक्रिया जोड़ने पर वास्तविक खर्च काफी बढ़ सकता है।
अमेरिका से बाहर रहने वालों के लिए अलग प्रक्रिया
अगर ग्रीन कार्ड का आवेदक अमेरिका के बाहर रहता है, तो आम तौर पर उसे consular processing से गुजरना पड़ता है। इसमें इमिग्रेशन प्रक्रिया पूरी होने के बाद अमेरिकी दूतावास या वाणिज्य दूतावास के स्तर पर जरूरी औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं।
इस दौरान आवेदन शुल्क, मेडिकल एग्जामिनेशन, दस्तावेजों की तैयारी और इमिग्रेंट वीजा से जुड़े अन्य खर्च सामने आते हैं। यानी विदेश से आवेदन करने वाले व्यक्ति का कुल खर्च सिर्फ एक सरकारी फीस तक सीमित नहीं रहता।
EB-5: निवेश के जरिए ग्रीन कार्ड
जिन विदेशी निवेशकों के पास पर्याप्त पूंजी है, उनके लिए अमेरिका का EB-5 Immigrant Investor Program एक अलग रास्ता उपलब्ध कराता है। इसमें पात्र निवेश के जरिए अमेरिकी अर्थव्यवस्था में पैसा लगाया जाता है और रोजगार सृजन की शर्त पूरी करनी होती है।
वर्तमान नियमों के तहत निवेश की न्यूनतम राशि निवेश के स्थान और परियोजना की पात्रता के आधार पर अलग हो सकती है। आम तौर पर लक्षित रोजगार क्षेत्र में कम न्यूनतम निवेश और अन्य क्षेत्रों में अधिक निवेश की व्यवस्था है। इसके साथ निर्धारित संख्या में पूर्णकालिक अमेरिकी नौकरियां पैदा करना भी जरूरी है।
इसलिए EB-5 को महज पैसा जमा करके ग्रीन कार्ड पाने की योजना समझना सही नहीं है। निवेश, रोजगार सृजन और अन्य कानूनी शर्तों को पूरा करना आवश्यक होता है।
गोल्ड कार्ड की चर्चा क्यों हो रही है?
अमेरिका में हाल के वर्षों में उच्च संपत्ति वाले विदेशी नागरिकों को आकर्षित करने वाली नई इमिग्रेशन योजनाओं को लेकर भी चर्चा हुई है। इनमें तथाकथित Gold Card जैसी अवधारणाएं शामिल हैं।
ऐसी योजनाओं को लेकर प्रस्ताव और राजनीतिक घोषणाएं सामने आती रही हैं, लेकिन इन्हें पारंपरिक ग्रीन कार्ड श्रेणियों के समान मानना उचित नहीं है। किसी भी नई योजना की वास्तविक स्थिति उसके लागू होने वाले नियमों और आधिकारिक सरकारी दिशा-निर्देशों पर निर्भर करेगी।
किस देश के लोगों को सबसे ज्यादा ग्रीन कार्ड मिलते हैं?
अमेरिका में ग्रीन कार्ड पाने वालों की तस्वीर श्रेणी के हिसाब से बदल जाती है। Family-based immigration में मेक्सिको लंबे समय से सबसे प्रमुख देशों में रहा है। इसका एक बड़ा कारण अमेरिका में मौजूद विशाल मैक्सिकन मूल की आबादी और मजबूत पारिवारिक नेटवर्क है।
वहीं रोजगार आधारित इमिग्रेशन में भारत और चीन जैसे देशों के नागरिक बड़ी संख्या में आवेदन करते हैं। खासकर भारतीय पेशेवरों की संख्या तकनीकी और उच्च-कौशल वाले क्षेत्रों में काफी अधिक है।
यहीं से भारतीय आवेदकों की सबसे बड़ी समस्या सामने आती है। अमेरिकी इमिग्रेशन व्यवस्था में प्रति देश सीमाएं होने के कारण किसी एक देश के आवेदकों को उपलब्ध रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड की संख्या सीमित रहती है। जब मांग बहुत ज्यादा होती है, तो आवेदन का बैकलॉग बढ़ जाता है।
भारतीयों को क्यों करना पड़ता है लंबा इंतजार?
भारत से रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करने वाले लोगों की संख्या उपलब्ध वीजा संख्या की तुलना में काफी अधिक है। यही असंतुलन लंबी वेटिंग लाइन की बड़ी वजह है।
EB-1 जैसी श्रेणी में भी भारतीय पेशेवरों के लिए उपलब्धता महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई है। वित्तीय वर्ष के अंत में यदि किसी श्रेणी की वीजा संख्या खत्म हो जाती है, तो नए मामलों की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है और आवेदकों को अगली उपलब्धता का इंतजार करना पड़ सकता है।
इसका मतलब यह है कि अमेरिका का ग्रीन कार्ड सिर्फ आवेदन शुल्क चुकाकर हासिल होने वाला दस्तावेज नहीं है। आवेदक की श्रेणी, देश, प्राथमिकता तिथि, वीजा उपलब्धता और पूरी इमिग्रेशन प्रक्रिया—इन सभी का परिणाम पर असर पड़ता है।
























