आम धारणा यह रहती है कि अमेरिका जैसे विकसित देश में डॉलर की ताकत के चलते जीवन आसान और सस्ता होता है। लेकिन जब वहां की जमीनी हकीकत सामने आती है, तो यह धारणा बुरी तरह टूट जाती है। दुनियाभर में बढ़ रही महंगाई के असर से अमेरिका भी अछूता नहीं है। ईंधन की कीमतें अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी हैं, जिसका सीधा असर रसद और रोजमर्रा की जरूरत की चीजों के दामों पर दिख रहा है। आइए समझते हैं कि वहां 100 डॉलर (लगभग 9,400 रुपये) में असल में क्या-क्या मिल पाता है और यह रकम कितने दिनों की जरूरतें पूरी कर पाती है।
100 डॉलर = सिर्फ 3 से 5 दिन की सब्जी
वैश्विक बाजार में एक अमेरिकी डॉलर करीब 94 रुपये के आसपास ट्रेड हो रहा है। इस हिसाब से 100 डॉलर लगभग 9,449 रुपये बनते हैं। भारत में इतनी राशि में एक छोटे परिवार का लगभग पूरा महीना राशन और सब्जी-फल का खर्च आराम से निकल सकता है।
लेकिन अमेरिकी सुपरमार्केट में प्रवेश करते ही तस्वीर बदल जाती है। वहां ताजी हरी सब्जियां और फल खरीदने पर यह रकम मुश्किल से 3 से 5 दिनों तक ही काम आती है। सबसे बड़ी वजह है पैकेजिंग और प्रोसेसिंग की भारी लागत। कटी हुई, धोई हुई और पैक सब्जियों पर अतिरिक्त शुल्क जुड़ जाता है।
प्रवासी भारतीयों के लिए तो स्थिति और चुनौतीपूर्ण है। भिंडी, करेला, लौकी या हरी मिर्च जैसी देसी सब्जियां खाने के शौकीन लोगों को इंडियन ग्रोसरी स्टोर्स पर बाजार दर से दोगुने से तीन गुने तक दाम चुकाने पड़ते हैं। अगर इसी 100 डॉलर में अनाज, दूध, अंडे और अन्य दैनिक सामग्री भी शामिल कर ली जाए, तो राशन अधिकतम 5 से 7 दिन ही टिक पाता है।
किराया ऐसा कि आंखें फटी की फटी रह जाएं
अमेरिका में आते ही सबसे बड़ा वित्तीय सदमा मकान किराये का मिलता है। किसी भी आम, मध्यम वर्गीय इलाके में साधारण घर का मासिक किराया 3,500 से 4,500 डॉलर चुकाना पड़ता है। रुपयों में बदलें तो यह सालाना 30 लाख से 39 लाख रुपये यानी हर महीने 3 से 3.9 लाख रुपये तक की रकम है। यही वजह है कि अच्छी खासी कमाई करने वाले प्रोफेशनल्स की सैलरी का बड़ा हिस्सा केवल सिर ढकने की जगह के नाम पर निकल जाता है।
किचन बजट: हर महीने जेब पर भारी बोझ
रहने की जगह के बाद रसोई का हिसाब देखकर भारतीय परिवारों के होश उड़ जाते हैं। अमेरिका में एक छोटे परिवार का मासिक ग्रोसरी बिल 800 से 1,200 डॉलर तक जाता है, जो भारतीय मुद्रा में लगभग 68,000 से डेढ़ लाख रुपये के बीच है।
घर में छोटे बच्चे हों तो खर्च और बढ़ जाता है। दूध, डायपर, स्नैक्स और बच्चों की दूसरी जरूरतों के लिए हर महीने अलग बजट बनाना पड़ता है। भारत की तुलना में यह खर्च कई गुना अधिक है, जहां इतनी राशि में बच्चों की छह महीने की जरूरतें पूरी हो सकती हैं।
बिना कार, जीवन बेहाल
भारत के उलट, अमेरिका के ज्यादातर शहरों में मजबूत सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था नहीं है। नतीजतन, कामकाजी हर व्यक्ति के लिए निजी कार रखना विलासिता नहीं, बल्कि मजबूरी बन जाती है। गाड़ी की कीमत के साथ-साथ मासिक ईएमआई, महंगा इंश्योरेंस, पेट्रोल-डीजल और नियमित मेंटेनेंस का खर्च हर महीने जुड़ता रहता है। सैन फ्रांसिस्को बे एरिया जैसे अत्यधिक महंगे इलाकों में तो वेतनभोगी पेशेवर भी हर खर्च को लेकर सोच-समझकर ही कदम बढ़ाते हैं।
बिजली-पानी के बिल और महंगे लेबर चार्ज
भारत में बिजली, पानी और कचरा प्रबंधन जैसी बुनियादी सुविधाओं का औसत मासिक खर्च करीब 3,600 रुपये आता है। इसके मुकाबले अमेरिका में इन्हीं सेवाओं के लिए हर महीने 14,000 से 15,000 रुपये तक देने पड़ते हैं, यानी चार गुना से अधिक।
इतना ही नहीं, वहां प्लंबर, मैकेनिक या कारपेंटर बुलाना भी महंगा पड़ता है। लेबर चार्ज इतने ऊंचे हैं कि लोग छोटे-मोटे काम खुद ही करना सीख जाते हैं। हां, एक राहत की बात जरूर है — इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट्स और ब्रांडेड कपड़ों के दाम अमेरिका में भारत जितने या उससे थोड़े कम मिल जाते हैं।
क्या अमेरिका में जीवन वाकई आसान है?
साफ है कि मुद्रा विनिमय दर के आंकड़े देखकर अमेरिका की क्रय शक्ति का अंदाजा लगाना भ्रामक है। 100 डॉलर की क्रय शक्ति वहां की वास्तविक लागत और जीवन शैली पर निर्भर करती है। जहां भारत में 9 हजार रुपये से ज्यादा राशि पूरे महीने का राशन खरीद सकती है, वहीं अमेरिका के महंगे बाजार में यही रकम कुछ ही दिनों की खरीदारी में सिमट जाती है।
बेशक वहां वेतन भी अधिक मिलते हैं, लेकिन उच्च आय के साथ खर्चों का पैमाना भी उतना ही बड़ा है। इसलिए अगली बार जब कोई डॉलर की चमक दिखाए, तो उसके पीछे छिपी इस जमीनी महंगाई की सच्चाई को भी समझ लें।


























