हाल के दिनों में विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रुपये की हालत में बदलाव देखने को मिला है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग दो महीने बाद अपने सबसे प्रबल स्तर पर पहुंच गया है। शुरुआती कारोबारी सत्र में दर्ज इस उछाल ने अंतर-बैंकिंग फॉरेक्स बाजार में जहां उत्साह का माहौल बनाया, वहीं दूसरी ओर एक पुराना सवाल फिर लोगों के जेहन में घर कर गया। दुनिया में दर्जनों मजबूत करेंसी मौजूद होने के बावजूद रुपये की ताकत या कमजोरी की परख डॉलर से ही क्यों की जाती है? आइए इस दिलचस्प सवाल के पीछे की वजहें आसान भाषा में समझते हैं।
रुपये का ताजा प्रदर्शन: दो महीनों का सबसे मजबूत स्तर
बीते कारोबारी दिन रुपया डॉलर के मुकाबले 94.27 के स्तर तक पहुंच गया, जो पिछले दो महीनों में सबसे बेहतर दर्जा माना जा रहा है। इससे पिछले सत्र में रुपया 94.98 के भाव पर समाप्त हुआ था। ब्लूमबर्ग के मुताबिक, एक ही कारोबारी दिन में रुपये को करीब 0.74 फीसदी की तेजी मिली, हालांकि दिन के आखिर तक यह बढ़त सिमटकर लगभग 0.5 फीसदी रह गई। वित्तीय विशेषज्ञों की नजर अब 94 रुपये के स्तर पर टिकी है, जिसे बाजार के लिए एक अहम लेवल माना जा रहा है।
डॉलर की सबसे बड़ी ताकत: वैश्विक रिजर्व करेंसी का दर्जा
रुपये की तुलना डॉलर से होने की सबसे बुनियादी वजह है अमेरिकी करेंसी का दुनिया की मुख्य रिजर्व मुद्रा बनना। द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे विशाल और सबसे भरोसेमंद आर्थिक ताकत के रूप में उभरी। उसी दौर में वैश्विक केंद्रीय बैंकों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं ने अपने फॉरेक्स भंडार में डॉलर को सर्वाधिक हिस्सेदारी देना शुरू किया। तब से आज तक देशों की आर्थिक क्षमता और उनकी करेंसी के मूल्य को तौलने का सर्वमान्य पैमाना डॉलर ही बना हुआ है। यह दर्जा रातोंरात नहीं मिला, बल्कि दशकों के इतिहास और भरोसे का नतीजा है।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा आयात में डॉलर की जरूरत
दुनिया भर में होने वाले व्यापार का एक बड़ा हिस्सा आज भी डॉलर के जरिए निपटाया जाता है। भारत के संदर्भ में देखें तो देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कच्चे तेल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद और भारी मशीनरी का विशाल आयात करना पड़ता है। इन सभी अहम खरीदों का भुगतान विदेशी विक्रेताओं को मुख्य रूप से डॉलर में करना होता है। जब तक वैश्विक स्तर पर डॉलर में भुगतान की प्रथा चलती रहेगी, तब तक हर देश को इस करेंसी की जरूरत पड़ती रहेगी और यही चीज डॉलर की स्वीकार्यता हमेशा बनाए रखती है।
मांग और आपूर्ति के नियम से तय होती है कीमत
किसी भी मुद्रा की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसकी मांग और आपूर्ति से तय होती है। चूंकि लगभग हर छोटे-बड़े देश को वैश्विक कारोबार में शामिल होने के लिए डॉलर चाहिए होता है, इसलिए विदेशी मुद्रा बाजार में अमेरिकी करेंसी की मांग साल के सभी 365 दिन बनी रहती है। जिस चीज की मांग लगातार बनी रहती है, उसकी क्रय शक्ति अपने आप अन्य क्षेत्रीय मुद्राओं के मुकाबले मजबूत और स्थिर दिखती है।
रुपये पर पड़ता है लगातार दबाव
आयात और निर्यात का अंतर भी रुपये-डॉलर के समीकरण को सीधे प्रभावित करता है। भारत जितना सामान विदेशों को बेचता है, उससे कहीं ज्यादा मूल्य का माल वह बाहर से खरीदता है। इस व्यापार घाटे के चलते भारतीय खजाने से हर साल भारी मात्रा में डॉलर बाहर जाता है। जब देश में डॉलर की आवक कम और निकासी ज्यादा होती है, तो घरेलू बाजार में अमेरिकी मुद्रा की मांग बढ़ जाती है और रुपया कमजोर पड़ने लगता है।
क्या रुपये की तुलना सिर्फ डॉलर से होती है?
यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया या वित्तीय संस्थाएं रुपये का मूल्यांकन केवल डॉलर के खिलाफ करती हैं। दरअसल, भारत ब्रिटिश पाउंड, यूरोपीय संघ के यूरो और जापानी येन जैसी प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले भी रुपये का दैनिक भाव तय करता है। लेकिन वैश्विक निवेशकों की नजर में अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सबसे सुरक्षित गंतव्य माना जाता है। जब भी कोई बड़ा वैश्विक संकट आता है, तब अंतरराष्ट्रीय निवेशक सुरक्षित ठिकाने के तौर पर डॉलर का रुख करते हैं। इसी व्यापक भरोसे के कारण भारत में डॉलर-रुपये की विनिमय दर को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है।
मजबूत रुपया आम आदमी के लिए क्यों अहम है?
डॉलर के मुकाबले रुपये का मजबूत होना आम उपभोक्ता के लिए भी अच्छा संकेत है। इससे आयातित चीजों जैसे तेल, गैजेट्स और सोने की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। विदेश में पढ़ाई कर रहे छात्रों और विदेश यात्रा करने वालों के लिए भी यह राहत की खबर होती है, क्योंकि उन्हें हर डॉलर के बदले कम रुपये देने पड़ते हैं। इसीलिए रुपये के हर उतार-चढ़ाव पर पूरा देश बारीकी से नजर रखता है।



























