दिल्ली में प्रदर्शनों के दौरान मेट्रो स्टेशनों को बंद करने के अभ्यास पर अब सुप्रीम कोर्ट ने दखल देना शुरू कर दिया है। गुरुवार (10 सितंबर) को शीर्ष अदालत ने जुलाई में छात्रों के विरोध-प्रदर्शन के बीच दिल्ली के 17 मेट्रो स्टेशनों को बंद किए जाने को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस और दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) को नोटिस जारी किया है। अदालत ने चारों पक्षों को अपनी टिप्पणियां दाखिल करने का समय दिया है।
मामले की शुरुआत कहां से हुई?
यह विवाद इस साल जुलाई में शुरू हुआ, जब कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में छात्र संगठनों ने जंतर-मंतर के पास प्रदर्शन का ऐलान किया था। सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए प्रशासन और DMRC ने मध्य दिल्ली के करीब 17 मेट्रो स्टेशन आम यात्रियों के लिए बंद कर दिए थे। इसका सीधा असर लाखों आम यात्रियों पर पड़ा। कई लोग स्टेशनों पर घंटों फंसे रहे, तो कई मजबूरन लंबे और महंगे रास्तों से अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए विवश हुए। ऑफिस जाने वाले कर्मचारियों, छात्रों और मरीजों तक को भारी परेशानी झेलनी पड़ी।
बेंच में कौन-कौन शामिल थे?
इस याचिका पर सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने की। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। अधिवक्ता स्पर्शकांत नायक की ओर से दायर याचिका में एक बड़ा संवैधानिक सवाल उठाया गया है कि क्या कार्यपालिका (Executive) किसी विशिष्ट कानूनी प्रावधान या लिखित आदेश के बिना सार्वजनिक परिवहन सेवा को निलंबित कर सकती है, भले ही उससे नागरिकों की आवाजाजी और सार्वजनिक सुविधाओं तक पहुंच सीमित हो जाती हो।
याचिकाकर्ता की दलील — कोई औपचारिक आदेश ही नहीं हुआ
अदालत में याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील ने एक चौंकाने वाली बात सामने रखी। उनके अनुसार, इतने बड़े फैसले के लिए न तो कोई कानूनी आधार था और न ही कोई औपचारिक शासकीय आदेश जारी किया गया। उन्होंने कहा कि स्टेशन बंद करने के लिए कोई विशेष कानून भी मौजूद नहीं है। यहां तक कि कोई औपचारिक आदेश पारित भी नहीं किया गया था। स्टेशनों के बंद होने की जानकारी जनता को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट के जरिए दी गई।
वकील ने आगे तर्क दिया कि यह मामला सीधे तौर पर आम नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है। जब भी कोई आदेश नागरिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाता है, तो उसे संवैधानिक मानकों की कसौटी पर खरा उतरना होगा — लेकिन यहां तो कोई आदेश है ही नहीं, जिसकी वैधता की जांच हो सके।

मेट्रो रेल अधिनियम में कोई प्रावधान नहीं
अपने तर्क को मजबूत करते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि मेट्रो रेल अधिनियम, 2002 के तहत ऐसा कोई क्लॉज नहीं है, जिसके बल पर किसी मेट्रो स्टेशन को बंद किया जा सके। इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने टिप्पणी की कि आमतौर पर यातायात नियंत्रण और वाहनों की आवाजाही को रोकने के निर्देश संबंधित पुलिस कानूनों के तहत पुलिस कमिश्नर या पुलिस अधीक्षक के स्तर से जारी किए जाते हैं।
“SOP की अवधारणा असल में एक भ्रम है”
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि SOP (मानक संचालन प्रक्रिया) की अवधारणा वास्तव में एक भ्रम (Myth) है। कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में अदालतें कार्यपालिका के निर्णय का सम्मान करती हैं और उसमें हस्तक्षेप नहीं करतीं। लेकिन जब यह अधिकार अति की स्थिति में या गलत तरीके से इस्तेमाल किया जाता है, तभी न्यायपालिका को दखल देना पड़ता है। हमें देखना होगा कि अधिकार का प्रयोग कैसे किया जा रहा है।”
यह टिप्पणी इसलिए अहम मानी जा रही है क्योंकि इसका संकेत है कि अदालत सुरक्षा की आड़ में आम नागरिकों की सुविधाओं के साथ किसी तरह के असंवैधानिक या असंगत व्यवहार को बर्दाश्त नहीं करेगी।
20 और 22 जुलाई को किन-किन स्टेशनों का शटर गिरा?
20 जुलाई को DMRC ने ‘एक्स’ पर अपडेट जारी कर जनपथ, राजीव चौक, पटेल चौक, सेंट्रल सेक्रेटेरिएट और सेवा तीर्थ स्टेशनों को “अगले आदेश तक” बंद करने की जानकारी दी थी। इसके बाद 22 जुलाई को इस सूची को और लंबा कर दिया गया। लोक कल्याण मार्ग, रामकृष्ण आश्रम मार्ग, बाराखंभा रोड, सुप्रीम कोर्ट, मंडी हाउस, ITO, दिल्ली गेट, इंद्रप्रस्थ, खान मार्केट, जोर बाग और शिवाजी स्टेडियम स्टेशन भी यात्रियों के लिए सील कर दिए गए। हर बार “सुरक्षा कारणों का हवाला” दिया गया, लेकिन किसी भी स्तर से कोई लिखित आदेश सार्वजनिक डोमेन में नहीं आया।
























