टाटा ग्रुप का सबसे बड़ा IPO, निवेशकों के लिए सुनहरा अवसर

आईपीओ की राह में कानूनी रुकावट अब दूर हो गई है, लेकिन कंपनी के भीतर एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। सूत्रों के हवाले से खबर है कि लिस्टिंग के मुद्दे पर टाटा संस के बड़े शेयरधारकों के बीच सहमति नहीं बन पा रही है।

टाटा संस IPO से बदल सकती है निवेशकों की कमाई की तस्वीर

HIGHLIGHTS

  • टाटा संस IPO तय! अब आम निवेशकों को मिलेगा बड़ा मौका
  • RBI के फैसले ने टाटा संस की बदली पूरी किस्मत आज
  • टाटा संस लिस्टिंग लगभग तय, शेयरधारकों में छिड़ी नई जंग
  • RBI ने ठुकराई अर्जी, अब टाटा संस IPO लगभग तय

देश के सबसे पुराने और सबसे बड़े बिजनेस ग्रुप्स में शुमार टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस जल्द ही शेयर बाजार में उतर सकती है। सब कुछ अनुकूल रहने पर इस साल इसे देश का सबसे बड़ा आईपीओ माना जा रहा है। दरअसल, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने टाटा संस की उस अर्जी को ठुकरा दी है, जिसके जरिए कंपनी प्रमुख निवेश कंपनी (सीआईसी) के तौर पर अपना एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन वापस लेना चाहती थी। इस फैसले के बाद टाटा संस के लिए स्टॉक मार्केट में सूचीबद्ध होना लगभग तय हो गया है।

कानूनी मामलों के जानकार एचपी रानीना और कॉरपोरेट गवर्नेंस के विशेषज्ञ श्रीराम सुब्रमणियन ने मीडिया से बातचीत में साफ कहा कि रेगुलेटर के इस फैसले के बाद टाटा संस के पास अब कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता। कंपनी को लिस्टिंग से जुड़े सभी नियमों का पालन करना ही होगा।

रिटेल निवेशकों के लिए क्यों है खास मौका?

अब तक आम निवेशक टाटा ग्रुप में सिर्फ इसलिए निवेश नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि होल्डिंग कंपनी टाटा संस शेयर बाजार में अनलिस्टेड है। निवेशकों के पास विकल्प सिर्फ टीसीएस, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील या टाटा केमिकल्स जैसी ग्रुप की लिस्टेड कंपनियों में पैसा लगाने का था। लेकिन टाटा संस का आईपीओ आने के बाद रिटेल निवेशक सीधे इस होल्डिंग कंपनी में हिस्सेदारी खरीद सकेंगे और शेयरों की खरीद-बिक्री भी कर पाएंगे। इससे टाटा समूह की पूरी कंपनियों में एक साथ एक्सपोजर पाने का रास्ता खुल जाएगा।

कब और क्यों बढ़ी टाटा संस की मुश्किलें?

पूरी कहानी सितंबर 2022 से शुरू होती है, जब आरबीआई ने टाटा संस को ‘अपर-लेयर’ एनबीएफसी कैटेगरी में डाल दिया था। नियमों के मुताबिक इस श्रेणी की कंपनियों के लिए तीन साल के भीतर शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य है। टाटा संस के लिए यह डेडलाइन 30 सितंबर 2025 तय की गई थी।

इस जिम्मेदारी से बचने के लिए टाटा संस ने 2024 में एक बड़ा कदम उठाया और 21,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज चुका दिया। इसके बाद कंपनी ने सीआईसी स्टेटस छोड़कर एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन वापस लेने की अर्जी लगाई, ताकि लिस्टिंग की अनिवार्यता खत्म हो जाए। लेकिन आरबीआई ने इस आवेदन पर फैसला टालता रहा और टाटा संस को लगातार अपर-लेयर एनबीएफसी की सूची में रखा।

जून 2026 में बदले गए आरबीआई के नियम

हालात पहले से ज्यादा मुश्किल तब हो गए जब जून 2026 में आरबीआई ने नियमों में बदलाव कर दिया। नई व्यवस्था के तहत अब 1 लाख करोड़ रुपये या उससे ज्यादा की एसेट्स वाली हर एनबीएफसी अपने आप अपर-लेयर कैटेगरी में शामिल हो जाती है। रिपोर्ट्स के अनुसार मार्च 2026 तक टाटा संस की कुल परिसंपत्तियां 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुकी हैं, यानी इस पैमाने पर कंपनी अपने आप ही ऊपरी परत में आ जाती है।

अगस्त में जारी अपर-लेयर सूची में कुल 17 संस्थाएं शामिल थीं और टाटा संस इनमें एकमात्र ऐसी कंपनी थी, जो निजी होने के साथ-साथ अनलिस्टेड भी थी। इस लिस्ट में आरईसी, पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन और इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉरपोरेशन जैसी सरकारी एनबीएफसी भी हैं, लेकिन सरकारी इकाइयों को लिस्टिंग से छूट प्राप्त है।

शेयर धारकों में फूटा विवाद

हालांकि आईपीओ की राह में कानूनी रुकावट अब दूर हो गई है, लेकिन कंपनी के भीतर एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। सूत्रों के हवाले से खबर है कि लिस्टिंग के मुद्दे पर टाटा संस के बड़े शेयरधारकों के बीच सहमति नहीं बन पा रही है।

नोएल टाटा की अगुवाई वाले टाटा ट्रस्ट्स की पकड़ कंपनी में 65 प्रतिशत से ज्यादा है और वह शुरू से ही सूचीबद्धता का विरोध करता आया है। इसके उलट, लगभग 18 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला शापूरजी पालोनजी समूह लिस्टिंग के पक्ष में रहा है, क्योंकि उसे अपनी स्टेक का असली मूल्य बाजार में लिस्टिंग के बाद ही हासिल होगा।

चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति न होने के पीछे भी यही वजह?

ये तमाम घटनाक्रम ऐसे वक्त पर सामने आए हैं, जब टाटा संस में नेतृत्व को लेकर भी खींचतान की खबरें जोर पकड़ रही हैं। कंपनी के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन का कार्यकाल अगले साल फरवरी में पूरा होने जा रहा है और उन्होंने दोबारा नियुक्ति न लेने का फैसला किया है।

चर्चा है कि लिस्टिंग का मुद्दा उन कारणों में शामिल था, जिनकी वजह से नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के खिलाफ वोट डाला। रतन टाटा के सौतेले भाई और टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा टाटा संस के बोर्ड में भी बैठते हैं। कथित है कि वह चंद्रशेखरन से यह पक्का आश्वासन चाहते थे कि टाटा संस को लिस्ट होने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। लेकिन चंद्रशेखरन का मानना था कि किसी रेगुलेटरी या कानूनी मामले का नतीजा पहले से तय नहीं किया जा सकता।

इसके अलावा नोएल टाटा ने समूह के कुछ बिजनेस में चल रहे घाटे का सवाल भी उठाया था। इनमें टाटा डिजिटल और एयर इंडिया जैसी कंपनियां शामिल हैं, जिन्हें चंद्रशेखरन के करीब दस साल के कार्यकाल के दौरान शुरू किया गया या अधिग्रहित किया गया था।

Sandhya Samay News

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