राजस्थान निकाय चुनाव: वोटिंग ने बढ़ाई धड़कन

राजस्थान निकाय चुनाव 2026 में 70.68% रिकॉर्ड मतदान! जयपुर में 20 साल का रिकॉर्ड टूटा, जोधपुर सबसे आगे। जानें बढ़े वोट का मतलब किसकी जीत और क्या बदलेगा सत्ता का गणित? रिजल्ट 14 सितंबर को।

राजस्थान निकाय चुनाव: आंकड़ों में छिपा जनादेश

HIGHLIGHTS

  • 70.68% मतदान, किसके साथ गया शहरी वोट?
  • राजस्थान में रिकॉर्ड वोटिंग, किसकी बनेगी सरकार?
  • शहरी राजस्थान ने खोला वोट का पिटारा
  • जयपुर जागा, भीलवाड़ा सुस्त—क्या है संकेत?

लोकतंत्र में जब शब्द अधूरे लगते हैं, तब मतदान का प्रतिशत अपनी भाषा में बोलता है। राजस्थान निकाय चुनाव 2026 के दोनों चरण पूरे होने के बाद यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि प्रदेश के शहरी मतदाताओं ने इस बार अपनी उपस्थिति से एक ऐसा संदेश दिया है, जिसे सुलझाने की कोशिश भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दिन-रात लगाए हुए हैं।

147 नगरीय निकायों वाले दूसरे चरण में 70.68 प्रतिशत मतदान दर्ज होना कोई साधारण आंकड़ा नहीं, बल्कि उन शहरों की नब्ज़ का पैमाना है, जहां अब तक चुनावों में उदासीनता को लेकर बहसें होती रही हैं। सवाल यह है कि यह बढ़ी हुई भागीदारी किसके खाते में जाएगी—सत्ताधारी दल के या बदलाव की चाह रखने वालों के? या फिर यह पूरी तरह वार्ड स्तर की एक अलग कहानी है, जिसका राज्य की राजनीति से कोई लेना-देना नहीं?

दो चरण, दो तस्वीरें—एक ही सवाल

पहले चरण में 162 निकायों में 76.41 प्रतिशत मतदान का आंकड़ा खुद अपने आप में उल्लेखनीय था। दूसरे चरण में शाम छह बजे तक दर्ज 70.01 प्रतिशत की संख्या अंतिम अपडेट में 70.68 प्रतिशत तक पहुंच गई। इन दोनों आंकड़ों को साथ रखकर देखें तो प्रदेश के सभी 309 नगरीय निकायों में मतदान का औसत स्तर उन शहरी चुनावों से कहीं ऊपर है, जहां अक्सर मेट्रो संस्कृति के शहरों में मतदाता वेटिंग रूम से बाहर रहना पसंद करता है। राजस्थान जैसे प्रदेश में, जहां विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत हमेशा ही देश का बेहतरीन रहा है, निकाय चुनावों में इस जोश का उतरना या चढ़ना राजनीतिक विश्लेषकों के लिए एक संदेशवाहक संकेत बन जाता है।

हमारा मानना है कि इस बार का मतदान आंकड़ा दो अलग-अलग राजनीतिक कथाओं को जन्म दे रहा है। पहली कथा यह कि शहरी मतदाता इस बार अपने स्थानीय मुद्दों—पानी, सड़क, सफाई, सीवरेज और अतिक्रमण—को लेकर घर से निकला है। दूसरी कथा यह कि प्रदेश की बड़ी राजनीति में बदलाव की मौन इच्छा इस बढ़ती भागीदारी में झलक रही है। दोनों कथाओं में कितनी सच्चाई है, इसका उत्तर 14 सितंबर को मतगणना के बाद ही स्पष्ट होगा, लेकिन तब तक उपलब्ध संकेतों की तह तक जाना ज़रूरी है।

जयपुर: सुस्त राजधानी का यह जागना आखिर कहां ले जाएगा?

जयपुर का आंकड़ा इस पूरे चुनावी दौर का सबसे चर्चित अध्याय है। 63.55 प्रतिशत का मतदान खुद में कई दशकों का रिकॉर्ड तोड़ता है। इतिहास को गौर से देखें—2004 में राजधानी में केवल 41.30 प्रतिशत मतदाता केंद्रों तक पहुंचे। 2009 में यह आंकड़ा 51.80 प्रतिशत हुआ। 2014 में 60 प्रतिशत का स्तर छूा और 2020 में 57.82 प्रतिशत पर आकर रुक गया। इस बार 2020 की तुलना में करीब 5.73 प्रतिशत अंकों की छलांग दर्ज हुई है, और 2014 के सर्वश्रेष्ठ आंकड़े से भी 3.55 प्रतिशत अंक आगे निकल गई।

यह बढ़ोतरी आकस्मिक नहीं मानी जा सकती। राजधानी के मतदाता बहुत पहले से इस आलोचना का शिकार रहे हैं कि वे नगर निगम चुनावों में तटस्थ या उदासीन रहते हैं। वार्ड स्तर पर पार्षदों का काम, हेरिटेज और ग्रेटर की अलग-अलग परेशानियां, यातायात की जकड़न, कचरा प्रबंधन और नगर निगमों की आर्थिक स्थिति जैसे मुद्दों ने इस बार जनता को प्रेरित किया हो, ऐसा मानना तर्कसंगत है। साथ ही यह भी असंभव नहीं कि दोनों बड़े दलों के कर्मियों ने बूथ स्तर पर अभूतपूर्व मेहनत की हो और अपने-अपने समर्थकों को घर-घर से खींचकर मतदान केंद्रों तक लाए हों।

हालांकि यहीं पर एक बड़ी सावधानी की जरूरत भी है। बढ़ा हुआ मतदान किस वर्ग, किस वार्ड और किस दल के समर्थन में बढ़ा है, यह तय करना असंभव है जब तक वार्डवार नतीजे सामने न आ जाएं। कई बार देखा गया है कि किसी एक दल के कार्यकर्ताओं का असाधारण उत्साह ही पूरे शहर के औसत को ऊपर ले जाता है। इसलिए जयपुर की रिकॉर्ड वोटिंग को अभी से किसी एक दल की जीत का प्रमाण पत्र दे देना राजनीतिक आकलन में गंभीर भूल होगी।

भीलवाड़ा: उल्टी दिशा में चला आंकड़ा, पर संदेश क्या है?

जहां जयपुर के ग्राफ पर चढ़ाव दर्ज हुआ, वहीं भीलवाड़ा ने इसके ठीक विपरीत चित्र पेश किया। इस बार 63.71 प्रतिशत मतदान हुआ, जबकि 2021 में यह आंकड़ा 67.13 प्रतिशत था। यानी करीब 3.42 प्रतिशत अंकों की गिरावट। 2015 के 68.89 प्रतिशत से तुलना करें तो यह दूरी और भी अधिक चौड़ी दिखती है। 2005 में 68.62 प्रतिशत और 2010 में 63.71 प्रतिशत का इतिहास यह भी बताता है कि भीलवाड़ा का यह नया आंकड़ा दरअसल 2010 के स्तर पर ही लौट आया है।

इस गिरावट का मतलब क्या निकाला जाए, यह सबसे दिलचस्प बहस है। एक विचारधारा यह कहेगी कि मौजूदा व्यवस्था से नाराज़ मतदाता ने चुनाव से मुंह मोड़ लिया। दूसरी विचारधारा यह तर्क देगी कि जिस दल के समर्थकों का उत्साह कम था, उन्होंने मतदान किया ही नहीं, और ऐसे में नतीजे उसी दल के पक्ष में झुक सकते हैं जिसके वोट बैंक ने बेहतर भागीदारी दिखाई। दोनों ही स्थितियों में आत्मविश्वास का स्तर अलग-अलग होगा। सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं छिपी है—जो रविवार, 14 सितंबर को ही उजागर होगी।

छोटे कस्बों का बड़ा संदेश: 90 प्रतिशत के आंकड़े क्यों अहम हैं

बड़े शहरों की तुलना में छोटे निकायों का उत्साह इस बार किसी भी दृष्टि से अधिक प्रभावी रहा। चोमू नगरपालिका में 91.60 प्रतिशत, गोलूवाला में 90.03 प्रतिशत, अलवर जिले के बायोदेब में 89.79 प्रतिशत, कोटकासिम में 89.56 प्रतिशत और मुंडावर में 88.97 प्रतिशत मतदान हुआ। जब किसी कस्बे में दस में से नौ मतदाता मतदान करते हैं, तो वहां चुनाव केवल प्रत्याशियों की लोकप्रियता का नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक चिंताओं का जनसर्वेक्षण बन जाता है।

इन छोटे निकायों में मुद्दे भी बेहद ठोस होते हैं। यहां के मतदाता के सामने सवाल यह नहीं होता कि दिल्ली या जयपुर की सत्ता में कौन है, बल्कि यह होता है कि उसके मोहल्ले की नाली कब खुलेगी, सरकारी नल से पानी कब आएगा, और बाजार की सड़क कब मरम्मत होगी। ऐसे चुनावों में वार्ड के प्रत्याशी का व्यक्तिगत रिश्ता, उसकी पहुंच और उसकी साख बड़े दलों के प्रतीकों से अधिक भारी पड़ सकती है। साथ ही यह भी सच है कि जब जीत-हार का अंतर सैकड़ों या उससे भी कम मतों में हो, तो मतदान प्रतिशत में एक-दो प्रतिशत का उतार-चढ़ाव भी बोर्ड की तकदीर बदल सकता है।

क्या बढ़ा मतदान वास्तव में सत्ता विरोध का पर्याय है?

भारतीय राजनीतिक विश्लेषण की सबसे पुरानी और सबसे खतरनाक आदतों में एक है—बढ़े हुए मतदान को सीधे सत्ता परिवर्तन के संकेत के रूप में पढ़ लेना। यह धारणा आंशिक रूप से सही हो सकती है, पर इसे सार्वभौमिक नियम मान लेना गलत है। जयपुर का अपना इतिहास इसका सबसे सटीक प्रमाण है।

2004 में जब राजधानी में सबसे कम, यानी 41.30 प्रतिशत मतदान हुआ, तब भी भाजपा का बोर्ड बना। 2009 में मतदान बढ़कर 51.80 प्रतिशत पहुंचा और कांग्रेस सत्ता में आई। 2014 में 60 प्रतिशत का रिकॉर्ड मतदान हुआ और भाजपा ने बाजी मारी। 2020 में 57.82 प्रतिशत पर नतीजे बंट गए—ग्रेटर जयपुर में भाजपा और हेरिटेज में कांग्रेस। चार चुनाव, चार अलग-अलग नतीजे, और मतदान प्रतिशत के साथ कोई सीधा, भरोसेमंद पैटर्न नहीं।

यह इतिहास हमें एक जरूरी सबक देता है—मतदान प्रतिशत एक अस्पष्ट संकेत है, स्पष्ट निर्णय नहीं। यह बता सकता है कि मतदाता जागे हैं, मगर यह नहीं बता सकता कि वह किस दिशा में झुका है। इसीलिए दोनों दलों का आत्मविश्वास—भाजपा का यह दावा कि बढ़ा मतदान उसके पक्ष में है, और कांग्रेस की यह उम्मीद कि यह बदलाव की जमीन तैयार कर रहा है—दोनों ही अभी अनुमान के दायरे में हैं।

बड़े निगमों की स्थिति: दावों और आंकड़ों के बीच की दूरी

दूसरे चरण में जयपुर समेत छह नगर निगमों में मतदान हुआ। जोधपुर ने 71.95 प्रतिशत के साथ सबसे ऊंचा स्थान बरकरार रखा। उदयपुर 69.77 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रहा। कोटा ने 67.66 प्रतिशत दर्ज कराई। भीलवाड़ा 63.71, अजमेर 63.65 और जयपुर 63.55 प्रतिशत पर एक-दूसरे के निकट रहे। राजनीतिक गलियारों में चल रहे आकलन यह बताते हैं कि छह निगमों में भाजपा और तीन में कांग्रेस का बोर्ड बनने की संभावना देखी जा रही है, जबकि एक स्थान पर निर्दलीय मेयर का सुर भी सुनाई दे रहा है। पर इन सबको अभी केवल अनुमान ही कहा जाए।

यहां एक बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है—जोधपुर और जयपुर का अंतर। जोधपुर में लगभग 8.40 प्रतिशत अंकों से अधिक मतदान हुआ है। ऐतिहासिक रूप से जोधपुर और जयपुर दोनों में मतदाताओं का व्यवहार अलग-अलग रहा है। मारवाड़ का यह बड़ा शहर अक्सर अधिक भागीदारी देता रहा है, और उसकी राजनीतिक प्रवृत्ति भी कभी-कभी राजधानी से भिन्न रही है। इसीलिए पूरे प्रदेश की तस्वीर को एक ही शहर के आंकड़े से समझने की कोशिश विश्लेषण को अधूरा ही रखेगी।

निर्दलीय और बागी

इस चुनाव की सबसे कम चर्चित, पर नतीजों के लिहाज से सबसे असरदार ताकत निर्दलीय प्रत्याशियों और दोनों बड़े दलों के बागियों की हो सकती है। कई वार्डों में टिकट से वंचित कार्यकर्ता मैदान में उतरे हैं। ऐसी स्थिति में आधिकारिक प्रत्याशियों के वोट का बंटवारा लगभग तय माना जा सकता है। यदि किसी नगर निगम या नगर परिषद में भाजपा या कांग्रेस में से कोई भी दल बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच पाता, तो निर्दलीय पार्षद वहां राजा बनकर उभरेंगे। बोर्ड के गठन के समय उनकी बातचीत, उनकी मांगें और उनका झुकाव ही यह तय करेगा कि किसका मेयर बनेगा।

यह तथ्य निकाय चुनावों की एक और बारीकी की ओर इशारा करता है—यहां मतगणना के दिन तय नहीं होता कि सरकार कौन बनाएगा। विधानसभा चुनावों से इतर, निकायों में नतीजों के बाद की राजनीति कई बार नतीजों से अधिक रोचक और निर्णायक हो जाती है। दलों ने इसलिए पहले ही अपनी उत्तर-चुनावी रणनीतियां तैयार करनी शुरू कर दी हैं।

14 सितंबर: केवल परिणाम

अब सारे प्रत्याशियों की किस्मत ईवीएम की मशीनों में बंद है और प्रदेश की निगाहें 14 सितंबर पर टिकी हैं। उस दिन केवल यह नहीं पता चलेगा कि किस निकाय में कौन जीता, बल्कि यह भी जांचा जाएगा कि इस बार के रिकॉर्ड मतदान का असली अर्थ क्या था। क्या जयपुर के 63.55 प्रतिशत ने किसी दल की किस्मत पलट दी? क्या भीलवाड़ा की गिरती भागीदारी किसी के लिए संजीवनी सिद्ध हुई? क्या 90 प्रतिशत से ऊपर मतदान करने वाले छोटे कस्बों ने स्थानीय हिटलरों को हराया या पुराने चेहरों को और मजबूत किया?

हमारा आकलन है कि इस चुनाव का सबसे बड़ा संदेश जीत-हार से भी आगे का है। शहरी राजस्थान इस बार सोच-समझकर, चुनकर और जागरूक होकर मतदान के लिए निकला है। जिन दलों ने इस जागरूक मतदाता को स्थानीय मुद्दों पर जवाब दिया, उन्हीं को बोर्ड मिलने की संभावना अधिक है। और जो दल इसे केवल राज्य-स्तरीय लहर का विस्तार मानकर आगे बढ़ेंगे, उन्हें शायद यह सीखनी पड़े कि नगरीय निकायों की राजनीति में नाली, नल और कूड़ा ही असली चुनावी मुद्दे बनते हैं।

14 सितंबर को मतगणना की गिनती तय करेगी कि राजस्थान के शहरी मतदाताओं ने बदलाव की मुहर लगाई है या मौजूदा समीकरण को बरकरार रखा है। जब तक वह दिन नहीं आता, मतदान प्रतिशत के ये आंकड़े—जयपुर की छलांग, जोधपुर की ऊंचाई, भीलवाड़ा की गिरावट और छोटे कस्बों का जोश—राजनीतिक सलोनों की सबसे चर्चित बहस बने रहेंगे। और यही लोकतंत्र की खूबसूरती भी है कि जब तक गिनती पूरी नहीं होती, हर अनुमान का अपना वजन होता है, पर आखिरी फैसला हमेशा मतदाता का ही होता है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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