एक और धमाका, एक और मलबा, एक और जुमला

बिल्डर जमीन लेता है या पुरानी इमारत खरीदता है। दूसरा कदम — स्वीकृत नक्शे से कहीं ज्यादा फ्लोर उठा दिए जाते हैं, बेसमेंट को इतना गहरा खोद दिया जाता है कि नींव कमजोर हो जाए, या सस्ते माल की मोर्टार और कम गेज की सरिया लगा दी जाती है।

इमारतें गिरती रहीं, सरकार की आंखें बंद रहीं

HIGHLIGHTS

  • छह मौतें और एक सवाल: अवैध निर्माण कौन रोकेगा?
  • बिल्डर-बाबु की सांठगांठ का हिसाब कब होगा?
  • मलबा हट जाएगा, मानसिकता कब हटेगी?
  • FIR हो गई, लेकिन व्यवस्था कौन बदलेगा?

दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के पास सत्य निकेतन शाम ढलते ही रौनक से भर उठता है — छात्र, कॉफी की दुकानें, कोचिंग सेंटर, किताबों की दुकानें और हॉस्टलों की चहल-पहल। इसी व्यस्त इलाके में अचानक धमाके जैसी आवाज के साथ एक इमारत धराशायी हो गई। कुछ ही मिनटों में समोसे की खुशबू और दोस्तों की हंसी की जगह रेस्क्यू टीमों के जर्जर, डॉग स्क्वॉड के भौंकने की आवाज और परिजनों की चीख-पुकार ने ले ली। छह जिंदगियां खत्म हो गईं। अब तक मलबे से 13 लोगों को निकाला जा चुका है। NDRF की चार टीमें बारी-बारी से मलबा हटा रही हैं और अब भी आशंका जारी है कि नीचे कुछ लोग दबे हो सकते हैं। बेसमेंट का बड़ा हिस्सा अभी सर्च बाकी है।

दुख की बात यह नहीं कि दिल्ली में इमारत गिरी — दुख की बात यह है कि यह अंतिम बार नहीं होगी, जब तक उस सिस्टम की नींव नहीं बदली जाती, जो रिश्वत, सांठ-गांठ और लापरवाही के ऊपर खड़ी है।

रात भर चला रेस्क्यू, उम्मीदें दम तोड़ती रहीं

हादसे के बाद पूरी रात रेस्क्यू ऑपरेशन चलता रहा। NDRF की ट्रेंड स्निफर डॉग्स की मदद से मलबे में लगातार सर्च ऑपरेशन चलाया गया। डॉग स्क्वॉड का इस्तेमाल उन जगहों की पहचान के लिए किया गया, जहां बचे हुए या पीड़ित लोग फंसे हो सकते थे। घायलों को AIIMS ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया, जहां अस्पताल प्रशासन ने बताया कि 11 मरीजों में से 5 को मृत अवस्था में लाया गया, एक गंभीर मरीज की इलाज के दौरान मौत हो गई, तीन भर्ती हैं, एक के हाथ-पैर के अंग की सर्जरी हुई और एक मामूली चोट के बाद छुट्टी दे दी गई।

ये आंकड़े अखबारों में कुछ लाइनें बनते हैं, लेकिन हर आंकड़े के पीछे एक परिवार है, एक किराने की दुकान बंद है, एक घर की रोटी थम गई है। सरकारी भाषा में इसे “हादसा” कहा जाता है, लेकिन यह हादसा नहीं — हादसा वह होता है जिसका कोई जिम्मेदार नहीं होता। यहां जिम्मेदार तय हैं: अवैध निर्माण करने वाला बिल्डर, नक्शे पर मुहर लगाने वाले अधिकारी और वे सब, जिन्होंने बरसों तक इस पूरे “खेल” को देखते रहे।

सरकार की आंखें तब खुलती हैं

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने हादसे के बाद मौके का जायजा लिया, मैजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए और बिल्डिंग मालिक के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दिया। पुलिस ने गैर इरादतन हत्या और लापरवाही की धाराओं — BNS की धारा 125, 290 और 125A — के तहत मामला दर्ज कर लिया है।

यह सब बहुत अच्छा लगता है, लेकिन एक बड़ा सवाल खड़ा होता है: क्या यह तमाम “जागरूकता” तभी संभव नहीं हो सकती थी, जब इमारत अभी खड़ी थी?

सच यह है कि दिल्ली में हर मोहल्ले में ऐसी इमारतों के बारे में शिकायतें लंबे समय से मौजूद हैं। सोशल मीडिया पर छोटे-मोटे आर्टिकल, स्थानीय खबरें, मोहल्ले वालों की शिकायतें, RTI आवेदन — यह सब पहले से ही संकेत दे रहे थे। लेकिन न उन खबरों को कोई पढ़ता है, न उन शिकायतों पर कोई काम करता है। सरकारी तंत्र की सबसे बड़ी बीमारी यही है कि उसकी आंखें तभी खुलती हैं जब मलबे के नीचे जिंदगियां दब जाती हैं। छह मौतें होने के बाद अचानक जांच आयोग बन जाता है, FIR हो जाती है, तल्ख बयान आते हैं। सवाल यह है कि जिस तेजी से आज कार्रवाई हो रही है, क्या उसी तेजी से कल भी होगी, जब सुर्खियां थम जाएंगी?

मोर्चा अब एमसीडी के दरवाजे पर

हादसे के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के कार्यकर्ता सिविक सेंटर स्थित एमसीडी मुख्यालय के बाहर पहुंच गए। ‘सुरक्षित कैंपस हमारा अधिकार’ और ‘लापरवाही नहीं स्वीकार’ के नारों के साथ उन्होंने एमसीडी की लापरवाही और अवैध निर्माणों पर रोक न लगाने का आरोप लगाते हुए कमिश्नर, चेयरमैन और मेयर के इस्तीफे की मांग की।

यह प्रदर्शन महज राजनीतिक दबाव नहीं, बल्कि जन-आक्रोश का बैरोमीटर है। जब विद्यार्थी सड़क पर उतरते हैं, तो इसका मतलब है कि जनता का धैर्य खत्म हो चुका है। लेकिन इस्तीफे की मांग तक सीमित रहना काफी नहीं होगा। इस्तीफा देने वाला अफसर चला जाएगा, लेकिन वह तंत्र यहीं रहेगा, जिसने इस मलबे को जन्म दिया। असली सवाल इस्तीफों का नहीं, व्यवस्था का है।

बिल्डर राज की अर्थव्यवस्था

सत्य निकेतन हादसे ने एक बार फिर उस पूरी अवैध अर्थव्यवस्था को उजागर किया है, जो दिल्ली की गलियों में दशकों से खुलेआम चल रही है। इसका गणित सरल है:

पहला कदम — बिल्डर जमीन लेता है या पुरानी इमारत खरीदता है। दूसरा कदम — स्वीकृत नक्शे से कहीं ज्यादा फ्लोर उठा दिए जाते हैं, बेसमेंट को इतना गहरा खोद दिया जाता है कि नींव कमजोर हो जाए, या सस्ते माल की मोर्टार और कम गेज की सरिया लगा दी जाती है। तीसरा कदम — यही रिश्वत के वो नोट, जिनसे निरीक्षण रिपोर्ट “सब ठीक” निकल आती है। चौथा कदम — किरायदारों को फ्लैट, दुकानें या PG दे दिए जाते हैं और रोज कमाई शुरू।

इस पूरे चक्र में कानून, नियम, बायलॉ और भूकंपीय सुरक्षा मानक — सब कागजों पर रह जाते हैं। दिल्ली भूकंप की दृष्टि से सेंसिटिव जोन-IV में आती है, यानी यहां इमारतों की संरचनात्मक मजबूती सिर्फ कानूनी जरूरत नहीं, जिंदगी-मौत का सवाल है। लेकिन जिस तंत्र को इसका पूरा पता है, वही तंत्र गलियों-गलियों में बन रही “शक” वाली इमारतों के ऊपर से आंखें बंद कर लेता है। और आंखें तभी खुलती हैं, जब मलबा तैयार हो चुका होता है।

यह पहली बार नहीं: दिल्ली का दोहराया जाता दुख

यह भूलना अन्याय होगा कि दिल्ली ऐसे हादसों से भरी पड़ी है। लक्ष्मी नगर के लालिता पार्क में 2010 में इमारत गिरने से दर्जनों लोग मारे गए थे — उस वक्त भी वादे हुए थे, समितियां बनीं। आगे चलकर करोल बाग की होटल आग, अनाज मंडी की फैक्ट्री आग, मुंडका आग, गमरी हिंदू कॉलोनी का मलबा, आजाद मार्केट का ढहना — हर हादसे के बाद एक ही पैटर्न दोहराया गया: रोना, जांच, मुआवजे का ऐलान, और फिर भुला देना।

हर जांच रिपोर्ट में एक ही बात लिखी गई — अवैध निर्माण, कमजोर संरचना, नियमों की अनदेखी। लेकिन रिपोर्टें फाइलों में बंद होकर धूल खा रही हैं और अवैध निर्माण का कारोबार आगे बढ़ रहा है। इसीलिए सत्य निकेतन कोई “अकेला हादसा” नहीं, बल्कि एक बिगड़ती सिस्टम का नंबरवार अध्याय है।

फाइलें उलझाने की राजनीति

हादसे के बाद सबसे पहले राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो जाती है — एमसीडी यह कहेगी कि बिल्डिंग बायलॉ का प्रवर्तन उसका है, लेकिन संसाधन कम हैं; दिल्ली सरकार कहेगी कि निगम जिम्मेदार है; विपक्ष कहेगा कि सत्ताधारी पार्टी की लापरवाही है। जनता इस गेम को अब पहचान गई है।

असल में जिम्मेदारी की जंजीर बहुत लंबी है — जूनियर इंजीनियर से लेकर जोनल अधिकारी, बिल्डिंग डिपार्टमेंट, टाउन प्लानिंग, और राजनीतिक स्तर तक। अवैध निर्माण रातोंरात नहीं खड़ा होता; महीनों लगते हैं, और उतने ही महीने तक तंत्र को “नहीं पता” चलता। यह “नहीं पता चलना” ही सबसे बड़ा अपराध है। अगर जांच सिर्फ बिल्डर तक सीमित रही, तो वह जांच अधूरी होगी। उन अधिकारियों की भी पड़ताल होनी चाहिए, जिन्होंने इमारत को स्वीकृति दी, निरीक्षण किया या शिकायतों पर कार्रवाई नहीं की।

Sandhya Samay News

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