आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में सेहत से जुड़ी कई नई समस्याएं सामने आ रही हैं, जिनमें से एक चौंकाने वाली समस्या है — बिना शराब पिए भी लिवर में फैट जमा होना। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि फैटी लिवर सिर्फ उन्हीं लोगों को होता है जो रोज शराब का सेवन करते हैं। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक, भारत में ऐसे हजारों युवा मिल रहे हैं जिन्होंने जिंदगी में कभी शराब नहीं छुई, फिर भी उनकी रिपोर्ट में फैटी लिवर सामने आ रहा है। आइए जानते हैं इसके पीछे की वजहें और इस बीमारी से बचने के उपाय।
लिवर शरीर का सबसे मेहनती अंग है
लिवर हमारे शरीर का एक ऐसा अंग है जो एक साथ कई अहम काम करता है। यह जरूरी हार्मोन का निर्माण करता है, पाचन में सहायता देता है, शरीर से जहरीले तत्वों को बाहर निकालता है और खून में ग्लूकोज़ के स्तर को संतुलित रखता है। जब इतने काम करने वाले अंग में ही फैट जमने लगे, तो समझना चाहिए कि सेहत के लिए यह गंभीर संकेत है। अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यह समस्या लिवर को स्थायी नुकसान तक पहुंचा सकती है।
नाम बदला, समझ बदली
मायो क्लिनिक के अनुसार, अब तक मेडिकल जगत में फैटी लिवर को मोटापे, डायबिटीज या अधिक शराब के सेवन से जोड़कर देखा जाता था। इसे ‘नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज’ यानी NAFLD कहा जाता था। लेकिन शोध के बाद मान्यता बदल गई है। अब इस स्थिति का नया नाम ‘मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज’ (MASLD) रखा गया है।
यह नया नाम एक अहम बात की तरफ इशारा करता है — यह बीमारी शराब या सिर्फ मोटापे की नहीं, बल्कि पूरे शरीर के मेटाबोलिज्म यानी चयापचय की गड़बड़ी से जुड़ी है। यानी शरीर की ऊर्जा प्रोसेसिंग सिस्टम ही गलत काम करने लगता है।
भारतीयों को ज्यादा खतरा क्यों?
छिपा हुआ विसरल फैट सबसे बड़ी वजह
डॉक्टरों का कहना है कि भारतीयों के शरीर में विसरल फैट — यानी भीतरी अंगों के चारों ओर जमने वाली चर्बी — बहुत जल्दी बढ़ती है। यहां सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि कई लोग बाहर से पतले-दुबले दिखते हैं, लेकिन उनके पेट के अंदरूनी हिस्से में चर्बी का अच्छा-खासा भंडार जमा हो चुका होता है। यह “थिन आउटसाइड, फैट इनसाइड” वाला पैटर्न भारतीयों में काफी आम है और बिना किसी लक्षण के लिवर को चुपचाप नुकसान पहुंचाता रहता है।
रातोंरात बदला खान-पान
आज की डाइट में मैदा, सफेद चावल, मीठे पेय, तली-भुनी चीजें और पैक्ड स्नैक्स की हिस्सेदारी काफी बढ़ गई है। ऐसी चीजें खाने से ब्लड शुगर और इंसुलिन का लेवल झट से ऊपर चला जाता है। जब शरीर इतनी ज्यादा ऊर्जा का इस्तेमाल नहीं कर पाता, तो लिवर उसे फैट के रूप में जमा करने लगता है। यही चक्र साल-दर-साल दोहराने से लिवर फैटी होता चला जाता है।
बैठक जिंदगी और खराब नींद
डाइट के अलावा रोजमर्रा की आदतें भी मामले को बिगाड़ रही हैं। लंबे ऑफिस आवर्स, घंटों एक ही जगह बैठे रहना, नींद पूरी न होना और एक्सर्साइज का न होना — ये सब मिलकर मेटाबोलिक सेहत को धीरे-धीरे खराब करते हैं।
MASLD के लक्षण — जागरूक रहना जरूरी
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के मुताबिक, इस बीमारी का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि शुरुआत में अक्सर कोई लक्षण नजर नहीं आता। फिर भी कुछ संकेत हैं जिन पर गौर करना चाहिए:
- बिना कारण लगातार थकान महसूस होना
- शरीर अस्वस्थ लगना
- पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में दर्द या भारीपन
गंभीर स्थिति (MASH और सिरोसिस) के लक्षण:
- त्वचा में खुजली
- पेट में पानी भरना (एसाइटिस)
- सांस लेने में तकलीफ
- पैरों में सूजन
- त्वचा के नीचे मकड़जाल जैसी नसें दिखना
- तिल्ली का बढ़ना
- हथेलियों के रंग में बदलाव
- आंखें और त्वचा पीली पड़ना (पीलिया)
किन लोगों में खतरा ज्यादा है?
MASLD का रिस्क इन स्थितियों में काफी बढ़ जाता है:
- मोटापा, खासकर कमर के आसपास फैट जमा होना
- टाइप 2 डायबिटीज
- हाई कोलेस्ट्रॉल और बढ़े हुए ट्राइग्लिसराइड्स
- इंसुलिन रेजिस्टेंस और मेटाबोलिक सिंड्रोम
- पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS)
- ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया
- हाइपोथायरायडिज्म (सुस्त थायरॉइड)
- हाइपोपिट्यूटारिज्म या ग्रोथ हार्मोन की कमी
अच्छी खबर यह है कि शुरुआती चरण में फैटी लिवर पूरी तरह उलटा जा सकता है। इसके लिए जरूरी है — रिफाइंड और मीठी चीजों को सीमित करना, खाने में सब्जियों, दालों और साबुत अनाज को जगह देना, हफ्ते में कम से कम 150 मिनट व्यायाम या तेज चाल में चलना, रोज रात 7-8 घंटे की नींद लेना और वजन को नियंत्रित रखना। साथ ही 30-40 वर्ष की उम्र के बाद समय-समय पर लिवर फंक्शन टेस्ट और अल्ट्रासाउंड कराते रहना चाहिए।

























