किसी भी प्रजातंत्र की असली परीक्षा यह नहीं होती कि वहां की सरकार कितनी बड़ी बहुमत से सत्ता में आई है, बल्कि यह परीक्षा इस बात से होती है कि सत्ता के विरोध में खड़े होने वाले उस देश के नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। भारत का वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक माहौल एक ऐसे ही कठिन और भयावह इम्तिहान से गुजर रहा है, जहां असहमति को अपराध का दर्जा दे दिया गया है।
वर्तमान परिदृश्य में सत्ता के फैसलों पर सवाल उठाना या उसकी आलोचना करना एक प्रकार से राजद्रोह के तुल्य अपराध मान लिया गया है। जो लोग सरकार की नीतियों का विरोध करते हैं, उन्हें या तो सीमाओं से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है या फिर जेल की ठंडी दीवारों के पीछे बंद कर दिया जाता है। जो कुछ लोग इस दमनचक्र से बचकर बाहर हैं, वे भी आत्मघाती सन्नाटे में जी रहे हैं, क्योंकि उन्हें अपनी बात रखने की इजाजत ही नहीं है। यह स्थिति किसी अघोषित आपातकाल से कम नहीं है, जहां जनता को सत्ता का विनम्र अनुयायी बनकर रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

लोकतांत्रिक संस्थाएं सत्ता
ऐसे में, जब लोकतांत्रिक संस्थाएं सत्ता के दबाव में कंधे झुका रही हैं, तब मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति माधव जामदार की एक टिप्पणी इस घोर अंधकार में किरण के समान आई है। दरअसल, महाराष्ट्र के चेंबूर क्षेत्र में पुलिस प्रशासन ने सरकार की नीतियों के विरोध में नारेबाजी करने वाले एक नागरिक, सईद अहमद अब्दुल वाजिद चौधरी के खिलाफ एक कर्कश और अनुपातहीन कार्रवाई की थी। पुलिस ने उस नागरिक को स्थानीय सीमाओं से बाहर जाने पर मजबूर कर दिया, जो कि न्यायशास्त्र के सिद्धांतों के खिलाफ है। जब यह मामला न्यायमूर्ति जामदार की अदालत में पहुंचा, तो उन्होंने सरकार की इस सनकी और दमनकारी मानसिकता को आईना दिखाते हुए एक ऐसा सवाल पूछा, जिसने पूरे शासन तंत्र को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने सीधे पूछा—’क्या जनता सरकार की गुलाम है?’
यह सवाल बेहद सरल लग सकता है, लेकिन इसके पीछे लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों की गूंज है। इतिहास की याद करें तो ब्रिटिश शासन के दौरान लोकमान्य तिलक ने जब ‘क्या सरकार का दिमाग ठिकाने है?’ जैसा करारा प्रश्न पूछा था, तो उसने पूरी औपनिवेशिक सत्ता की नींद उड़ा दी थी। आज न्यायमूर्ति जामदार का यह सवाल भी उसी तरह की राजनीतिक और प्रशासनिक भूचाल पैदा करने वाला है। लोकतंत्र में सरकार जनता की सेवक होती है, उसकी मालिक नहीं। लेकिन वर्तमान में यह समीकरण उलट जाने का गहरा दुखद है।
न्यायमूर्ति जामदार ने अपनी टिप्पणी में किया स्पष्ट
न्यायमूर्ति जामदार ने अपनी टिप्पणी में स्पष्ट किया कि किसी भी राजनीतिक दल या व्यक्ति के विरोध में ‘मुर्दाबाद’ के नारे लगाना किसी नागरिक को उसके मूल निवास से निकालने का आधार नहीं बन सकता। सरकार की नीतियों से असहमति जताना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। यदि यह अधिकार छीन लिया जाए, तो संविधान की प्रस्तावना में वर्णित ‘गणतंत्र’ शब्द का कोई अर्थ नहीं रह जाता। आज देश में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली दिन प्रतिदिन सामने आ रही है। प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। लाखों युवाओं के सपनों को सरकारी तंत्र की लापरवाही और भ्रष्टाचार चकनाचूर कर रही है। जब ये ठगे हुए युवा सड़कों पर उतरकर इस व्यवस्था के खिलाफ आवाज बुलंद करते हैं, तो सरकार उनकी समस्या का समाधान न करके उन पर ही मुकदमे का बोझ थोप देती है। यह कहां का इंसाफ है?

न्यायमूर्ति जामदार ने महज इस एक मामले पर ही अपनी नाराजगी व्यक्त नहीं की, बल्कि उन्होंने पूरी व्यवस्था और विपक्षी दलों की भी खूब खिंचाई की। उन्होंने एक बेहद दुखद तथ्य को उजागर किया कि जिस राज्य में एक 10 साल के मासूम बच्चे की सड़क हादसे में जान चली जाती है, उस विधानसभा में उस घटना पर चर्चा नहीं होती। बल्कि वहां चर्चा इस बात पर होती है कि उप-सभापति का चुनाव कैसे हुआ और एक नेता ने कैसे एक पार्टी से दूसरी पार्टी में छलांग लगाकर रातोंरात अपने आप को पवित्र घोषित कर दिया।
यहां न्यायमूर्ति जामदार ने वर्तमान राजनीतिक दलबदल की जिस ‘वॉशिंग मशीन संस्कृति’ पर तंज कसा, वह वास्तविकता का आईना है। उन्होंने याचिकाकर्ता से व्यंग्यपूर्ण लहजे में कहा कि यदि आपके ऊपर लगे मुकदमों से छुटकारा पाना है, तो आपको भी दल-बदल कर लेना चाहिए। सत्ता के गलियारों में एक ऐसी धुलाई की मशीन मौजूद है, जो सारे पाप और मुकदमे धोकर साफ कर देती है। यह टिप्पणी सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि आज के भारत में चल रहे उस खेल को दर्शाती है जहां सत्ता पक्ष में शामिल होने के लिए नैतिकता की कोई कीमत नहीं है।
न्यायमूर्ति जामदार ने जो बेबाकी और साहस दिखाया है, वह सराहनीय है, लेकिन इसके बावजूद एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि शासन तंत्र के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। सत्ता को लगता है कि चुनावी बहुमत (जो कई बार ईएवीएम और चुनावी व्यवस्था की खामियों के कारण सवालों के घेरे में रहा है) हासिल करने के बाद उसे मनमानी का खुला लाइसेंस मिल गया है। इस बहुमत की चोरी पर भी विपक्ष को चुप रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
आज देशभर में एक गहरा भय और दहशत का माहौल कायम है। लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, भगत सिंह और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने यह सपना देखा था कि आजाद भारत में कोई भी नागरिक निर्भय होकर अपनी बात रख सकेगा। आजादी का असल मतलब सिर्फ विदेशी शासन का अंत नहीं था, बल्कि आजादी का असल मतलब भयमुक्ति था। लेकिन स्वतंत्रता के सात दशकों से अधिक समय बाद यदि एक आम नागरिक ईमानदारी से अपनी राय रखने में सत्ता के डर से कांपता है, तो हमें यह मान लेना होगा कि हमने तरक्की की बजाय नैतिक और लोकतांत्रिक अवनति की है।
जबरदस्ती उसकी आवाज दबाई जा रही है
अगर कोई व्यक्ति सत्ता की चाटुकारिता कर रहा है, तो वह उसकी लाचारी हो सकती है, लेकिन अगर कोई डर के मारे खामोश है और जबरदस्ती उसकी आवाज दबाई जा रही है, तो यह लोकतंत्र की हत्या है। जबरदस्ती और डर के साए में ली गई सरकार या प्रशासन की तारीफ का कोई मूल्य नहीं होता। आज देश की जनता की दुर्दशा यह है कि उसे इंसाफ की आखिरी उम्मीद—न्यायपालिका—से भी धक्का लग रहा है। सरकारें नागरिकों की सुनना बंद कर चुकी हैं, पुलिस प्रशासन सत्ता के इशारों पर नाचता है, विधानसभाओं और संसद में जनता के मुद्दे दफन हो रहे हैं और अदालतों का रुख भी कई बार राजनीतिक दबाव के कारण नरम पड़ता दिखता है। ऐसे में नागरिक को सिर्फ अपमान, उत्पीड़न और निर्वासन की ठोकरें खाने को मिल रही हैं। लद्दाख में सोनम वांगचुक जैसे आंदोलनकारी दिनों से अनशन पर बैठे हैं, लेकिन सत्ता को कोई फर्क नहीं पड़ता। संसद और विधानमंडलों में विधायकों और सांसदों की सार्वजनिक नीलामी हो रही है, लेकिन उस भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने पर ही नागरिक को देशद्रोही घोषित कर दिया जाता है।
ऐसे करुण और निराशाजनक दौर में न्यायमूर्ति माधव जामदार का वह बयान एक ऐसी आवाज़ है जिसने जनता के मन में कुछ उम्मीद जगाई है। उन्होंने संविधान की रक्षा की है। उनका यह स्टैंड साबित करता है कि अभी भी न्यायपालिका के भीतर ऐसे साहसी लोग मौजूद हैं जो सत्ता के दबाव के आगे नहीं झुकते। एक जालिम और असंवेदनशील व्यवस्था के खिलाफ मुट्ठियां भिंचना और आवाज बुलंद करना प्रत्येक भारतीय का जन्मसिद्ध अधिकार है। न्यायमूर्ति जामदार ने जनता को याद दिलाया है कि वे गुलाम नहीं हैं और उन्हें ‘निर्भय’ होकर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए खड़ा होना होगा। इसलिए, इस डरे हुए दौर में न्याय के इस पुजारी का आभार मानना हर लोकतांत्रिक नागरिक का कर्तव्य बन जाता है।






















