Bihar News: बिहार की बांकीपुर सीट से विधायक प्रशांत किशोर ने दरभंगा जिले के महिनाम गांव में ब्राह्मण समाज के एक कार्यक्रम को संबोधित किया। अपने भाषण में उन्होंने शिक्षा और संस्कार की परंपरा को फिर से अपनाने की अपील की। साथ ही उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर मुसलमानों के खिलाफ अपशब्द लिखने से ब्राह्मण समाज को राजनीतिक या सामाजिक लाभ नहीं मिलेगा। उनके मुताबिक, इससे उन मतदाताओं से दूरी बढ़ सकती है जो कभी ब्राह्मणों को अपना मार्गदर्शक मानते थे।
शिक्षा और संस्कार को बताया समाज की पुरानी ताकत
प्रशांत किशोर ने कहा कि ब्राह्मण समाज की पहचान केवल राजनीतिक शक्ति से नहीं बनी थी। उन्होंने अपने भाषण में सवाल उठाया कि जिस समाज के पास जनबल, धनबल और बाहुबल कम था, उसे समाज में सम्मान क्यों मिला। उनके अनुसार, इसकी एक वजह पूर्वजों की शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता थी। वे कम संसाधनों में भी बच्चों को पढ़ाने को प्राथमिकता देते थे।
उन्होंने दूसरी वजह संस्कार को बताया। किशोर के मुताबिक, अपनी जरूरतों के साथ-साथ दूसरों की चिंता करना भी इसी परंपरा का हिस्सा था। उन्होंने कहा कि आज समाज का एक वर्ग इस विरासत से दूर होकर इस सवाल में उलझ गया है कि उसे क्या मिलेगा। उनके भाषण का केंद्रीय संदेश था कि पुरानी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी पर फिर ध्यान देना होगा।
मुस्लिम मतदाताओं से दूरी पर उठाए सवाल
अपने संबोधन में प्रशांत किशोर ने मुस्लिम मतदाताओं के साथ व्यवहार और राजनीतिक जुड़ाव का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने दावा किया कि पहले करीब 20 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता ब्राह्मणों को वोट देते थे, लेकिन बाद में यह समर्थन कम हुआ। उन्होंने इसकी वजह भाजपा का झंडा उठाने और मुसलमानों के प्रति दुर्भावनापूर्ण भाषा को बताया। यह आंकड़ा और उसका राजनीतिक संदर्भ उनके भाषण में किया गया दावा है।
किशोर ने पूछा कि ब्राह्मणों और मुसलमानों के बीच आखिर किस बात को लेकर टकराव है—न जमीन को लेकर और न आरक्षण को लेकर। उन्होंने कहा कि फेसबुक पर मुसलमानों को गाली देने से पहले यह सोचना चाहिए कि इससे राजनीतिक संबंधों पर क्या असर पड़ता है। उनके अनुसार, जो लोग पहले ब्राह्मणों को ‘गुरुजी’ कहकर सम्मान देते थे, वे ऐसी भाषा के कारण उनसे दूर हो सकते हैं।
सोशल मीडिया की भाषा पर चेतावनी
प्रशांत किशोर ने कहा कि सोशल मीडिया पर लिखी गई बात केवल ऑनलाइन बहस तक सीमित नहीं रहती। वह लोगों के बीच धारणा और रिश्तों को भी प्रभावित कर सकती है। उन्होंने ब्राह्मण समाज से आग्रह किया कि वह किसी समुदाय के खिलाफ अपमानजनक भाषा के बजाय संवाद और सम्मान का रास्ता अपनाए।
उनका कहना था कि यदि कोई समाज खुद को बुद्धिजीवी मानता है, तो उसके आचरण में भी विवेक दिखना चाहिए। उन्होंने फेसबुक पर समुदाय विशेष को निशाना बनाने को राजनीतिक रूप से नुकसानदेह बताया और कहा कि इस तरह की भाषा पुराने समर्थकों को दूर कर सकती है। भाषण में उन्होंने यह भी कहा कि मतदाताओं का समर्थन केवल पहचान से नहीं, बल्कि व्यवहार और आपसी संबंधों से भी जुड़ा होता है।
‘कलम और किताब आपकी ताकत’
ब्राह्मण समाज की परंपरागत पहचान का जिक्र करते हुए किशोर ने कहा कि उसकी ताकत कलम और किताब रही है, न कि फरसा चलाना। उन्होंने परशुराम के संदर्भ में कहा कि समाज को गलत रास्ते पर नहीं जाना चाहिए। उनके मुताबिक, किसी प्रतीक या पहचान को हिंसा अथवा टकराव से जोड़ने के बजाय शिक्षा और विचार की परंपरा को महत्व देना चाहिए।
उन्होंने अति पिछड़ा समाज का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके पूर्वजों ने अलग-अलग समुदायों को साथ बिठाने की व्यवस्था बनाई थी। इसलिए सामाजिक संदर्भों को समझे बिना किसी समूह के खिलाफ नाराजगी बढ़ाना ठीक नहीं है। उनका संदेश था कि समाज में प्रभाव कायम रखने के लिए पुराने सामाजिक संबंधों को समझना और उनका सम्मान करना जरूरी है।
भाषण का मुख्य संदेश
महिनाम गांव में दिए गए इस संबोधन में प्रशांत किशोर ने ब्राह्मण समाज से अपनी शैक्षिक विरासत और सामाजिक संस्कारों की ओर लौटने की बात कही। उन्होंने मुस्लिम मतदाताओं से दूरी, फेसबुक पर इस्तेमाल होने वाली अपमानजनक भाषा और बदलते राजनीतिक समीकरणों को आपस में जोड़कर अपनी राय रखी।
उनके भाषण का मूल संदेश यह था कि किसी समुदाय को गाली देना न सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाता है और न राजनीतिक समर्थन सुनिश्चित करता है। शिक्षा, संवाद और दूसरों के प्रति सम्मान को उन्होंने समाज की वास्तविक ताकत बताया। उनके दावों और राजनीतिक आकलन को भाषण में व्यक्त उनकी राय के रूप में देखना चाहिए; प्रस्तुत सामग्री में इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि शामिल नहीं है।


























