कॉकरोच जनता पार्टी चींटी जनता पार्टी
---Advertisement---

महाराष्ट्र की राजनीति में नया मोड़, शिवसेना पुनर्मिलन की चर्चाओं ने बढ़ाई हलचल

Maharashtra News:: अंबादास दानवे ने कहा कि मुझे कई मौकों पर ऐसा महसूस होता है। लेकिन सिर्फ मेरे अकेले चाहने से कुछ नहीं होने वाला, दोनों तरफ से यह इच्छा होनी चाहिए। वहीं, अब्दुल सत्तार ने भी उतनी ही गर्मजोशी दिखाते हुए कहा कि यह बिल्कुल सही समय है जब हमें एकजुट हो जाना चाहिए।

शिंदे-उद्धव की दूरियां होंगी खत्म? महाराष्ट्र में तेज हुई पुनर्मिलन की चर्चा

HIGHLIGHTS

  • महाराष्ट्र में फिर होगा बड़ा राजनीतिक उलटफेर
  • शिवसेना के दोनों गुटों के एक होने के संकेत
  • उद्धव और शिंदे गुट के बीच बढ़ी नजदीकियां
  • दो साल बाद बदल रहे सियासी समीकरण
  • भाजपा के खिलाफ एकजुट होगी शिवसेना

Maharashtra News: महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत दे रही है। 2022 में शिवसेना के विभाजन और पार्टी में हुई बगावत ने राज्य की सियासत को झकझोर कर रख दिया था। उस समय एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुए विद्रोह ने उद्धव ठाकरे सरकार को गिरा दिया था और महाराष्ट्र में शिंदे-भाजपा गठबंधन की सरकार बनी थी। लेकिन, अब दो साल बाद हवा का रुख बदलता हुआ नजर आ रहा है। अब जो चर्चाएं हो रही हैं, वे किसी भी समय महाराष्ट्र के सियासी समीकरणों को पलट सकती हैं।

खबरों का सबसे बड़ा केंद्र है शिवसेना के दोनों धड़ों—उद्धव ठाकरे गुट (शिवसेना यूबीटी) और एकनाथ शिंदे गुट (शिवसेना)—के बीच फिर से मिलन की संभावना जताई जा रही है। महाराष्ट्र के चर्चित इलाके छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व में औरंगाबाद) से दोनों गुटों के वरिष्ठ नेताओं के बयानों ने सियासी गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। यह संकेत मिल रहा है कि दोनों धड़ों के बीच दूरियां कम हो सकती हैं और वे फिर से एक साथ आने की तैयारी कर रहे हैं।

छत्रपति संभाजीनगर से आए संकेत

पिछले दिनों छत्रपति संभाजीनगर में दोनों गुटों के दो बेहद वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं ने ऐसे बयान दिए हैं जिन्हें सिर्फ राजनीतिक हवा नहीं माना जा सकता। उद्धव गुट के प्रमुख चेहरे और विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष अंबादास दानवे और शिंदे गुट के कद्दावर नेता अब्दुल सत्तार ने खुलकर अपनी बात रखी है।

अंबादास दानवे, जो शिवसेना (यूबीटी) के मजबूत बोल माने जाते हैं, ने सीधे तौर पर भाजपा पर निशाना साधा और कहा कि भाजपा का एक ही एजेंडा है—महाराष्ट्र में क्षेत्रीय दलों का वजूद खत्म करना। बड़ी मछली हमेशा छोटी मछली को निगल जाती है। भाजपा इस वक्त महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी (NCP) दोनों के साथ यही खेल खेल रही है। भाजपा—शिवसेना को सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि अपना दुश्मन मानती है और उसका एकमात्र टारगेट शिवसेना के वजूद को पूरी तरह खत्म करना है।”

जब इन दोनों नेताओं से सीधे सवाल किया गया कि क्या शिवसेना के दोनों गुटों को दोबारा मिल जाना चाहिए, तो उनके जवाब ने सबको हैरान कर दिया। शिंदे और उद्धव गुट जो कभी एक-दूसरे के कट्टर विरोधी लग रहे थे, उनके नेताओं का लहजा अब बदल चुका है।

अंबादास दानवे ने कहा कि मुझे कई मौकों पर ऐसा महसूस होता है। लेकिन सिर्फ मेरे अकेले चाहने से कुछ नहीं होने वाला, दोनों तरफ से यह इच्छा होनी चाहिए। वहीं, अब्दुल सत्तार ने भी उतनी ही गर्मजोशी दिखाते हुए कहा कि यह बिल्कुल सही समय है जब हमें एकजुट हो जाना चाहिए। अगर हमारे उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे साहब इस बात के लिए रजामंदी दे देते हैं, तो दोनों पार्टियों को एक होने में जरा भी देरी नहीं लगेगी।

क्यों बदल रहे हैं समीकरण?

अब सवाल उठता है कि आखिर अचानक ऐसी क्या वजह है कि शिवसेना के दोनों धड़े एक-दूसरे के पास आने की बात करने लगे हैं? इसका सीधा जवाब है—अपनी जमीन बचाने की लड़ाई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, शिवसेना नेताओं की इस बेचैनी के पीछे छत्रपति संभाजीनगर और पूरे मराठवाड़ा में बदलते सियासी समीकरण हैं।

एक समय था जब औरंगाबाद नगर निगम और जिला परिषद पर अविभाजित शिवसेना का एकछत्र राज हुआ करता था। यह शिवसेना का मजबूत गढ़ माना जाता था। लेकिन, 2022 की बगावत के बाद से हालात बदल गए। आज इन दोनों प्रमुख निकायों पर भाजपा ने पूरी तरह से अपना कब्जा जमा लिया है। शिवसेना के नेता महसूस कर रहे हैं कि भले ही शिंदे गुट भाजपा के साथ सरकार चला रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर भाजपा शिवसेना के वोट बैंक को खत्म करने में लगी है।

औरंगाबाद-जालना सीट की राजनीति

इस नाराजगी की बड़ी वजह औरंगाबाद-जालना लोकसभा सीट का समीकरण है। अंबादास दानवे ने बताया कि पिछले 25-30 सालों से इस सीट पर हमेशा शिवसेना ही चुनाव लड़ती आ रही थी। चाहे वह अकेले हो या गठबंधन के तहत, यह सीट शिवसेना की परंपरागत सीट मानी जाती थी। लेकिन इस बार भाजपा ने शिंदे गुट के दावों को दरकिनार करते हुए वहां अपना खुद का उम्मीदवार खड़ा कर दिया है।

इस कदम ने शिंदे गुट के नेताओं को गहरा सोचने पर मजबूर कर दिया है। उन्हें एहसास हो रहा है कि भाजपा के साथ रहते हुए उनका अस्तित्व खतरे में है। दूसरी ओर, उद्धव गुट को भी लग रहा है कि भाजपा की ताकत का मुकाबला अकेले नहीं किया जा सकता और अगर शिवसेना का वोट बैंक एक हो जाए तो वे फिर से मजबूती से खड़े हो सकते हैं।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now