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RSS कैसे काम करता है? जानिए संगठन की पूरी कार्यप्रणाली

आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। संघ के अनुसार इसकी स्थापना उस दौर में हुई थी जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। संगठन का दावा है कि उस समय अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ काम करने वाले कई संगठनों की तरह संघ का भी औपचारिक पंजीकरण नहीं कराया गया था।

RSS कैसे काम करता है? पंजीकरण, फंडिंग और शाखाओं की पूरी जानकारी

HIGHLIGHTS

  • आरएसएस का पंजीकरण क्यों नहीं है?
  • RSS की फंडिंग का क्या है मॉडल?
  • आरएसएस की कमाई कहां से होती है?
  • RSS का संगठनात्मक ढांचा क्या है?
  • संघ की शाखाओं में क्या होता है?

The entire functioning of the RSS: हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे और कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियंक खरगे द्वारा आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के पंजीकरण को लेकर सवाल उठाए जाने के बाद संगठन एक बार फिर चर्चा में आ गया है। इस बयान के बाद आरएसएस की कार्यप्रणाली, कानूनी स्थिति, फंडिंग और संगठनात्मक ढांचे को लेकर लोगों के बीच नई बहस शुरू हो गई है। ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण हो जाता है कि आरएसएस आखिर कैसे काम करता है, उसका संचालन किस प्रकार होता है और उसकी वित्तीय व्यवस्था क्या है। आइए, इस खबर को विस्तार से समझते हैं और जानिए इस मुद्दे के विभिन्न पहलुओं को।

क्या आरएसएस एक पंजीकृत संगठन है?

आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। संघ के अनुसार इसकी स्थापना उस दौर में हुई थी जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। संगठन का दावा है कि उस समय अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ काम करने वाले कई संगठनों की तरह संघ का भी औपचारिक पंजीकरण नहीं कराया गया था।

संघ नेतृत्व का कहना है कि स्वतंत्रता के बाद भी भारतीय कानूनों में ऐसे वैचारिक संगठनों के लिए पंजीकरण अनिवार्य नहीं था। इसी कारण आरएसएस को एक “बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स” (Body of Individuals) के रूप में देखा गया। विभिन्न न्यायिक फैसलों में भी संघ को इसी स्वरूप में मान्यता मिलने का उल्लेख किया जाता है।

संघ प्रमुख मोहन भागवत सहित कई वरिष्ठ पदाधिकारी समय-समय पर यह स्पष्ट कर चुके हैं कि संगठन का कोई औपचारिक पंजीकरण नहीं है, लेकिन इसकी गतिविधियां और संरचना पूरी तरह संगठित और व्यवस्थित ढंग से संचालित होती हैं।

प्रतिबंध और कानूनी मान्यता का मुद्दा

आरएसएस पर स्वतंत्र भारत में तीन बार प्रतिबंध लगाया जा चुका है। संघ का तर्क है कि जब भी सरकारों ने उस पर प्रतिबंध लगाया, तब उसे एक संगठित इकाई के रूप में ही माना गया। बाद में अदालतों और सरकारी प्रक्रियाओं के माध्यम से ये प्रतिबंध हटाए गए।

संघ नेताओं के अनुसार यह तथ्य दर्शाता है कि संगठन की एक स्पष्ट पहचान और कानूनी स्थिति मौजूद रही है। हालांकि, आरएसएस की कानूनी प्रकृति को लेकर समय-समय पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस होती रही है।

गुरु दक्षिणा से चलती है वित्तीय व्यवस्था

आरएसएस की फंडिंग को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं। संघ का कहना है कि उसकी प्रमुख वित्तीय व्यवस्था स्वयंसेवकों द्वारा दिए जाने वाले योगदान पर आधारित है। इसके लिए हर वर्ष गुरु पूर्णिमा के अवसर पर “गुरु दक्षिणा” कार्यक्रम आयोजित किया जाता है।

इस परंपरा के तहत स्वयंसेवक अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार आर्थिक सहयोग प्रदान करते हैं। संघ के अनुसार गुरु दक्षिणा की राशि एक रुपये से शुरू हो सकती है और कोई भी स्वयंसेवक अपनी इच्छा के अनुसार योगदान दे सकता है।

संघ का दावा है कि इसी धनराशि से शाखाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों, बैठकों और अन्य गतिविधियों का संचालन किया जाता है। संगठन यह भी कहता है कि प्राप्त राशि का पूरा लेखा-जोखा रखा जाता है और वित्तीय प्रबंधन निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार किया जाता है।

आयकर और वित्तीय विवाद

अतीत में आरएसएस की आय और उस पर कराधान को लेकर भी चर्चा हुई थी। संघ से जुड़े नेताओं का कहना है कि आयकर विभाग द्वारा इस विषय को उठाया गया था, लेकिन न्यायिक स्तर पर यह माना गया कि संगठन “बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स” की श्रेणी में आता है। इसी आधार पर गुरु दक्षिणा को लेकर संघ की स्थिति को स्वीकार किया गया। हालांकि, संघ की वित्तीय व्यवस्था को लेकर समय-समय पर सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श जारी रहता है।

शाखाएं: संघ की मूल इकाई

आरएसएस की पहचान उसकी दैनिक शाखाओं से होती है। शाखाएं खुले मैदानों, पार्कों और सार्वजनिक स्थानों पर आयोजित की जाती हैं। इन्हें संघ की सबसे बुनियादी और महत्वपूर्ण इकाई माना जाता है।

शाखाओं में स्वयंसेवक नियमित रूप से एकत्रित होते हैं, जहां शारीरिक व्यायाम, खेल, योग, बौद्धिक चर्चा और संगठनात्मक गतिविधियां आयोजित की जाती हैं। संघ का कहना है कि शाखाओं का संचालन पूरी तरह स्वयंसेवकों द्वारा किया जाता है और स्थानीय स्तर पर उनकी देखरेख भी स्वयंसेवक ही करते हैं। देशभर में हजारों शाखाएं संचालित होती हैं, जो संघ के वैचारिक और संगठनात्मक विस्तार का आधार मानी जाती हैं।

लिखित संविधान और संगठनात्मक ढांचा

महात्मा गांधी की हत्या के बाद जब पहली बार आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया गया था, तब सरकार की ओर से संगठन के लिए लिखित संविधान तैयार करने की शर्त रखी गई थी। इसके बाद संघ ने अपना संविधान तैयार किया और यह स्पष्ट किया कि वह प्रत्यक्ष राजनीतिक गतिविधियों में भाग नहीं लेगा।

वर्तमान में संघ का पूरा संगठन इसी संविधान के आधार पर संचालित होता है। संगठनात्मक ढांचे में सरसंघचालक सर्वोच्च पद माना जाता है। सरसंघचालक के अलावा अन्य कई पदों पर चुनाव या चयन की प्रक्रिया के माध्यम से जिम्मेदारियां तय की जाती हैं।

संघ राष्ट्रीय, क्षेत्रीय, प्रांतीय और स्थानीय स्तर पर संगठित संरचना के साथ कार्य करता है। विभिन्न स्तरों पर नियमित बैठकें आयोजित की जाती हैं, जिनमें संगठन की गतिविधियों और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा होती है।

स्वयंसेवकों का रिकॉर्ड और प्रशिक्षण व्यवस्था

आरएसएस अपने स्वयंसेवकों का रिकॉर्ड भी व्यवस्थित रूप से रखता है। शाखाओं के माध्यम से जुड़े स्वयंसेवकों की जानकारी और उनकी गतिविधियों का विवरण संगठनात्मक स्तर पर संकलित किया जाता है। इसके अलावा संघ हर वर्ष गर्मियों में “संघ शिक्षा वर्ग” या ओटीसी (ऑफिसर्स ट्रेनिंग कैंप) का आयोजन करता है। इन प्रशिक्षण शिविरों में स्वयंसेवकों को वैचारिक, संगठनात्मक और शारीरिक प्रशिक्षण दिया जाता है। संघ के अनुसार यह प्रशिक्षण संगठन की कार्यशैली को समझने और नेतृत्व क्षमता विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

निर्णय लेने की प्रक्रिया

संघ की सबसे महत्वपूर्ण और सर्वोच्च निर्णय लेने वाली बैठक “अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा” मानी जाती है। यह बैठक आमतौर पर हर वर्ष मार्च में आयोजित होती है और इसमें संगठन की नीतियों, गतिविधियों और भविष्य की दिशा पर महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं।

इसके अतिरिक्त “अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल” की बैठक वर्ष में दो बार आयोजित की जाती है। वहीं क्षेत्र, प्रांत और संभाग स्तर पर भी नियमित अंतराल पर बैठकों का आयोजन होता है।

कुल मिलाकर आरएसएस स्वयं को एक वैचारिक और स्वयंसेवक-आधारित संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसकी गतिविधियां शाखाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों, नियमित बैठकों और स्वयंसेवकों के सहयोग से संचालित होती हैं। पंजीकरण, फंडिंग और संगठनात्मक ढांचे को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है, लेकिन संघ का दावा है कि वह अपने संविधान और स्थापित परंपराओं के आधार पर कार्य करता है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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