हरियाणा के पलवल जिले के छायंसा गांव में मौतों का सिलसिला

15 दिन में 12 मौतें, दूषित पानी या 'झोलाछाप' डॉक्टर... (फाइल फोटो)

संध्या समय न्यूज


हरियाणा के पलवल जिले के छायंसा गांव में मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। पिछले 15 दिनों में बीमारी से दर्जन भर लोगों की जान जाने के बाद पूरे गांव में दहशत का माहौल है। जबकि प्रशासन अभी तक सात मौतों की ही पुष्टि कर पाया है, ग्रामीणों का कहना है कि असली आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है।
हरियाणा के पलवल जिले के छायंसा गांव पिछले दो हफ्तों से मौत के साए में जी रहा है। जनवरी के अंतिम सप्ताह से शुरू हुआ मौतों का यह सिलसिला अब तक नहीं थमा है। ग्रामीणों का दावा है कि इस दौरान 12 से लेकर 20 लोगों की मौत हो चुकी है, जिसमें चार बच्चे भी शामिल हैं। वहीं, प्रशासनिक आंकड़ों में अब तक सात मौतों की पुष्टि की गई है। गांव में बुखार, पेट दर्द और पीलिया के लक्षणों से पीड़ित मरीजों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है, जिससे सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इस आपदा का असली कारण क्या है?

लक्षणों ने बढ़ाई चिंता, मौत के पहले ये हुए संकेत

गांव की 5 हजार से अधिक आबादी पर मंडरा रहे इस संकट को लेकर स्वास्थ्य विभाग अलर्ट पर है। मरीजों में आम तौर पर तेज बुखार, पेट में तेज दर्द, उल्टियां, बदन दर्द और कमजोरी जैसे लक्षण देखे गए हैं। कई मामलों में लिवर फेल होने और पीलिया के भी संकेत मिले हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जनवरी के आखिरी हफ्ते से हालात बिगड़ने शुरू हुए। पहले अचानक तीन लोगों की मौत हुई, इसके बाद मौतों का ग्राफ बढ़ता चला गया।

दर्दनाक किस्से: क्लास सेवन का छात्र और चेन्नई लौटा युवक

गांव के एक 14 वर्षीय छात्र की मौत ने सबको हिला दिया। सातवीं क्लास में पढ़ने वाले इस बच्चे को 26 जनवरी को बुखार और पेट दर्द हुआ। अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन अगले ही दिन यानी 27 जनवरी को उसकी मौत हो गई। डॉक्टरों ने उसमें पीलिया और लिवर की गंभीर समस्या पाई थी। इसी तरह, 24 वर्षीय दिलशाद का मामला भी दिल दहला देने वाला है। काम के सिलसिले में चेन्नई गए दिलशाद को वहां बुखार हुआ। इलाज के लिए वो गांव लौटा और 9 फरवरी को अस्पताल में भर्ती हुआ। डॉक्टरों ने उसमें भी पीलिया की पुष्टि की और 10 फरवरी को उसकी मौत हो गई।

क्या है मौतों का असली कारण? ‘पानी’ या ‘सुई’?

ग्रामीणों का सीधा आरोप पेयजल की गंभीर किल्लत और दूषित पानी पर है। गांव में पीने का पानी नहीं आता है, जिससे लोग टैंकरों पर निर्भर हैं। एक टैंकर पानी की कीमत 1500 रुपये है, जिसे लोग मिलकर मंगवाते हैं और घरों में बने टैंकों में भरकर एक महीने तक इस्तेमाल करते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि पुराना होने के कारण यह पानी दूषित हो जाता है और यही मौतों का कारण बन रहा है।

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हालांकि, स्वास्थ्य विभाग की जांच में सामने आए तथ्य थोड़े और जटिल हैं। पलवल की सिविल सर्जन डॉ. सतिंदर वशिष्ठ के मुताबिक, जिन सात लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, उनमें से चार को हेपेटाइटिस (पीलिया) था। लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि हेपेटाइटिस से इतनी तेजी से मौत होना सामान्य नहीं है।
अब जांच का पिंजरा ‘झोलाछाप’ डॉक्टरों और संक्रमित सुइयों की ओर भी बढ़ा है। संदिग्ध प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों पर नजर रखी जा रही है। आशंका है कि बार-बार इस्तेमाल की जाने वाली सुइयां या असुरक्षित इंजेक्शन इस बीमारी के प्रसार का बड़ा कारण हो सकते हैं।

प्रशासन की कार्रवाई

घटना के बाद प्रशासन ने सक्रिय होते हुए गांव में पांच मेडिकल टीमें तैनात की हैं। सैंपलिंग 1 फरवरी से अब तक 1500 से अधिक लोगों के सैंपल लिए जा चुके हैं। पानी की जांच 31 पानी के सैंपल भेजे गए, जिनमें कुछ जगहों पर क्लोरीन की मात्रा कम पाई गई। तत्काल अतिरिक्त क्लोरीन उपलब्ध कराई गई। जागरूकता घर-घर जाकर लोगों को साफ पानी पीने और साफ-सफाई बरतने की सलाह दी जा रही है।
विभाग का कहना है कि 11 फरवरी के बाद किसी नई मौत की सूचना नहीं है, लेकिन नल्हड़ मेडिकल कॉलेज के साथ मिलकर हो रही विस्तृत जांच के नतीजे ही यह साफ करेंगे कि गांव में कौन सी ‘अनदेखी’ बीमारी लोगों की जान ले रही है। फिलहाल, छायंसा गांव सिर्फ इलाज नहीं, बल्कि जवाब का भी इंतजार कर रहा है।

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