The History of Kolkata: पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनावों में भाजपा की प्रचंड जीत ने एक बार फिर इस राज्य की सियासी धरातल पर बड़ा बदलाव दर्ज कराया है। पंद्रह वर्षों बाद सत्ता पर काबिज हो रही नई ताकत के साथ कोलकाता एक बार फिर नए नायकों को देख रहा है। बंगाल का इतिहास गौर से देखें तो यहां की जनता का मूड बदलने में ज़रा भी देर नहीं लगती—चाहे वो कांग्रेस का टूटा साम्राज्य हो, 34 साल तक चले कम्युनिस्ट शासन का उखाड़ फेंका जाना हो, या फिर अब सत्ता पलटी।
लेकिन, क्या आप जानते हैं कि सत्ता की इस ‘अनिश्चितता’ और ‘तख्तापलट’ की शुरुआत बंगाल से ही हुई थी? आज़ाद भारत की राजनीति से पहले, यहीं से अंग्रेजों ने अपनी नींव रखी थी। व्यापार के बहाने ताकत बढ़ाने वाले अंग्रेजों ने यहीं से दिल्ली की ओर कूच किया और देखते ही देखते पूरे देश पर राज कर बैठे। आइए, ताज़े राजनीतिक बदलाव के बीच उस इतिहास को याद करते हैं, जब अंग्रेजों ने बंगाल में मुगलों का सिंहासन हिलाकर उनका सफाया किया था।
मुगल साम्राज्य की कमजोरी ने दिया मौका
सत्रहवीं सदी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुगल बादशाहों से व्यापार की अनुमति लेकर भारत में कदम रखा था। शुरुआत में उनका उद्देश्य सिर्फ व्यापार था। सूरत, मद्रास और कलकत्ता में अपने केंद्र बनाकर वे भारतीय वस्त्र और मसाले यूरोप भेजते थे। उस दौर में मुगल साम्राज्य इतना मजबूत था कि अंग्रेज राजनीति में कदम रखने की जुर्रत नहीं कर सकते थे।
लेकिन अठारहवीं सदी में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य केंद्रीय नियंत्रण ढीला पड़ गया। प्रख्यात इतिहासकार बिपिन चंद्र अपनी पुस्तक ‘आधुनिक भारत का इतिहास’ में लिखते हैं कि बंगाल, अवध और हैदराबाद जैसे प्रांतों के नवाबों और सूबेदारों ने स्वतंत्र शासन करना शुरू कर दिया। इसी राजनीतिक कोहरे ने अंग्रेजों को हस्तक्षेप का सुनहरा मौका दिया।
बंगाल की समृद्धि पर थी नजर
उस दौर में बंगाल भारत का सबसे समृद्ध प्रदेश था। कृषि और कपड़ा उद्योग के क्षेत्र में यहां की पकड़ अद्वितीय थी। अंग्रेजों को यहां की इस संपन्नता ने बहुत आकर्षित किया। अब उनकी नज़रें सिर्फ व्यापार से आगे बढ़कर सत्ता पर कब्ज़ा करने पर थीं।
प्लासी (1757) और बक्सर (1764) ने बदली तकदीर
साल 1757 की ‘प्लासी की लड़ाई’ इतिहास का सबसे अहम मोड़ साबित हुई। बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने अंग्रेजों के विस्तारवाद का विरोध किया, लेकिन रॉबर्ट क्लाइव की चालाकी ने सब बिगाड़ दिया। क्लाइव ने नवाब के ही सेनापति मीर जाफर को अपने पक्ष में कर लिया। इतिहासकार आर.सी. मजूमदार के अनुसार, यह जीत युद्ध के मैदान से ज्यादा विश्वासघात का नतीजा थी।
इसके ठीक सात साल बाद, 1764 में ‘बक्सर की लड़ाई’ हुई। इसमें अंग्रेजों ने मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय, अवध के नवाब और मीर कासिम के संयुक्त फौज को धूल चटा दी। इस जीत के बाद अंग्रेजों को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की ‘दीवानी’ (राजस्व वसूली का अधिकार) मिल गई, जिससे उनकी आर्थिक ताकत अभूतपूर्व रूप से मजबूत हो गई।
‘व्यापारी’ से ‘शासक’ बनने का सफर
दीवानी मिलने के बाद अंग्रेजों ने व्यापारी का मुखौटा उतार दिया। अब वे सीधे शासक बन चुके थे। प्रशासन और सेना पर अपनी पकड़ बनाते हुए उन्होंने भारतीय राजाओं के बीच ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई। इतिहासकार सुमित सरकार अपनी पुस्तक ‘मॉडर्न इंडिया’ में इसी रणनीति को अंग्रेजी सफलता का आधार बताते हैं।
दक्षिण-पश्चिम से लेकर दिल्ली तक… और फिर 1857
अब अंग्रेजों ने पूरे भारत में अपने पंजे फैलाने शुरू कर दिए। दक्षिण में टीपू सुल्तान के साथ युद्ध करते हुए 1799 तक मैसूर पर कब्ज़ा किया। वहीं, 1818 तक चले मराठा युद्धों के बाद मराठा साम्राज्य की रीढ़ तोड़ दी गई।
उन्नीसवीं सदी में गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने ‘लैप्स के सिद्धांत’ (Doctrine of Lapse) के तहत उन राज्यों पर कब्ज़ा करना शुरू किया जहां कोई उत्तराधिकारी नहीं था। सतारा, झांसी और नागपुर इसी नीति का शिकार हुए। इससे भारतीय शासकों में भयंकर असंतोष पैदा हुआ, जिसका नतीजा 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में सामने आया।
दिल्ली में बहादुर शाह जफर को फिर से सम्राट घोषित किया गया, लेकिन अंग्रेजों ने इस विद्रोह को क्रूरता से कुचल दिया। 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन खत्म होकर भारत सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर रंगून (म्यांमार) भेज दिया गया। इसके साथ ही दिल्ली से लेकर पूरे भारत में मुगल सत्ता का सूर्यास्त हो गया।
























