West Bengal Election Violence: केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने हाल ही में पश्चिम बंगाल के पहले चरण के मतदान को “अब तक का सबसे शांतिपूर्ण चुनाव” करार दिया। उनके इस दावे के पीछे एक तथ्य जरूर था कि मतदान के दिन किसी अधिकारिक मौत की खबर नहीं आई। लेकिन, जब इसी ‘शांति’ को बीते 20 सालों के ‘रक्त-चरित्र’ के आईने में देखा जाता है, तो यह शांति एक भयावह त्रासदी के सामने खोखली और क्षणिक लगती है।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े चुक-चुकाकर कहते हैं कि भारत में जितनी भी राजनीतिक हत्याएं होती हैं, उनमें सबसे अधिक हिस्सा पश्चिम बंगाल का है। 2006 से 2024 तक का चुनावी इतिहास लाशों, देसी बमों और बूथ कैप्चरिंग का ग्राफ है, जहां सत्ता का दमन सिर्फ विरोधी पार्टियों तक सीमित नहीं, बल्कि आम मतदाता के अधिकार की हत्या बनकर सामने आया है।

बदलती सरकारें, अटल हिंसा
बंगाल की राजनीति का सबसे दुखद पहलू यह है कि यहां सत्ता बदली, लेकिन हिंसा की संस्कृति नहीं बदली। 2006 में जब वामपंथी सरकार (CPM) अपने चरम पर थी, तब भी 5-6 लोगों की जान गई थी। 2008 में नंदीग्राम और सिंगुर के आंदोलनों ने जो खून खराबा किया, उसके बाद पंचायत चुनावों में लगभग 45 लोग मारे गए।
2011 में जब ममता बनर्जी की अगुवाई में TMC ने 34 साल के वाम शासन को उखाड़ फेंका, तो लोगों को लगा कि बदलाव आएगा। लेकिन नतीजा उल्टा निकला। सत्ता परिवर्तन के बाद वामपंथियों पर भयंकर प्रतिशोध लिया गया। CPM के अनुसार, 2011 से 2016 के बीच 183 उनके कार्यकर्ता मारे गए। 2013 के पंचायत चुनावों में 20-30 और 2018 के पंचायत चुनावों में 75 लोगों की मौत ने यह साबित कर दिया कि ‘परिवर्तन’ का अर्थ सिर्फ हिंसा करने वालों का बदलना था।
2019 और 2021 में जब भाजपा (BJP) बंगाल की मुख्य विपक्षी ताकत बनकर उभरी, तो हिंसा का दायरा और तीखा हो गया। 2019 में 12-15 लोग मारे गए, जबकि 2021 में ‘कॉल ऑफ जस्टिस’ की रिपोर्ट के अनुसार 1,300 से अधिक हिंसा की घटनाएं दर्ज हुईं और 17 लोगों की जान गई। अमित शाह का दावा कि 2019-2021 के बीच 130 से ज्यादा भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या हुई, यह बंगाल की राजनीतिक द्वेष की गहराई को दर्शाता है। 2023 के पंचायत चुनावों में 45 से 55 लोगों की मौत ने यह साबित किया कि हिंसा अब एक ‘नॉर्म’ बन चुकी है।

डर का इतना वातावरण कि प्रत्याशी न खड़े हो पाएं
यह हिंसा कोई आकस्मिक नहीं होती, बल्कि एक सोची-समझी साजिश है। 2018 के पंचायत चुनाव का उदाहरण सबसे डरावना है, जहां 34 प्रतिशत सीटें बिना मुकाबले ही तय हो गईं। इसका सीधा मतलब है कि विपक्ष को इतना डराया और धमकाया गया कि वे नामांकन तक नहीं भर सके। 2014 में तो चुनावी हिंसा में घायल होने वाले सभी 1,354 आम नागरिक (जो किसी पार्टी से नहीं जुड़े थे) सिर्फ बंगाल के थे। यह आंकड़ा किसी भी सभ्य लोकतंत्र के लिए कलंक है।
सुरक्षा बलों की तैनाती क्या अंतिम हल है?
2024 के लोकसभा चुनाव में 900 से अधिक कंपनियों की तैनाती से शायद मौतों का आंकड़ा 6 से 10 तक सीमित रह पाया है। लेकिन क्या केंद्रीय बलों की दीवार खड़ी करना ही लोकतंत्र की सफलता है? डायमंड हार्बर और मगराहाट मं् दोबारा मतदान (Repoll) और फालता में पूरे विधानसभा क्षेत्र में फिर से वोटिंग कराना यह दर्शाता है कि स्थानीय स्तर पर गुंडों और दबंग ताकतों का दबाव कितना कुछीया होता है। जब तक जनता डर के साये में वोट डालने जाएगी, तब तक चुनाव आयोग और सुरक्षा बलों की भारी तैनाती केवल ‘एक दिन की शांति’ खरीद सकती है, लेकिन वास्तविक लोकतांत्रिक वातावरण नहीं बना सकती।




















