पिछले चार दशकों से दुनिया आतंकवाद के ख़िलाफ़ ‘युद्ध’ की घोषणाएँ कर रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर जी-20 और जी-7 जैसे मंचों तक हर बरस इस ख़तरे की निंदा में प्रस्ताव पारित होते हैं, कठोरतम शब्दों में बयान जारी होते हैं और आतंक की जड़ें खोदने की बात कही जाती है। मगर ज़मीन पर हक़ीक़त कुछ और कहती है। आतंकवाद अब भी जीवित है — बल्कि पहले से ज़्यादा चतुर, बहुरूपिया और अप्रत्याशित हो गया है। कभी वह भीड़भाड़ वाले बाज़ारों में विस्फोट करता है, कभी होटलों के गलियारों में घुसकर सिर उठाता है, कभी समुद्र की लहरों को चीरता हुआ आता है और अब उसने सबसे असंभव मानी जाने वाली जगह चुनी है — आसमान में उड़ता हुआ विमान।
‘9/11′ ने अमेरिका को हिलाकर रख दिया था। ’26/11’ ने मुंबई की रगों में ख़ौफ़ उतार दिया था। कंधार में भारतीय विमान के अपहरण ने साबित कर दिया था कि आतंक की पहुँच सीमाओं से पार और ऊँचाइयों से ऊपर है। इन हादसों के बाद हवाई सुरक्षा को नए सिरे से गढ़ा गया — स्कैनर लगे, प्रोटोकॉल बने, कॉकपिट के दरवाज़े मज़बूत किए गए।

फिर भी वही सवाल बार-बार लौटता है: क्या हमारी सुरक्षा व्यवस्थाएँ सचमुच अभेद्य हैं, या वे केवल काग़ज़ों पर मज़बूत हैं? दुबई से तेल अवीव जा रहे ‘फ्लाईदुबई’ के विमान में घटी घटना ने इसी पुराने सवाल को ताज़ा कर दिया है — और साथ ही देश को एक नया नायक भी दे दिया है।
वह दिन, वह पल और वह कहानी
‘फ्लाईदुबई’ की उड़ान FZ-1073 दुबई से तेल अवीव की ओर रवाना हुई थी। बोइंग-737 मैक्स विमान करीब पैंतीस हज़ार फ़ीट की ऊँचाई पर अपनी निर्धारित राह पर चल रहा था कि अचानक वह हो गया, जो शायद ही किसी की कल्पना में होता हो। ओमानी मूल के को-पायलट ने चाकू से कैप्टन स्मित मच्छार पर हमला बोल दिया।
मक़सद साफ़ था — कैप्टन को निष्क्रिय करके विमान को इजरायल की धरती से टकराकर एक ‘आत्मघाती’ अंजाम तक पहुँचाना। अगर यह साज़िश कामयाब हो जाती, तो हवा में एक और ‘9/11’ की पुनरावृत्ति होती और पूरी दुनिया एक बार फिर दहल जाती।
हाथापाई के दौरान विमान असंतुलित हुआ और कुछ ही सेकंडों में चौदह हज़ार फ़ीट नीचे आ गया। इतनी तेज़ गिरावट में सामान्य इंसान का साहस टूट जाता है, हाथ-पैर जवाब दे देते हैं। मगर कैप्टन मच्छार ने हार नहीं मानी। ख़ून से लथपथ शरीर, चोटों की तीव्र पीड़ा और मौत की निकटता के बावजूद उन्होंने विमान का नियंत्रण नहीं छोड़ा।
उन्होंने कॉकपिट का दरवाज़ा खोलकर इमरजेंसी का संकेत दिया, क्रू और यात्रियों को सावधान किया और अंतिम पल तक नियंत्रण-स्तंभ से चिपके रहे। तबूक (सऊदी अरब) हवाई अड्डे पर विमान की सुरक्षित लैंडिंग हुई और एक सौ चौहत्तर यात्रियों — जिनमें छोटे-छोटे बच्चे भी थे — की जान बच गई। दुनिया के सामने एक बड़ा हादसा होते-होते टल गया।
ख़ून लथपथ थे, मगर हाथ स्थिर थे
कैप्टन मच्छार के इस कारनामे को कितना भी सराहा जाए, कम ही है। सोचिए — जिस पल चाकू पास ही लहरा रहा हो, विमान नीचे की ओर खिसक रहा हो और सामने ख़ुद का ही साथी दुश्मन बन गया हो, उस पल साधारण इंसान घबराकर कुछ नहीं कर पाता। कैप्टन मच्छार ने उसी पल में वह किया, जो वर्षों की ट्रेनिंग, अनुशासन और चरित्र की कसौटी से ही सूझता है — घबराना नहीं, नियंत्रण छोड़ना नहीं, मौक़ा गँवाना नहीं। यही मुस्तैदी है, यही शौर्य है।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि उन्होंने ख़ुद को बचाने से पहले विमान को बचाया। घायल हालत में कॉकपिट का दरवाज़ा खोलकर यात्रियों को सावधान करना, क्रू के पहुँचने तक नियंत्रण से डटे रहना — ये छोटे-छोटे फ़ैसले सौ मौतों और सौ ज़िंदगियों के बीच की दीवार खड़े करते हैं। यह सिर्फ़ एक पायलट की जीत नहीं, आतंक के ख़िलाफ़ इंसानी दृढ़संकल्प की जीत है।
चाकू कॉकपिट तक कैसे पहुँचा?
वीरता जितनी बड़ी है, चूकें भी उतनी ही बड़ी हैं — और इसलिए सवाल भी उतने ही बड़े हैं। पहला सवाल: पोस्ट-9/11 दुनिया में, जब कॉकपिट को क़िले जैसा मज़बूत बनाया गया है, धारदार हथियार कॉकपिट तक कैसे पहुँचा? जिस हवाई अड्डे से आरोपी को-पायलट सवार हुआ, वहाँ की सुरक्षा-जाँच से चाकू कैसे निकल गया? जब हथियार स्क्रीनिंग की परतें पार कर रहा था, तब वे परतें क्या कर रही थीं?
दूसरा सवाल क्रू की जाँच-पड़ताल का है। पायलटों की बैकग्राउंड वेरिफिकेशन और समय-समय पर पुनर्जाँच की प्रक्रिया कितनी सख़्त है? जर्मनविंग्स के हादसे ने दिखाया था कि ख़तरा कभी-कभी यूनिफ़ॉर्म के अंदर भी छिपा होता है। तब दो-पायलट नियम बना था। अब यह घटना उसी नियम की खामी की ओर इशारा करती है — जब दूसरा पायलट ही ख़तरा बन जाए, तो सुरक्षा किस आधार पर टिकेगी? ये सवाल असुविधाजनक हैं, मगर इन्हीं सवालों के जवाबों में यात्रियों की ज़िंदगी उड़ती है।
भू-राजनीति के ख़तरनाक चौराहे पर उड़ानें
तीसरा पहलू भू-राजनीतिक है। क्षेत्रीय तनाव के बीच यह भी पूछा जा रहा है कि जब हालात इतने गर्म हों, तो इजरायल के रूट की उड़ानों के लिए ओमानी मूल के पायलट को इजाज़त कैसे मिली? यह सवाल आरोप नहीं है, मगर ज़रूरी इसलिए है कि हवाई सुरक्षा अब केवल तकनीकी मुद्दा नहीं रही — वह सीधे वैश्विक राजनीति के चौराहे पर खड़ी है।
हर उड़ान के दो सिरे होते हैं, और दोनों सिरों की ज़मीनी सियासत हवा में भी अपनी परछाईं डालती है। एविएशन सुरक्षा के अंतरराष्ट्रीय ढाँचों को अब इसी परछाईं को पहचानने की ज़रूरत है — रूट, क्रू और जोखिम की नई गणित के साथ।
शौर्य के बाद श्रेय की राजनीति
अब आते हैं उस पहलू पर, जिससे भारतीय लोकतंत्र बार-बार रूबरू होता रहा है — श्रेय की राजनीति। जैसे ही कोई नायक उभरता है, राजनीतिक यंत्र तुरंत सक्रिय हो जाता है। बधाई के फ़ोन आते हैं, वीडियो कॉल की तस्वीरें निकलती हैं, कैमरे अस्पताल के बेड से लेकर रिश्तेदारों के घर तक पहुँच जाते हैं।
ख़बरों के मुताबिक़ कैप्टन मच्छार के मुंबई स्थित रिश्तेदारों को ढूँढ़कर मुख्यमंत्री के दफ़्तर तक पहुँचाया गया — मानो पैंतीस हज़ार फ़ीट की ऊँचाई पर सौ सत्तावन ज़िंदगियाँ बचाने का श्रेय किसी दल का हो, न कि उस व्यक्ति की ट्रेनिंग और हिम्मत का, जिसने ख़ून बहते हुए भी डेस्क नहीं छोड़ी।
चिंता यही है कि परंपरा के मुताबिक़ अब इस वीर पुरुष को ‘कब्ज़े’ में लेकर पार्टी का ‘ब्रांड एंबेसडर’ बनाने का प्रयोग होगा और ‘प्रेरणा-स्रोत’ वाली कथा गढ़ी जाएगी। यह आपत्तिजनक क्यों है? इसलिए कि नायक किसी दल की संपत्ति नहीं होते। वे उस व्यवस्था की उपज होते हैं जिसमें उनकी ट्रेनिंग हुई — उनके गुरुओं, परिवार और ख़ुद के धैर्य की उपज।
राजनीति का दायित्व नायकों पर कब्ज़ा नहीं, ऐसी व्यवस्थाएँ बनाना है जिनमें हर पायलट, हर सैनिक, हर नागरिक के शौर्य को बिना दलगत रंग के सम्मान मिले। कैप्टन स्मित मच्छार इस वक़्त सिर्फ़ एक भारतीय हैं — इसी रूप में उन्हें रहने देना उन्हें दी जाने वाली सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
‘लाइव’ करुणा और टेलीविज़न की दुकानदारी
प्रधानमंत्री मोदी ने अस्पताल में भर्ती कैप्टन से वीडियो कॉल पर बात की — यह स्वाभाविक और स्वागत योग्य कदम था। राष्ट्रपति ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू समेत विश्व भर के नेताओं ने उन्हें ‘रियल हीरो’ कहा। मगर उस बातचीत का सभी चैनलों पर ‘लाइव’ प्रसारण एक अलग किस्म का सवाल खड़ा करता है।
टेलीविज़न ने एक घायल इंसान की पीड़ा को बिना शर्त ‘कंटेंट’ बना दिया। अस्पताल का बेड स्टूडियो का सेट बन गया और शौर्य की कहानी टीआरपी की दुकानदारी में बदल गई। यह अपेक्षित भी था, इसलिए हैरान होने की ज़रूरत नहीं — मगर इसीलिए ज़रूरी है कि मीडिया ख़ुद से पूछे: क्या हम नायक का जश्न मना रहे हैं या दर्शकों की भावना की बोली लगा रहे हैं? सच्चा सम्मान तब होगा, जब चैनल जश्न के साथ-साथ सवाल भी उठाएँ — सुरक्षा की चूक के, ज़िम्मेदारी के और जवाबदेही के।
गाज़ा का ग़ुस्सा, इंसानियत का फ़र्ज़
यह भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि इस हरकत के पीछे किस तरह का ग़ुस्सा रहा होगा। विमान के ज़्यादातर यात्री इजरायली मूल के रहे होंगे, और इजरायल ने गाज़ा पट्टी में जो तबाही मचाई है, उसकी तस्वीरें पूरी दुनिया देख रही है। हज़ारों निर्दोष नागरिक — माएँ, नवजात और छोटे बच्चे — इस युद्ध में जान गँवा चुके हैं।
नागरिकों पर यह बमबारी अमानवीय है और इसकी निंदा होनी ही चाहिए। मगर यहाँ एक कड़वा सत्य और भी बड़ा है: किसी भी ग़ुस्से की आड़ में निर्दोषों को निशाना बनाना आतंकवाद है, और आतंकवाद का कोई औचित्य नहीं होता। गाज़ा का दर्द और हवा में चाकू — ये दो अलग चीज़ें हैं; पहले का जवाब न्याय और राजनीति से दिया जाएगा, दूसरे का जवाब केवल अपराध की श्रेणी में होगा।
और इस पूरे संघर्ष में सबसे मार्मिक मोड़ यह है कि जिन इजरायली मूल के बच्चों की जान ख़तरे में थी, उन्हें एक भारतीय पायलट ने बचाया। यही इंसानियत है — सीमाओं, धर्मों और युद्धों से ऊपर उठ जाना। ज़रूरत उस मानसिकता को तोड़ने की है जो बच्चों को ‘दूसरे पक्ष’ की श्रेणी में रखती है। बच्चा हर सीमा से ऊपर है।
तकनीक से बड़ा इंसान
इस घटना से एक गहरी सीख भी निकलती है — विज्ञान, तकनीक और अनुसंधान चाहे जितना उन्नत हो जाए, हवा में सुरक्षा आख़िरकार इंसान के फ़ैसले पर टिकी है। अत्याधुनिक विमान में ऑटोमैटिक सिस्टम हैं, सेंसर हैं, अलार्म हैं — फिर भी असली इम्तिहान के पल में सब कुछ उस एक इंसान के निर्णय पर टिक गया, जो ख़ुद ज़ख़्मी था।
मशीन निर्देश मानती है; इंसान मौत को चुनौती देता है। इसलिए एविएशन में निवेश का सबसे फ़ायदेमंद रास्ता तकनीक के साथ-साथ इंसान को मज़बूत करना है — बेहतर ट्रेनिंग, सख़्त स्क्रीनिंग, मनोवैज्ञानिक सहायता और क्रू की गरिमा की रक्षा।
जुमले नहीं, ठोस क़दम चाहिए
‘आतंकवाद के ख़िलाफ़ शून्य सहनशीलता’ जैसे नारे कई दशकों से सुने जा रहे हैं, मगर नारे से धरती नहीं बदलती। बदलती है नीति — आतंकी फंडिंग की नली बंद करने से, ख़ुफ़िया जानकारी की साझेदारी से, हवाई अड्डों की सुरक्षा की समयबद्ध ऑडिट से, क्रू-वेटिंग के अंतरराष्ट्रीय मानकों से और ज़िम्मेदारों को बख़्शने की परंपरा तोड़ने से। कैप्टन मच्छार ने दुनिया को दिखा दिया कि आतंकवाद से ज़मीन पर भी लड़ा जा सकता है और हवा में भी। अब दुनिया को यह दिखाना होगा कि वह इस सबक़ से सचमुच कुछ सीखती भी है।
























