Explainer Gyanesh Kumar’s Entire Journey: खेल की दुनिया में रेफरी का फैसला अंतिम माना जाता है। टीमें उससे असहमत हो सकती हैं, अपील भी कर सकती हैं, लेकिन जब रेफरी पर ही यह आरोप लगने लगे कि वह एकतरफा हो गया है, तो खेल की गरिमा खतरे में पड़ जाती है। लोकतंत्र भी एक विशाल खेल है और इसका रेफरी है भारत निर्वाचन आयोग। पिछले कुछ दिनों में इसी रेफरी, खासकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर राजनीतिक गलियारों में तेज बहस छिड़ी हुई है। विपक्ष सड़कों पर उतरा है, सांसद मार्च निकाल रहे हैं और उनकी मांग है कि मुख्य चुनाव आयुक्त पद से हटाए जाएं।
इस पूरे बवाल के बीच आम नागरिक के मन में तीन सवाल स्वाभाविक रूप से उठते हैं। आखिर विवाद की जड़ में क्या है? इस ओहदे पर बैठने वाले व्यक्ति को कितनी तनख्वाह और क्या-क्या सुविधाएं मिलती हैं? और सबसे दिलचस्प सवाल- क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को भी सांसदों और विधायकों की तरह अपनी संपत्ति का सार्वजनिक ब्यौरा देना पड़ता है? इस संपादकीय में हम इन्हीं सवालों की परतें खोलने की कोशिश करते हैं, क्योंकि ये सवाल किसी एक व्यक्ति से बड़े हैं- ये सवाल लोकतंत्र की जवाबदेही से जुड़े हैं।

बवाल किस मुद्दे पर? आरोपों की जड़ क्या है
विवाद की शुरुआत एक खबर से हुई, जो इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज को लेकर प्रकाशित की। इस रिपोर्ट के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर यह आरोप लगा कि वे अपने सहयोगी चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की असहमतियों को नजरअंदाज कर एकतरफा फैसले ले रहे हैं। आयोग तीन सदस्यों का कॉलेजियम है, जहां बड़े निर्णय सामूहिक विचार-विमर्श से होने चाहिएं। अगर दो आयुक्तों की आपत्तियों को दरकिनार कर फैसले हो रहे हों, तो यह सिर्फ प्रक्रियागत मुद्दा नहीं, बल्कि संस्थागत चरित्र का सवाल बन जाता है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये सभी बातें अभी आरोपों के दायरे में हैं और इनकी पुष्टि या खंडन की सार्वजनिक बहस अभी पूरी नहीं हुई है। लेकिन राजनीति ने इसका फायदा उठाने में समय नहीं लगाया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी सहित इंडिया गठबंधन के सांसदों ने मंगलवार को ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर मार्च निकाला। इस दौरान कई सांसदों ने धरना भी दिया।
विपक्ष का तर्क है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर ग्रहण लग रहा है। यह भी संयोग नहीं कि इससे पहले बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर भी विपक्ष आयोग पर गंभीर सवाल उठा चुका है। यानी मौजूदा बवाल किसी एक दिन की खबर की उपज नहीं, बल्कि लंबे समय से जमा हो रही अविश्वास की चोटी है।

पद से हटाने की मांग, पर संविधान की राह कितनी आसान?
विपक्ष की मांग को राजनीतिक दबाव के तौर पर देखा जा सकता है, क्योंकि संविधान मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की राह जानबूझकर कठिन बना दी है। अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह ही, यानी सिद्ध किए गए दुराचरण या असमर्थता के आधार पर और संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से हटाया जा सकता है। यह प्रक्रिया लगभग महाभियोग जितनी जटिल है और इतिहास में अब तक कभी इस्तेमाल नहीं हुई है।
इसका मतलब यह है कि विपक्ष का मार्च और धरना व्यावहारिक रूप से निष्कासन की ओर ले जाने वाला कदम नहीं है, बल्कि यह एक राजनीतिक संदेश है- संस्था पर अविश्वास का सार्वजनिक प्रदर्शन। मगर इससे इसकी गंभीरता कम नहीं होती। जब किसी संवैधानिक पदाधिकारी पर इतना बड़ा राजनीतिक वर्ग सवाल खड़ा करता है, तो संस्था के लिए जरूरी है कि वह अपने कामकाज की पारदर्शिता से जवाब दे। मौन या औपचारिक बयान से अविश्वास दूर नहीं होता, वह गहराता है।
ज्ञानेश कुमार: आईआईटी कानपुर से निर्वाचन आयोग तक का सफर
विवाद के केंद्र में बैठे ज्ञानेश कुमार के अब तक के सफर पर नजर डालते हैं। आईआईटी कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक और अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में पोस्ट ग्रेजुएशन करने वाले ज्ञानेश कुमार केरल कैडर के 1988 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। उनका करियर अपने-आप में उन संवेदनशील विभागों की झलक देता है जहां उन्होंने काम किया।
2007 से 2012 के बीच यानी यूपीए सरकार के दौरान वे रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव (रक्षा उत्पादन) रहे। इसके बाद उनका सफर गृह मंत्रालय की ओर मुड़ा, जहां उनका नाम दो ऐतिहासिक निर्णयों से जुड़ा। अगस्त 2019 में जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया, उस समय ज्ञानेश कुमार गृह मंत्रालय के कश्मीर डिविजन में संयुक्त सचिव के पद पर तैनात थे। इसके बाद 2020 में गृह मंत्रालय में अपर सचिव रहते हुए उन्होंने अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जुड़े मामलों और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन से जुड़े विभागों का नेतृत्व किया। इसके अलावा वे सहकारिता मंत्रालय और संसदीय कार्य मंत्रालय में सचिव भी रह चुके हैं।
2024 में उन्हें चुनाव आयुक्त बनाया गया और फरवरी 2025 में उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला। उनकी नियुक्ति को लेकर भी राजनीति गरम रही, क्योंकि चयन समिति की बैठक में लोकसभा में विपक्ष के नेता ने अपनी असहमति दर्ज की थी। उनके समर्थक इस पृष्ठभूमि को प्रशासनिक अनुभव का सबूत मानते हैं, जबकि आलोचक स्थापना के करीब रहने की आशंका जताते हैं। यही दोहरा नजरिया आज उनकी कुर्सी को इतना चर्चित बना रहा है।
सैलरी कितनी? कैबिनेट सचिव के बराबर है वेतन
अब उस सवाल की ओर आते हैं जो हर नागरिक के मन में रहता है- देश के मुख्य चुनाव आयुक्त को कितनी सैलरी मिलती है? मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम 2023 के तहत सीईसी का वेतन कैबिनेट सचिव के बराबर तय किया गया है। यानी ज्ञानेश कुमार को हर महीने लगभग 2.5 लाख रुपये की बेसिक सैलरी मिलती है। इसके अलावा उन्हें कई अन्य भत्ते भी मिलते हैं, जिनमें हर महीने करीब 34 हजार रुपये का भत्ता शामिल है। दिलचस्प बात यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों ने इस भत्ते पर मिलने वाली आयकर छूट स्वेच्छा से छोड़ दी है- यह कदम संस्थागत उदारता का उदाहरण माना जाता है।
कार्यकाल की बात करें, तो मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल छह साल या 65 साल की उम्र, जो भी पहले हो, तक होता है। यानी यह संवैधानिक पद वेतन के लिहाज से देश के सबसे ऊंचे वेतनमान वाले सरकारी पदों में शुमार है।
वेतन का इतिहास: जज के बराबरी से कैबिनेट सचिव की बराबरी तक
यहां एक ऐतिहासिक बदलाव समझना जरूरी है। 2023 से पहले, यानी 1991 के कानून के तहत सीईसी की सैलरी सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर रखी गई थी। यह तुलना सिर्फ आंकड़ों की नहीं थी, बल्कि प्रतीकात्मक थी- इसका मतलब था कि चुनाव आयुक्त को न्यायपालिका जितना ही संवैधानिक दर्जा और स्वतंत्रता का भाव दिया गया था। लेकिन 2023 के संशोधन के बाद इसे कैबिनेट सचिव के बराबर कर दिया गया।
आलोचकों का तर्क है कि यह बदलाव छोटा सा लगता है, पर इसका दर्शन बड़ा है। कैबिनेट सचिव सरकार, यानी कार्यपालिका का शीर्ष ब्यूरोक्रैट है। चुनाव आयुक्त की बराबरी कार्यपालिका से करना, स्वतंत्र संस्था को कार्यपालिका की छत्रछाया में रखने जैसा प्रतीक हो सकता है। वहीं सरकार का पक्ष है कि प्रशासनिक बराबरी से कामकाज अधिक व्यावहारिक होता है। जो भी हो, यह बदलाव उस बड़ी बहस का हिस्सा है जो चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर लगातार चल रही है।
सत्ता के साथ मिलने वाली सुविधाएं: क्या-क्या मिलता है सीईसी को?
वेतन के अलावा मुख्य चुनाव आयुक्त को कई सरकारी सुविधाएं भी मिलती हैं, जिनमें शामिल हैं:
- खुद, पत्नी/पति और आश्रित परिवार के लिए यात्रा में रियायत यानी एलटीसी
- सरकारी आवास
- ड्राइवर के साथ सरकारी गाड़ी
- सुरक्षा व्यवस्था
- बिजली, पानी और टेलीफोन जैसी सुविधाएं
- खुद और परिवार के लिए चिकित्सा सुविधाएं
- सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन और दूसरी सुविधाएं
ये सुविधाएं सामान्य तौर पर देश के शीर्ष संवैधानिक पदाधिकारियों को दी जाती हैं और इन पर कोई बड़ा विवाद नहीं है। असली सवाल इनके बारे में नहीं, बल्कि उस पारदर्शिता के बारे में है जो इस पद के साथ जुड़नी चाहिए।
बड़ा सवाल: क्या सीईसी को भी बतानी पड़ती है अपनी संपत्ति?
यह इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। हर चुनाव में सांसद या विधायक बनने की चाह रखने वाले उम्मीदवार को प्रतिनिधित्व जन-संख्या अधिनियम और चुनाव नियमों के तहत शपथपत्र देना होता है, जिसमें उसे अपनी संपत्ति, देनदारियों, आपराधिक मामलों और शैक्षणिक योग्यता का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक रूप से देना पड़ता है। निर्वाचित होने के बाद भी सांसद और विधायक सदन की अध्यक्षता करने वाले पदाधिकारी को समय-समय पर अपनी संपत्ति की घोषणा करते हैं। उनके ये ब्यौरे जनता के सामने होते हैं और इन्हें चुनाव आयोग की वेबसाइट पर भी देखा जा सकता है।
अब आइए दूसरी तरफ देखें। यही चुनाव आयोग जिसका मुखिया देशभर के उम्मीदवारों से सख्ती से संपत्ति-घोषणा करवाता है, उस आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के लिए ऐसी कोई स्पष्ट व्यवस्था मौजूद नहीं है। कानूनी तौर पर सीईसी या चुनाव आयुक्तों को अपनी संपत्ति सार्वजनिक रूप से घोषित करने की कोई बाध्यता नहीं है।
यह बात कैसे संभव है? इसकी जड़ नियुक्ति की प्रकृति में है। सांसद और विधायक जनता द्वारा चुने जाते हैं, इसलिए उन पर जवाबदेही का मानक अधिक सख्त रखा गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त होते हैं और वे आमतौर पर आईएएस अधिकारी होते हैं। सरकारी कर्मचारियों के नियमों के तहत उच्च पदस्थ अधिकारी अपनी संपत्ति का ब्यौरा सरकार को, यानी विभाग को देते हैं, लेकिन ये ब्यौरे सार्वजनिक दस्तावेज नहीं होते। यानी जानकारी मौजूद है, पर जनता के सामने नहीं।
सुप्रीम कोर्ट के जजों की तुलना भी जायज है। उच्चतम न्यायालय के जज सीजेआई को अपनी संपत्ति की घोषणा करते हैं और वर्षों से बड़ी संख्या में जज इसे सार्वजनिक भी कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब न्यायपालिका जैसी स्वतंत्र संस्था के शीर्ष पदाधिकारी स्वेच्छा से पारदर्शिता अपना सकते हैं, तो चुनाव आयोग जैसी संस्था ऐसा क्यों नहीं करती?
पारदर्शिता का दोहरा मापदंड: विरोधाभास कहां तक जायज?
यह विरोधाभास सिर्फ संपत्ति तक सीमित नहीं है। दावेदारों की संपत्ति घोषित कराने वाला आयोग खुद एक सार्वजनिक प्राधिकरण है और सूचना का अधिकार कानून के दायरे में आता है। मगर व्यवहार में आयोग से सूचना मांगना और मिलवाना दोनों ही अक्सर लंबी अदालती लड़ाई बन जाते हैं। राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने की मांग वर्षों से लटकी है, जबकि दलों को ही चुनावी बॉन्ड के माध्यम से बड़ी रकमें मिलती हैं। यानी पारदर्शिता की मांग करने वाली संस्था और पारदर्शिता से बचने वाले हितधारक, दोनों के बीच का रिश्ता जटिल हो चला है।
बहस का दूसरा पक्ष भी समझना जरूरी है। चुनाव आयुक्तों की संपत्ति घोषणा के खिलाफ कहा जा सकता है कि वे निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं हैं, नियुक्त पदाधिकारी हैं, इसलिए उन पर उम्मीदवारों जैसी बाध्यता लाना सही तुलना नहीं होगी। सुरक्षा और निजता के तर्क भी हैं। मगर यहां एक साधारण सिद्धांत काम करता है- जो संस्था लोकतंत्र में सबसे बड़ी न्यायाधीश की भूमिका निभाती है, उसकी विश्वसनीयता उसकी पारदर्शिता से ही बनती है। यदि मुख्य चुनाव आयुक्त स्वेच्छा से अपनी संपत्ति सार्वजनिक कर दें, तो यह सिर्फ कानूनी जरूरत पूरी नहीं होगी, बल्कि संस्थागत विश्वास की नींव और मजबूत होगी।
नियुक्ति की प्रक्रिया: अनूप बरनवाल फैसले से 2023 के कानून तक
इस पूरे विवाद को समझने के लिए नियुक्ति की प्रक्रिया का इतिहास भी याद करना जरूरी है। लंबे समय तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति करते थे, जिस पर आलोचक कहते थे कि सत्ताधारी पार्टी का ही प्रभाव इसमें रहता है। मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ ने अनूप बरनवाल मामले में ऐतिहासिक फैसला दिया और तब तक के लिए यह व्यवस्था बनाई कि नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधान न्यायाधीश की समिति की सिफारिश पर हो।
लेकिन संसद ने 2023 में नया कानून बनाया, जिसमें चयन समिति में प्रधान न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि तीन सदस्यीय समिति में दो सदस्य सरकार की ओर से होते हैं और एक विपक्ष का। विपक्ष इसी को स्वतंत्रता में कमी मानता है। ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति इसी नए कानून के तहत हुई और बैठक में विपक्ष के नेता की असहमति दर्ज हुई। यानी जिस पदाधिकारी पर आज एकतरफा फैसलों के आरोप लग रहे हैं, उनकी नियुक्ति भी आरंभ से ही राजनीतिक बहस के घेरे में रही।























