हर साल दो अक्टूबर को देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित करता है। फूल चढ़ते हैं, भाषण दिए जाते हैं और ‘सत्य’ और ‘अहिंसा’ के उन सिद्धांतों को याद किया जाता है, जिन पर आजाद भारत की नींव रखी गई थी। लेकिन इस बार गांधी जयंती का दिन राजधानी दिल्ली से लेकर मुंबई तक किसी और ही मायने में याद रखा जाएगा। वोटर लिस्ट में कथित धांधली और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के खिलाफ उतरे छात्र संगठन, यूथ कांग्रेस और कई विपक्षी हल्कों के कार्यकर्ता जब जंतर-मंतर की ओर बढ़ रहे थे, तो पुलिस की बैरिकेडिंग और लाठियों के बीच वे सड़कों पर जा रुके। सैकड़ों प्रदर्शनकारी हिरासत में लिए गए।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इसी घटनाक्रम पर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उनका कहना था कि “लाठी से भीड़ रोकी जा सकती है, सवाल नहीं।” यह छोटा-सा वाक्य इस बार की पूरी बहस का सार बन गया है। इस वाक्य के भीतर जो संदेश छिपा है, वह सिर्फ एक दल की राजनीति नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस दशा का प्रश्न है, जहां सवाल पूछने वालों को ही उपद्रवी बताया जा रहा है।
क्या है विवाद की जड़?
बहस की शुरुआत चुनाव आयोग की उस भूमिका से होती है, जिसे संविधान ने निष्पक्ष निर्वाचन के सर्वोच्च पहरेदार की जिम्मेदारी दी है। विपक्षी दलों और कई नागरिक समूहों का आरोप है कि चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक भूमिका से हटकर सत्तारूढ़ शक्तियों के संरक्षण में काम कर रहा है। इसके सबसे बड़े सबूत के रूप में विपक्ष वोटर लिस्ट में हेरफेर के दावे और बिहार से शुरू हुई SIR प्रक्रिया को पेश कर रहा है।
महाराष्ट्र के एक चुनावी चुनाव को लेकर राहुल गांधी ने पहले ही आरोप लगाया था कि लाखों नकली वोट डालकर परिणाम बदले गए। विपक्ष की मांग थी कि मशीनरी पाठ्यक्रम (मतदान मशीनों का डेटा) सार्वजनिक किया जाए, ताकि आरोपों की स्वतंत्र जांच हो सके। चुनाव आयोग का पक्ष रहा है कि इस तरह के दावे स्वीकृत रूप से सही नहीं हैं और वह बिना शपथ-पत्र के किसी भी आरोप पर कार्रवाई नहीं करेगा। इस गतिरोध ने जिस अविश्वास को जन्म दिया है, वही आज सड़कों पर उतरने का बड़ा कारण बना है।
SIR प्रक्रिया
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन, यानी SIR, को चुनाव आयोग वोटर लिस्ट की शुद्धता सुनिश्चित करने की एक व्यवस्थित पहल बताता है। नजरिया यह है कि जिन नामों की पुष्टि नहीं हो पाती, वे सूची से हटा दिए जाएं, ताकि अवैध मतदान रुक सके। अकादमिक रूप से देखें, तो वोटर लिस्ट को नियमित रूप से अद्यतन करना हर लोकतंत्र की आवश्यकता है।
लेकिन विवाद यहां शुरू होता है, जहां इस प्रक्रिया की गति, तरीका और प्रभाव पर सवाल उठते हैं। विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि बिना पर्याप्त सुनवाई और समय दिए लाखों योग्य मतदाताओं — खासकर गरीब, प्रवासी मजदूर, अल्पसंख्यक और सीमांत समुदायों — के नाम सूची से काटे जा रहे हैं। यह तकनीकी रूप से ‘सुधार’ की आड़ में एक चुनावी फायदा बन सकता है, क्योंकि जो वर्ग ऐतिहासिक रूप से सत्तारूढ़ दल से असंतुष्ट रहा है, उसी पर इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा असर पड़ता दिख रहा है।
यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि किसी भी चुनावी प्रक्रिया की वैधता सिर्फ उसके इरादे से नहीं, बल्कि उसके असर से तय होती है। अगर किसी सुधार का नतीजा यह हो कि हाशिए पर खड़े नागरिक अपना मौलिक अधिकार खो दें, तो उसे ‘सुधार’ नहीं, ‘बहिष्करण’ कहा जाएगा। इसी विरोधाभास को लेकर आज पूरा देश बहस कर रहा है।
राहुल गांधी का आरोप
राहुल गांधी ने अपने बयान में कहा कि गांधी जयंती के दिन हजारों नौजवान वोट चोरी के खिलाफ सड़कों पर थे, जो शांतिपूर्वक अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल कर रहे थे और उनकी मांग साफ है — मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें। उन्होंने आरोप लगाया कि लड़कों-लड़कियों को सड़कों पर घसीटा जा रहा है और सैकड़ों को हिरासत में लिया गया, जिनका “कसूर सिर्फ यह है कि उन्होंने वोट चोरी पर सवाल पूछा।”
राजनीतिक कसीदे पढ़ने की आदत वाले लोग इस बयान को भी कांग्रेस की रणनीति मानकर टाल देंगे। लेकिन थोड़ा रुककर सोचने की जरूरत है। जब युवा — जो आज नौकरी, शिक्षा और भविष्य की तलाश में संघर्ष कर रहे हैं — सड़क पर उस मुद्दे के लिए उतरते हैं जो उनके अपने अधिकारों से जुड़ा है, तो उन्हें सिर्फ ‘किसी दल के इशारे पर’ बताना एक गंभीर भ्रम को जन्म देता है। यह भी सच है कि राजनीतिक दल छात्र संगठनों के जज्बात को अपने एजेंडे में जोड़ने की कोशिश करते हैं — यह लोकतंत्र की हकीकत है। लेकिन यह भी हकीकत है कि चुनावी प्रक्रिया पर उठे सवालों का जवाब देना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है, न कि सवाल पूछने वालों को बदनाम करना।
राहुल गांधी का दूसरा वाक्य और गहरा है — “ज्ञानेश कुमार जाएंगे और जिस सिस्टम ने उन्हें बिठाया है, वो भी जाएगा।” यह कथन आने वाले राजनीतिक दौर के उस संघर्ष का संकेत है, जो सत्ता के केंद्रीकरण बनाम संवैधानिक जवाबदेही के बीच लड़ा जाएगा।
प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई
दिल्ली पुलिस का काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, यह किसी से विवाद नहीं है। किसी भी राज्य की सबसे बुनियादी जिम्मेदारी है कि सार्वजनिक संपत्ति और नागरिक सुरक्षा की रक्षा करे। लेकिन राज्य की शक्ति का इस्तेमाल दो चीजों पर निर्भर करता है — अनुपात और इरादा।
अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देते हैं। यह अधिकार किसी दल की देन नहीं, संविधान की देन है। अगर कोई प्रदर्शन हिंसक हो, संपत्ति को नुकसान पहुंचाए, या सार्वजनिक जीवन अवरुद्ध करे, तो पुलिस कार्रवाई न्यायोचित हो सकती है। लेकिन अगर प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण हो और फिर भी लाठियां चलें, बैरिकेडिंग के बहाने हजारों लोगों को रोक दिया जाए और सैकड़ों को हिरासत में ले लिया जाए, तो यह कानून-व्यवस्था नहीं, अभिव्यक्ति का दमन बन जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में स्पष्ट किया है कि प्रदर्शन का अधिकार लोकतंत्र की आधारशिला है, और राज्य को चाहिए कि वह सबसे कम दमनकारी तरीके का इस्तेमाल करे। इस मानक पर खड़े होकर देखें, तो इस बार की कार्रवाई पर अनुपात का सवाल उठना स्वाभाविक है। मुंबई में भी स्थिति कुछ कम नहीं थी, जहां एक सामाजिक संगठन के प्रतिनिधि ने पुलिस पर “बर्बरता” का आरोप लगाया। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए, क्योंकि पुलिस की छवि सिर्फ एक दिन के प्रदर्शन से नहीं, बल्कि वर्षों की निष्पक्षता से बनती है।
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता
भारत का चुनाव आयोग दशकों तक दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित निर्वाचन संस्थानों में गिना जाता रहा है। टी. एन. शेषन, जेम्स माइकल लिंगडोह जैसे आयुक्तों ने यह दिखाया था कि एक स्वतंत्र चुनाव आयोग सत्ता के सबसे बड़े प्रधानमंत्री के सामने भी खड़ा हो सकता है। यही विश्वसनीयता भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी रही है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह छवि पर सवाल उठने लगे हैं। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव, आयोग की ओर से विपक्षी शिकायतों पर धीमी कार्रवाई, और जनता के सामने सीधे संवाद न करने जैसे मुद्दों ने एक संदेह की राह बना दी है। जब किसी संस्था की निष्पक्षता पर संदेह उठता है, तो उसका नुकसान सिर्फ विपक्ष को नहीं, पूरे लोकतंत्र को होता है। क्योंकि चुनाव हारने वाला दल कल सत्ता में आ सकता है, लेकिन जब तक सिस्टम पर भरोसा नहीं रहेगा, तब तक हर हार को ‘धोखा’ माना जाएगा और हर जीत को ‘हेरफेर’। यह गतिरोध लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक है।
यहां एक जिम्मेदार पाठक को यह भी याद रखना चाहिए कि चुनाव आयोग ने वोट चोरी के आरोपों को बार-बार खारिज किया है और उसका कहना है कि वह भारतीय लोकतंत्र की अखंडता के प्रति प्रतिबद्ध है। सवाल यह नहीं कि आरोप सही हैं या गलत — सवाल यह है कि इन आरोपों को सुलझाने के लिए क्या एक स्वतंत्र, पारदर्शी तंत्र मौजूद है? अगर नहीं, तो यह तंत्र बनाना आयोग की ही जिम्मेदारी है।
गांधी की विरासत और आज का दौर
राहुल गांधी ने अपने बयान में बापू को याद किया — “सच बोलो, शांति से लड़ो।” यह संयोग नहीं कि यह प्रदर्शन गांधी जयंती के दिन हुआ। गांधी का पूरा राजनीतिक जीवन इस विचार पर टिका था कि असली शक्ति सत्ता में नहीं, सच में होती है। दांडी मार्च एक ‘अवैध’ नमक बनाने का प्रदर्शन था, लेकिन उसने एक साम्राज्य की नींव हिला दी। इतिहास गवाह है कि लाठियां सच को रोक नहीं पाईं।
आज का दौर अलग है, लेकिन सिद्धांत वही है। जब नागरिक अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सड़क पर उतरते हैं और उन पर दमन टूटता है, तो यह सिर्फ एक कानूनी घटना नहीं रह जाती — यह एक नैतिक प्रश्न बन जाता है। और इतिहास का अनुभव यह रहा है कि नैतिक प्रश्नों को लाठी से दबाया नहीं जा सकता।

























