Delhi Builder: राजधानी दिल्ली में बिल्डरों की लापरवाही और भ्रष्ट व्यवस्था का ऐसा चेहरा सामने आया है जहां आम जनता की जान सिर्फ एक कागज की तरह रख दी जा रही है। पूर्वी दिल्ली के विवेक विहार और दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के पालम में हुए हालिया हादसों ने यह साबित कर दिया है कि कैसे बिल्डर और दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) की ‘मिलीभगत’ कोर्ट की अवहेलना करते हुए आम आदमी के लिए मौत का खाई बन रही है।
नहीं था आपातकालीन निकास, ग्रिल बनी मौत की वजह
विवेक विहार और पालम में सामने आए हादसों की प्रारंभिक जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इन इमारतों को बनाते समय बिल्डरों ने सुरक्षा के मानकों की साफ धज्जियां उड़ाईं। सबसे बड़ी लापरवाही यह रही कि फ्लैटों में कोई आपातकालीन निकास (Emergency Exit) नहीं बनाया गया। इतना ही नहीं, खिड़कियों पर लगी मोटी लोहे की ग्रिल्स ने भी आग या अन्य आपात स्थिति में लोगों की आवाजाही को पूरी तरह बंद कर दिया, जिससे लोगों की जान चली गई।

एमसीडी की चुप्पी उगल रही बिल्डरों के अवैध कामों की कहानी
सवाल यह है कि बिना एमसीडी के परमिशन और मानकों के इतनी बड़ी इमारतें कैसे बनीं? जांच में साफ नजर आ रहा है कि बिल्डरों और नगर निगम के अधिकारियों के बीच की मिलीभगत इसका मुख्य कारण है। नियमों की अनदेखी करके नक्शे पास कराए गए और जब दुर्घटना होती है, तो आम जनता कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाती रहती है, जबकि दोषी बिल्डर और अधिकारी बेदाग बैठे रहते हैं।
पार्किंग में बन रहे फ्लैट, कोर्ट के आदेशों की खुली अवहेलना
यह सिर्फ सुरक्षा का मामला नहीं है, बल्कि दिल्ली में पार्किंग को लेकर होने वाली लड़ाई-झगड़े और मारपीट के पीछे भी यही बिल्डर-एमसीडी गठजोड़ जिम्मेदार है। कोर्ट ने साल 2016 और 2017 में स्पष्ट आदेश दिया था कि किसी भी प्लॉट/सोसायटी में ग्राउंड फ्लोर पर कुछ नहीं बनेगा, उसे पूरी तरह से पार्किंग के लिए ही छोड़ा जाएगा। लेकिन इस आदेश की खुली अवहेलना करते हुए बिल्डरों ने पार्किंग के जगहों पर फ्लैट बना दिए। उत्तम नगर सहित कई इलाकों में पार्किंग न होने की वजह से लोगों के बीच अक्सर खूनी झड़पें होती हैं, जो इस अवैध निर्माण का सीधा नतीजा है।
एफआईआर और शिकायतें सिर्फ कागजों में सिमटीं
सबसे दुखद पहलू यह है कि इन बिल्डरों की गलतियों और धोखाधड़ी के खिलाफ एफआईआर तो दर्ज हो रही हैं, लेकिन वे सिर्फ कागजी कार्रवाई बनकर रह जा रही हैं। बिल्डरों की ताकत और पैसे के दम पर न तो कोर्ट उन्हें सजा दिला पा रहा है और न ही प्रशासन कोई ठोस कार्रवाई कर रहा है।
सवाल प्रशासन और सरकार पर
जब तक इन बिल्डरों और भ्रष्ट एमसीडी अधिकारियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक दिल्ली में ऐसे ‘मौत के फ्लैट’ बनते रहेंगे। अगर 10 साल बाद भी सर्वे और छानबीन का यह दिखावा चलता रहा, तो आने वाले समय में और अनहोनी होना तय है। अब सरकार को यह तय करना होगा कि आम जनता की जान की कीमत किसके पास है—कोर्ट के आदेशों की, या बिल्डरों की मनमानी की?






















