मुरिया दरबार की जगह ‘आम दरबार’, आदिवासी समाज नाराज

बस्तर दशहरा के ऐतिहासिक मुरिया दरबार को कार्यक्रम सूची में ‘आम दरबार’ लिखे जाने पर विवाद खड़ा हो गया है। जानिए परंपरा का इतिहास, विधायक विक्रम मंडावी की आपत्ति और प्रशासन का पक्ष।

मुरिया दरबार का नाम बदला? बस्तर में सियासी घमासान

HIGHLIGHTS

  • राष्ट्रपति के सामने उठेगा मुरिया दरबार नाम का मुद्दा?
  • 150 साल पुरानी परंपरा पर नाम बदलने का विवाद
  • राष्ट्रपति के बस्तर दौरे से पहले गरमाई नाम की सियासत
  • मुरिया दरबार पर विवाद: प्रशासन ने बताई पूरी सच्चाई

छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरा उत्सव के बीच मुरिया दरबार का नाम बदलने का विवाद चर्चा में है। कार्यक्रम से जुड़ी एक सूची में ऐतिहासिक ‘मुरिया दरबार’ की जगह ‘आम दरबार’ लिखे जाने पर आदिवासी समाज और राजनीतिक नेताओं ने आपत्ति जताई है। यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के 23 अक्टूबर को बस्तर पहुंचने और दशहरा आयोजन में शामिल होने की तैयारी है।

हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार प्रशासन ने कहा है कि आधिकारिक कार्यक्रम में मुरिया दरबार का नाम बरकरार है और नाम बदलने का कोई फैसला नहीं लिया गया। ऐसे में विवाद का केंद्र कार्यक्रम सूची में सामने आए शब्दों और उसके आधिकारिक दर्जे को लेकर है। छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग ने राष्ट्रपति के मुरिया दरबार में शामिल होने की जानकारी दी है।

कार्यक्रम सूची में ‘आम दरबार’ लिखे जाने पर आपत्ति

विवाद उस कार्यक्रम सूची के सामने आने के बाद शुरू हुआ, जिसमें ‘मुरिया दरबार’ के स्थान पर ‘आम दरबार’ लिखा बताया गया। इस बदलाव को लेकर सवाल उठे कि क्या बस्तर की पुरानी सांस्कृतिक परंपरा का नाम बदला जा रहा है। आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने भी इस शब्द को हटाकर ‘मुरिया दरबार’ बहाल करने की मांग की है। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस मुद्दे पर शिकायत भी दर्ज कराई गई।

बीजापुर के विधायक विक्रम मंडावी ने नाम में बदलाव पर कड़ा विरोध जताया। उन्होंने इसे आदिवासी समाज की पहचान और बस्तर की संस्कृति से जुड़ा संवेदनशील विषय बताया और पुराना नाम बहाल करने की मांग की। रिपोर्टों में उनके आंदोलन की चेतावनी देने का भी उल्लेख है।

क्या है मुरिया दरबार की परंपरा?

मुरिया दरबार बस्तर दशहरा का एक ऐतिहासिक और विशिष्ट आयोजन माना जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, इसकी शुरुआत 1875 में हुई थी। रियासत काल में बस्तर के राजा के सामने मांझी, चालकी, पुजारी और स्थानीय समुदायों के प्रतिनिधि अपनी समस्याएं और मांगें रखते थे। इस तरह दरबार शासन और जनता के बीच संवाद का मंच था।

समय के साथ राजशाही व्यवस्था समाप्त हुई, लेकिन मुरिया दरबार की परंपरा जारी रही। आज इसे आदिवासी समाज की भागीदारी और अपनी बात रखने के एक सांस्कृतिक मंच के रूप में देखा जाता है। इसी वजह से इसके नाम को लेकर उठे सवालों ने भावनात्मक और राजनीतिक, दोनों तरह की प्रतिक्रिया पैदा की है।

राष्ट्रपति के दौरे के बीच बढ़ी राजनीतिक अहमियत

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के 23 अक्टूबर को बस्तर दशहरा के मुरिया दरबार में शामिल होने का कार्यक्रम है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भी उनके दौरे और आयोजन में भागीदारी की जानकारी दी है। राष्ट्रपति की मौजूदगी से इस आयोजन का राष्ट्रीय महत्व बढ़ गया है। इसी बीच नाम से जुड़ा विवाद सामने आने के कारण प्रशासन और आयोजन समिति की तैयारियों पर भी लोगों का ध्यान है।

प्रशासन का पक्ष: आधिकारिक नाम मुरिया दरबार

मीडिया रिपोर्टों में प्रशासन का पक्ष भी सामने आया है। उनके अनुसार, आधिकारिक कार्यक्रम सूची में ‘मुरिया दरबार’ नाम ही दर्ज है और इसे ‘आम दरबार’ करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया। इसलिए उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि नाम बदलने का औपचारिक आदेश जारी हो चुका है। विवाद एक सूची में इस्तेमाल हुए शब्द को लेकर है, जबकि प्रशासन आधिकारिक नाम में बदलाव से इनकार कर रहा है।

परंपरा के नाम पर बहस जारी

मुरिया दरबार का नाम बस्तर की ऐतिहासिक स्मृति और आदिवासी परंपरा से जुड़ा है। ऐसे में कार्यक्रम सूची में किसी दूसरे नाम का इस्तेमाल होना लोगों के लिए केवल शब्दों का बदलाव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का सवाल बन गया है। दूसरी ओर, प्रशासन का कहना है कि आधिकारिक नाम नहीं बदला गया है।

राष्ट्रपति के दौरे से पहले अब सबकी नजर इस बात पर है कि आयोजन के अंतिम कार्यक्रम और मंच पर किस नाम का इस्तेमाल होगा। फिलहाल, मुरिया दरबार का नाम बदलने का विवाद बस्तर दशहरा की तैयारियों के साथ-साथ प्रदेश की राजनीति में भी चर्चा का विषय बना हुआ है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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