Election Commission of India : संवैधानिक संस्थाओं के राजनीतिकरण का एक भी अवसर भाजपा नहीं छोड़ता और भारत का चुनाव आयोग इसका जीता-जागता उदाहरण बनकर सामने आया है। आज ‘ईमान’, ‘कानून’ और ‘निष्पक्षता’ जैसे शब्द चुनाव आयोग के शब्दकोश में कहीं खो गए हैं। गैर-भाजपा शासित राज्यों, विशेषकर पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा दिखाई दे रही सक्रियता भारतीय संविधान का चीरहरण करने की प्रक्रिया से कम नहीं है।
प्रशासनिक तोड़-फोड़ की साजिश
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की अधिसूचना जारी होने से पहले ही चुनाव आयोग ने भाजपा का झंडा कंधे पर रखकर काम शुरू कर दिया था। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को घेरने की ‘सुपारी’ लेते हुए, आयोग ने राज्य सरकार के ५० वरिष्ठ अधिकारियों का मनमाने ढंग से तबादला कर दिया। राज्य के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक (DGP), अतिरिक्त महानिदेशक से लेकर जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक स्तर तक के अधिकारियों को एक रात में हटाकर प्रशासन का नियंत्रण भाजपा ने अपने हाथों में ले लिया। चुनाव से पहले ही राज्य के प्रशासनिक ढांचे को उलट-पुलट करने की यह कार्रवाई ‘तानाशाही’ का ही दूसरा नाम है।
राजभवन: भाजपा का ‘वॉर रूम’
तमिलनाडु में मुख्यमंत्री स्टालिन और उनकी सरकार से लगातार विवाद मोल लेने वाले राज्यपाल रवि को केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल का चार्ज देकर एक स्पष्ट संदेश दिया है। इसका परिणाम यह है कि पश्चिम बंगाल का राजभवन अब भाजपा का चुनावी ‘वॉर रूम’ (युद्ध कक्ष) बन चुका है। ममता बनर्जी के साथ काम करने वाले अनुभवी और निष्पक्ष अधिकारियों को हटाकर, उनकी जगह ऐसे अधिकारियों को नियुक्त किया गया है जो भाजपा के सामने सिर झुकाने के लिए तैयार हों। यह चिंताजनक स्थिति है। एक ऐसे पुलिस आयुक्त का उदाहरण सामने है, जिसे २०१९ में चुनाव आयोग ने कोलकाता का पुलिस आयुक्त बनाया था और आज वह भाजपा के उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में है। संवैधानिक और प्रशासनिक संस्थाओं का यह कुरीत राजनीतिकरण भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।
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मतदाता सूचियों में गड़बड़ी और डर का माहौल
चुनाव आयोग ने कथित तौर पर एसआईआर (SIR) के नाम पर मतदाता सूचियों में भारी गड़बड़ी की है। लाखों मतदाताओं के नाम मनमाने ढंग से हटा दिए गए हैं। भाजपा की पश्चिम बंगाल में विधिवत शक्ति न होने के बावजूद, उसने इन संस्थाओं का इस्तेमाल करते हुए अवैध रूप से सत्ता हथियाने की रणनीति बनाई है। प्रशासन को ध्वस्त करके आयोग ने राज्य में अराजकता पैदा कर दी है। किसी भी पुलिस अधिकारी को बिना कारण बताए उठाकर राज्य के बाहर कर देना और उस स्थान पर ‘वर्दीधारी भाजपा कार्यकर्ता’ को बिठाना—यह प्रशासन में खामोश डर पैदा करने की साजिश है। संदेश स्पष्ट है: “हम जो कहें वही करो, वरना चलते बनो।”
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दोहरा मानक: असम बनाम बंगाल
स्वयं को ‘विश्वगुरु’ की उपाधि देने वाली सत्ताधारी पार्टी, जनतंत्र के माध्यम से चुनाव जीतने में अपनी असफलता स्वीकार करती हुई दिख रही है। महाराष्ट्र और दिल्ली (अरविंद केजरीवाल) में जो ‘बेईमानी भरा तरीका’ अपनाया गया, वही बंगाल में दोहराया जा रहा है। सबसे चौंकाने वाला पहलू ‘दोहरा न्याय’ है। असम में भी चुनाव हो रहे हैं, जहां मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा आदर्श आचार संहिता की धज्जियां उड़ाते हुए प्रशासन का दुरुपयोग कर रहे हैं। वहां चुनाव आयोग ने न तो मुख्य सचिव या पुलिस प्रमुख को हटाया है और न ही प्रशासनिक तोड़फोड़ की है। असम के लिए ‘आँख बंद करना’ और बंगाल के लिए ‘संविधान का सहारा लेकर राजनीति करना’—यह वैदिक सिद्धांत नहीं, बल्कि सत्ता का पाखंड है।





















