Women Reservation: लोकसभा में 131वें संविधान संशोधन विधेयक का गिरना कोई आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में ‘पैकेज डील’ की रणनीति के अंजाम का एक और चरण है। 21 घंटे की लंबी चर्चा और 54 वोटों के अंतर से इस बिल के धराशायी होने के पीछे जो राजनीतिक गणित साफ नजर आ रहा है, वह दो बातों पर मोहर तोड़ता है—पहला, भारतीय जनता का दलबाजी की राजनीति से मोहभंग हो चुका है, और दूसरा, सत्ता पक्ष ने ‘ट्रोजन हॉर्स’ (घोड़े के बदले में छिपी सेना) की रणनीति अपनाकर विपक्ष को बैकफुट पर लाने की जो कोशिश की, वह उल्टी पड़ गई।
लोकसभा सीटों में संभावित वृद्धि पर बहस
यह बिल सतही तौर पर महिला आरक्षण का था, लेकिन इसका असली पेट लोकसभा की कुल सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने वाला परिसीमन (Delimitation) था। विपक्ष ने इस बात को समझने में कोई चूक नहीं की। कांग्रेस नेता राहुल गांधी का बयान—”यह महिला आरक्षण बिल नहीं है, बल्कि भारत की राजनीतिक संरचना को बदलने का तरीका है”—एक चुनावी नारे से कहीं अधिक था। यह उस गहरी चिंता को व्यक्त करता था कि सीटों के अनुपात में इस तरह का बदलाव कैसे राज्यों के बीच सत्ता का समीकरण बिगाड़ सकता है। विपक्ष ने सफलतापूर्वक यह बात स्थापित कर दिया कि सीटों के विस्तार के बिना महिला आरक्षण का बिल सरकार ला सकती थी, लेकिन उसने जबरदस्ती दोनों को बांधकर एक विवादिक कानून को पास करवाने की कोशिश की।
लेकिन, इस सियासी जीत-हार के बीच जो सबसे अहम और दुखद पहलू है, वह है महिला सशक्तिकरण का वास्तविक मुद्दा। बिल के गिरने के बाद सरकार और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी जीत के ढोल पीट रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की सीधी भागीदारी का इंतजार अब और लंबा हो गया है।
आइए गणित समझते हैं। 131वें संशोधन के गिरने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि महिलाओं को आरक्षण नहीं मिलेगा। 2023 में पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संविधान संशोधन) पहले से कानून है और 16 अप्रैल, 2026 से यह प्रभावी भी हो चुका है। लेकिन, इस कानून में जो ‘शर्त’ छिपी है, वही असली अभिशाप साबित हो रही है।
मूल कानून कहता है कि 33% आरक्षण तभी लागू होगा, जब अगली जनगणना के आंकड़े आएंगे और उसके आधार पर परिसीमन पूरा होगा। वर्तमान राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे को देखते हुए यह स्पष्ट है कि जनगणना और परिसीमन की यह प्रक्रिया 2034 या उसके बाद के लोकसभा चुनावों तक पूरी हो पाएगी। यानी, कानून तो बन गया, लेकिन इसके लागू होने में एक दशक का समय लगेगा।
विपक्ष की आपत्ति और लोकतांत्रिक बहस
131वां संशोधन वास्तव में इसी ‘एक दशक के विलंब’ को दरकिनार करने का एक तरीका था। सरकार चाहती थी कि जल्दबाजी में सीटें बढ़ाई जाएं और आरक्षण को तुरंत लागू किया जाए। लेकिन सवाल यह है कि क्या देश की राजनीतिक भूगोल को बिना व्यापक सहमति के एक पेंच से बदल देना उचित था? विपक्ष ने इसी बदलाव को नामंजूर किया। नतीजा यह हुआ कि सरकार की ‘शॉर्टकट’ रणनीति धराशायी हो गई और अब हम वापस उसी 2023 के कानून के ‘लंबे इंतजार’ वाले फॉर्मूले पर लौट आए हैं।
इस पूरे घटनाक्रम से दो बड़ी सियासी नैतिकताएं सामने आती हैं। एक, सत्ता पक्ष को लोकलोकतांत्रिक मुद्दों (जैसे महिला आरक्षण) को बड़े संरचनात्मक बदलावों (जैसे परिसीमन) के साथ बांधकर पेश करने से बचना चाहिए। यह लोकतांत्रिक परंपरा के खिलाफ है। दूसरा, विपक्ष को केवल सरकार को घेरने के चक्कर में यह नहीं भूलना चाहिए कि उसके इस ‘विरोध’ का अंतिम खामियाजा उन महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है, जिनका प्रतिनिधित्व अभी और एक दशक तक टल सकता है।
अंततः, 131वें संविधान संशोधन का गिरना एक राजनीतिक झुकाव की जीत है, लेकिन लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की हार है। भारतीय संसद में महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी अब 2034 तक का एक सपना बनकर रह गया है। जब तक देश की राजनीतिक पार्टियां परिसीमन और जनगणना जैसे मूलभूत मुद्दों पर एक पारदर्शी और राष्ट्रीय सहमति नहीं बनातीं, तब तक ‘नारी शक्ति’ को संसद के गलियारों में उसका हक दिलाना एक लंबी और कठिन प्रतीक्षा बना रहेगा।





















