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ईरान-अमेरिका जंग,भारत की इन इंडस्ट्री में बढ़ा संकट

ईरान-अमेरिका तनाव ने उजाड़ा भारत का मार्केट (फाइल फोटो)

Iran-US War: ईरान और अमेरिका के बीच मिडिल ईस्ट के आसमान में गूंज रही तोपों की आवाज़ भले ही भारत से हजारों किलोमीटर दूर हो, लेकिन इसकी धमक अब भारत की अर्थव्यवस्था के हर कोने में सुनाई दे रही है। यह सिर्फ सियासी या सैन्य टकराव नहीं रहा, बल्कि यह एक ‘चेन रिएक्शन’ बन चुका है जो कच्चे माल से लेकर आपकी थाली और जेब तक को प्रभावित कर रहा है।

तेल और गैस की सप्लाई लाइनों में आई रुकावट ने एक-एक कर कई इंडस्ट्री की सांसें फुला दी हैं। आइए समझते हैं कि यह जंग आपकी रोज़मर्रा की किन चीजों को कैसे प्रभावित कर रही है:

बीयर की कैन और शराब की बोतलें हुई महंगी

बता दें कि गर्मी के मौसम में ठंडी बीयर का आनंद लेने वालों के लिए बुरी खबर है। फिरोजाबाद (UP) जैसे ग्लास हब में गैस की कमी के कारण 30 से 40% तक उत्पादन गिरा है। कांच की बोतलों की कमी से उनकी कीमतों में 20% का उछाल आया है। वहीं, शिपिंग में देरी के कारण एल्युमीनियम के आयात पर असर पड़ा है, जिससे बीयर की कैन बनाने वाली कंपनियों ने सप्लाई में कटौती की चेतावनी दी है।

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कंडोम इंडस्ट्री पर संकट के बादल

सबसे अनोखा असर भारत के 7,000-8,000 करोड़ रुपये के कंडोम उद्योग पर देखने को मिल रहा है। पेट्रोकेमिकल सप्लाई चेन बाधित होने से कंडोम बनाने के लिए ज़रूरी ‘सिलिकॉन ऑयल’ और ‘अमोनिया’ जैसे कच्चे माल की कमी पैदा हो गई है। आने वाले दिनों में इसकी उपलब्धता कम होने या कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका है।

सड़कें और मकान बनाना हुआ महंगा

कंस्ट्रक्शन और रियल एस्टेट सेक्टर पर सबसे ज़्यादा बोझ पड़ा है। गुजरात के मोरबी जैसे औद्योगिक क्लस्टर में सिरेमिक और टाइल्स बनाने वाली फैक्ट्रियां धीमी पड़ गई हैं। स्टील और सीमेंट महंगा होने से घर और सड़कें बनाने की लागत बढ़ी है, जिससे कई प्रोजेक्ट्स में देरी हो रही है।

शैम्पू से लेकर रेस्टोरेंट तक का ‘फूड इंफ्लेशन’

प्लास्टिक और केमिकल इंडस्ट्री कच्चे तेल (नाफ्था) पर निर्भर हैं। तेल महंगा होने से पैकेजिंग का खर्चा दोगुना हो गया है। इसका असर शैम्पू, पैकेट वाले खाने से लेकर दवाइयों की बोतलों तक पर पड़ेगा। वहीं, रेस्टोरेंट्स में एलपीजी (LPG) गैस महंगी होने से खाना बनाने का खर्चा बढ़ा है, जिसे अब ग्राहकों की जेब पर डाला जा रहा है।

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एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) महंगा होने से एयरलाइंस कंपनियों का खर्चा बढ़ा है, जिससे फ्लाइट टिकट महंगे होने की नौबत आ सकती है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का बोझ सरकार ने अभी एक्साइज ड्यूटी घटाकर आम आदमी पर डालने से बचाया है, लेकिन इससे सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ा है।

खेती और MSME सेक्टर की उलझी समस्या

पैकेजिंग मटेरियल की कमी के कारण किसानों तक समय पर बीज और खाद नहीं पहुंच पा रहा है, जो आने वाले समय में फसल उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। सबसे ज़्यादा मार छोटे उद्योगों (MSME) को पड़ी है, जो बढ़ती लागत और ऑर्डर घटने की वजह से बंद होने के कगार पर हैं।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का खतरा

दुनिया के सबसे अहम तेल और ट्रेड रूट्स में से एक ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में तनाव ने शिपिंग कंपनियों का बीमा और जोखिम लागत बढ़ा दी है। भारत जैसे ट्रेड-निर्भर देश के लिए इसका मतलब है कि सामान लाने में ज़्यादा समय और ज़्यादा पैसा लगेगा। इसके अलावा, खाड़ी देशों में काम रुकने से भारतीय मजदूर वापस लौट रहे हैं, जिससे देश को मिलने वाले विदेशी पैसे (रेमिटेंस) पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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